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अमेरिका में भारतीय मूल की डॉक्टर बोली:महामारी के समय दिन-रात काम के बीच डॉक्टर को निष्क्रिय, गुलाम, सुस्त और कामचलाउ कहा जाता है

19 दिन पहले
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  • एशियाई महिलाओं को रोज अपमानित किया जाता है, उनसे गोरे मरीज दुर्व्यवहार करते हैं

भारतीय मूल की डॉक्टर छाया भुवनेश्वर बोस्टन, अमेरिका में मनोचिकित्सक हैं। वे लघु कथाओं के संग्रह, व्हाइट डांसिंग एलीफेंट की लेखक हैं। उन्होंने, अपनी कहानियों में नस्लभेदी हिंसा और यौन दुर्व्यवहार का सामना करने वाली अश्वेत महिलाओं के अनुभवों को उकेरा है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख में महामारी के बीच एक अस्पताल में अपने कड़वे अनुभव साझा किए हैं। पेश है-

यह महामारी की शुरुआत में अप्रैल 2020 के मध्य का वाकया है जब एक अजनबी ने मुझ पर थूक दिया था। मेरे हॉस्पिटल बैज और मास्क को देखने के बाद भी उसने कहा, मैंने बीमारी फैलाई है। उसने मुझे हिंदू कहते हुए गालियां बकीं। मैं फौरन वहां से हट गई।

अस्पताल के बाथरूम में जाकर बालों में लगा थूक धोया और अपने काम में जुट गई। दरअसल, मेरे दिमाग में दूसरी बातें घूम रही थीं। वायरस ने हमारे जीवन को बदल डाला था। हम डॉक्टर अतिरिक्त काम कर रहे थे। मेरा ध्यान अजनबी के क्रूर शब्दों की बजाय अपने काम पर था।

सच तो यह है, मैंने इस तरह की नफरत और धर्मांधता सार्वजनिक स्थानों और अस्पताल में पहले भी अनुभव की है। लेकिन, इस वर्ष के पहले तक मैंने ऐसे आक्रामक बर्ताव का प्रभाव को महसूस नहीं किया था।

मेरी ट्रेनिंग ने मुझे काम पर फोकस करने और भेदभाव की अनदेखी करने का प्रोत्साहन दिया था। लेकिन,एशियाइयों के खिलाफ अभी हाल में बढ़ी नफरत के बाद मुझे लगा कि किस तरह एशियाई-अमेरिकी डॉक्टरों को एक समूह के रूप में नीचा दिखाया जा रहा है। कैसे महामारी के दौरान अपने जीवन को दांव पर लगाने के बावजूद हम रंगभेद और स्त्रियों के प्रति भेदभाव से सुरक्षित नहीं हैं।

महामारी फैलने के साथ एशियाई विरोधी नफरत बढ़ी है। निस्संदेह डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा चीनी वायरस और कुंग फू जैसे शब्दों के इस्तेमाल में इसका हाथ है।

अन्य एशियाइयों के समान मेरे सहयोगी और मरीज मुझे सुस्त, निष्क्रिय, गुलाम, कामचलाउ कहते हैं। मेरी जैसी महिलाओं के प्रति घातक अमेरिकी भेदभाव हमें रोज नीचा दिखाता है। हमारे सफेद कोट और अस्पताल के बैज भी इस आक्रमण को हतोत्साहित नहीं कर पाते बल्कि इन्हें देखकर हमें निशाना बनाया जाता है।

दरअसल, इन अपेक्षाकृत शक्तिशाली भूमिकाओं में हमारी मौजूदगी से गोरे पुरुष के प्रभुत्व को चुनौती मिलती है।

इसमें कोई अचरज नहीं है कि अमेरिका में प्रेक्टिस करने वाली पहली एशियाई-अमेरिकी डॉक्टर मार्गरेट चुंग को 1916 में मेडिकल ग्रेजुएशन के बाद पहले कुछ महीनों तक नर्स के रूप में काम करना पड़ा था। मैं अपने मित्रों, सहयोगियों और मेडिकल कॉलेज क्लासमेट्स के बीच एशियाई महिला डॉक्टरों के संबंध में कानाफूसी का नेटवर्क चलाए जाने के संबंध में सुनती हूं।

श्वेत डॉक्टर और नर्स उन्हें पहले नाम और अपमानजनक संबोधनों से बुलाते हैं। पुरुष मरीज मसाज करने जैसी अनुचित मांग करते हैं जिन्हें नम्रता से अस्वीकार कर दिया जाता है। मुझे महामारी के दौरान अस्पताल में अपने काम पर गर्व है। लेकिन, मैं अस्पताल के अंदर और बाहर एशियाई-अमेरिकी महिलाओं के खिलाफ बरती जा रही नफरत की अनदेखी नहीं कर सकती हूं। कुछ बदलाव तो होना चाहिए।

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