जलवायु परिवर्तन से ग्लोबल वार्मिंग का खतरा::कुदरत को तबाह कर अमीर बने देशों पर भारी पड़ा मौसम ; भविष्य में स्थिति और ज्यादा बिगड़ेगी

एक वर्ष पहले
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डोयले, कैलिफोर्निया, अमेरिका में इस माह आग से जूझता एक फायरफाइटर। - Dainik Bhaskar
डोयले, कैलिफोर्निया, अमेरिका में इस माह आग से जूझता एक फायरफाइटर।
  • परिवर्तन-यूरोप,अमेरिका, कनाडा और रुस में ग्लोबल वार्मिंग ने संकट पैदा किया

यूरोप के कुछ अमीर देशों को पिछले सप्ताह बाढ़ ने तहस-नहस कर डाला। जर्मनी, बेल्जियम में उफनती नदियों ने कहर ढा दिया। ठंडे और कोहरे में लिपटे मौसम के लिए मशहूर अमेरिका के उत्तर पश्चिमी इलाकों में गर्मी से सैकड़ों लोगों की जान चली गई। पश्चिमी हिस्से में फैले 12 राज्य एक और ग्रीष्म लहर की चपेट में हैं।

कनाडा में जंगलों की आग ने एक समूचे गांव का अस्तित्व खत्म कर डाला है। मास्को रिकॉर्ड तापमान में झुलस रहा है। साइबेरिया के जंगलों में लगातार आग लग रही है। कई अध्ययनों से पता लगा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुए जलवायु परिवर्तन ने इन देशों को शिकार बनाया है। आने वाले वर्षों में यूरोप,अमेरिका सहित कई देशों में स्थिति और ज्यादा खराब होगी।

यूरोप और उत्तर अमेरिका में खराब मौसम ने साइंस और इतिहास के दो जरूरी तथ्यों को रेखांकित किया है। दरअसल, पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की गति धीमी करने के लिए तैयार नहीं है। वह इसकी जरूरत को लेकर भी सचेत नहीं है। बीते सप्ताह की घटनाओं ने उन देशों को झकझोर डाला है जिन्होंने सौ साल से अधिक समय तक कोयला, तेल और गैस को अंधाधुंध जलाकर संपन्नता बटोरी है।

इन देशों की गतिविधियोंं से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की भरमार हुई और दुनिया में गर्मी बेतहाशा बढ़ी है। भीषण मौसम और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध पर अध्ययन करने वाले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के भौतिकशास्त्री फ्रेडरिके ओटो का कहना है, हमें लोगों का जीवन बचाना होगा।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण गरीब देशों में मौतों और नुकसान का लंबा सिलसिला चल रहा है। 2013 में विकासशील देशों ने जलवायु परिवर्तन से हो रहे नुकसान के लिए धन देने की मांग थी जिसे अमेरिका, यूरोपीय देशों ने ठुकरा दिया था।

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के भारत स्थित दफ्तर में जलवायु डायरेक्टर अलका केलकर का कहना है, औद्योगिक देशों द्वारा 100 साल से अधिक समय तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन ने भयानक मौसम की स्थितियां बनाई हैं। इससे गरीब देशों में तबाही हुई है। अब ये आपदाएं अमीर देशों में हो रही हैं। 2015 के पेरिस समझौते के बाद भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ है।

विनाशकारी नतीजों की आशंका

यूरोप, अमेरिका, कनाडा, रुस के घटनाक्रम साइंस की अनदेखी का नतीजा हैं। क्लाइमेट मॉडलों ने बढ़ते तापमान के विनाशकारी प्रभाव की चेतावनी दी है। 2018 के वैज्ञानिक मूल्यांकन में आगाह किया गया है कि औसत ग्लोबल तापमान में बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम नहीं रखा गया तो विनाशकारी नतीजे होंगे।

समुद्रतटीय शहर डूब जाएंगे। दुनिया के कई इलाकों में फसलें नष्ट हो जाएंगी। डॉ. ओटो और अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम का निष्कर्ष है कि जून में उत्तर पश्चिमी अमेरिका की घटनाएं ग्लोबल वार्मिग के बिना नहीं हो सकती थीं।

शुक्रवार को प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में जलवायु परिवर्तन के कारण सदी के अंत तक यूरोप में बारिश के साथ तूफानों की चेतावनी दी गई है। ब्रिटेन के मौसम विभाग में जलवायु वैज्ञानिक रिचर्ड बेट्स कहते हैं, हमें कार्बन उत्सर्जन कम करके परिवर्तन को रोकना होगा। लेकिन, अमेरिका जैसे साधन संपन्न देश भी इस तरफ ध्यान नहीं देते हैं।

अमेरिका में 2010 के बाद एक हजार व्यक्तियों की मौत बाढ़ से हो चुकी है। देश के दक्षिण पश्चिमी हिस्से में पिछले कुछ वर्षों से गर्मी से मौतें बढ़ रही हैं।

ठंडे साइबेरिया में लगातार तीसरे साल आग से तबाही

अंटार्कटिका के बाद रूस का साइबेरिया विश्व की सबसे सर्द जगह है। लेकिन, पिछले तीन साल से उत्तर पूर्व साइबेरिया जंगलों की भीषण आग का सामना कर रहा है। किसी समय इस इलाके में हमेशा बर्फ जमी रहती थी।

अब बीते कुछ सालों से गर्मियों में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंचता है। पिछले साल 60 हजार वर्गमील क्षेत्र में जंगल और टुंड्रा में आग लगी थी। इस वर्ष तीस हजार वर्ग मील से अधिक इलाके में आग लग गई। वैज्ञानिकों का कहना है, कुछ वर्षों से उत्तर साइबेरिया के तेजी से गर्म होने के कारण अग्निकांड हुए हैं।

सोमिनी सेनगुप्ता

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