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मिडिल क्लास से गरीबी में खिसकने का खतरा है:भारत में मिडिल क्लास के तीन करोड़ लोग गरीब हुए; दूसरी लहर से लुभावने अनुुमानों को धक्का लगा

11 दिन पहले
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दिल्ली के पास नोएडा में महामारी के कारण आर्थिके संकट झेल रहा एक मध्यमवर्गीय परिवार। - Dainik Bhaskar
दिल्ली के पास नोएडा में महामारी के कारण आर्थिके संकट झेल रहा एक मध्यमवर्गीय परिवार।

नोएडा के आशीष आनंद का सपना फैशन डिजाइनर बनने का था। वे पहले फ्लाइट अटेंडेंट थे। उन्होंने रिश्तेदारों से पैसा उधार लेकर दिल्ली के बाहरी इलाके में कपड़े की दुकान खोली थी। वे डिजाइनर सूट, शर्ट और पेंट बेचते था। उन्होंने भारत में कोरोना वायरस का प्रकोप फैलने से कुछ सप्ताह पहले फरवरी 2020 में दुकान खोली थी। देश में दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन लागू होने के दो माह बाद किराया ना चुकाने के कारण उन्हें दुकान बंद करना पड़ी थी। आनंद, उनकी पत्नी और दो बच्चे उन लोगों में शामिल हैं जिनके मिडिल क्लास से गरीबी में खिसकने का खतरा है। अब कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने करोड़ों लोगों को मुसीबत में डाल दिया है। पिछले साल भारत में लगभग तीन करोड़ 30 लाख व्यक्ति गरीब हो चुके हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार दुनियाभर में कुल पांच करोड़ 40 लाख लोग मध्यम वर्ग से नीचे आए हैं।

महामारी ने देश में कई दशक के दरम्यान हुई तरक्की पर पानी फेर दिया है। पहले ही कई बुनियादी समस्याएं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उतावलेपन से लागू नीतियां विकास में बाधा बन रही हैं। सिकुड़ते मध्यम वर्ग से रही-सही कसर पूरी हो जाएगा। मेसाचुसेट्स एमहर्स्ट यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर जयती घोष का कहना है, महामारी से हमारी आर्थिक तरक्की को जबर्दस्त धक्का लगा है।

दूसरी लहर ने देश के सामने कठिन विकल्प रखे हैं। कुछ राज्यों में लॉकडाउन लागू है। फिर भी, मोदी सरकार ने पिछले साल जैसा कड़ा लॉकडाउन लागू करने के संकेत नहीं दिए हैं। उस समय दस करोड़ से अधिक भारतीय बेरोजगार हो गए थे। कई अर्थशास्त्री महामारी की समस्याओं के लिए लॉकडाउन को दोषी ठहराते हैं। सरकार ने अमेरिका सहित अन्य देशों के समान खर्च बढ़ाने के लिए भारी धनराशि नहीं दी है। इसकी बजाय बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में खर्च बढ़ाया गया है। सरकार का जोर कर्ज में कटौती पर है।

मोदी सरकार ने महामारी से निपटने के उपायों को सही ठहराया है। उसका कहना है, वैक्सीनेशन की बढ़ती गति आर्थिक स्थिति बेहतर होने के संकेत देती है। अर्थशास्त्रियों ने अगले साल वापसी की भविष्यवाणी की है। लेकिन, वैक्सीनेशन की धीमी गति (पिछले सप्ताह तक 9 प्रतिशत से कम आबादी को वैक्सीन लगी थी।) से ये अनुमान गलत साबित हो सकते हैं। आठ माह से बेरोजगार मुंबई की 49 वर्षीय निकिता जागड़ के लिए लुभावने अनुमान दूर की बात है। वैसे, पिछले माह उन्हें पिछली नौकरी से आधी तनख्वाह पर जॉब मिल गया है। लॉकडाउन से उनकी नई नौकरी खतरे में पड़ सकती है।

भारतीय मध्यम वर्ग अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। वह चीन का मुकाबला करने की भारतीय महत्वाकांक्षा के खांचे में फिट बैठता है। वहां पहुंचने के लिए भारत सरकार को कोरोना वायरस से पीछे छूट गए लोगों पर ध्यान देना होगा। परिवारिक आय और उपभोग में गिरावट आई है। फिर भी, मांग बढ़ने से कुछ वस्तुओं की बिक्री बढ़ी है। सबसे अधिक मार छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और अन्य छोटे उद्यमियों पर पड़ी है।

प्रभावशाली आर्थिक ताकत है मध्यम वर्ग

भारतीय मिडिल क्लास अमेरिका और कुछ अन्य देशों के मध्यवर्गीय लोगों जितना संपन्न भले ही न हो लेकिन वह एक प्रभावशाली आर्थिक ताकत है। प्यू रिसर्च ने मध्यमवर्ग और उच्च मध्यवर्गीय परिवार के रहन-सहन का दैनिक खर्च 750 रुपए से 3750 रुपए रखा है। भारत में छह करोड़ 60 लाख लोग इस परिभाषा के दायरे में आते हैं। पिछले साल महामारी से पहले इनकी संख्या 9 करोड़ 90 लाख थी। बढ़ते मध्यमवर्ग को ध्यान में रखकर वालमार्ट, अमेजन, फेसबुक, निसान सहित अन्य विदेशी कंपनियों ने भारी निवेश किया है।

गरीबी,बेरोजगारी पर कोई चर्चा तक नहीं करता

सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी के प्रमुख महेश व्यास कहते हैं, भारत में गरीबी, गैरबराबरी, रोजगार की कमी और आमदनी, उपभोग में गिरावट पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है। इस मानसिकता में बदलाव बहुत ज्यादा जरूरी है। व्यास कहते हैं, अधिकतर भारतीय खासकर छोटे कामगार थक चुके हैं और रोजगार की कमी से हताश हैं। जब तक यह समस्या हल नहीं होती है, भारत की तरक्की बाधित रहेगी।

9 करोड़ 90 लाख थी पिछले साल महामारी से पहले भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या।

6 करोड़ 60 लाख लोग रह गए हैं,अब मध्यम वर्ग की परिभाषा के दायरे में।

करनदीप सिंह, हरि कुमार

(स्रोत प्यू रिसर्च।)

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