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गठिया की 2 दवाईयों से कोरोना में फायदा:800 मरीजों पर किए गए ट्रायल में मृत्यु दर में भारी गिरावट आई

5 दिन पहले
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  • टोसिलिजुमाब या सारीलुमाब दवा देने से कोविड-19 के मरीजों की मृत्यु दर लगभग 27 प्रतिशत पाई गई हैे।

ब्रिटिश सरकार ने कोरोना वायरस से गंभीर रूप से बीमार मरीजों के इलाज में गठिया की दो दवाइयों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं। एक नई स्टडी में पता लगा है कि टोसिलिजुमाब या सारीलुमाब दवा देने से कोविड-19 के मरीजों की मृत्यु दर लगभग 27 प्रतिशत पाई गई हैे। दूसरी ओर जिन मरीजों को ये दवाएं नहीं दी गई उनकी मृत्यु दर 36 प्रतिशत रही। ट्रायल के दौरान सभी मरीजों को इंटेसिव केयर में प्रवेश करने के 24 घंटे के भीतर दवाएं दी गई।

इंपीरियल कॉलेज, लंदन के फिजिशियन डॉ. एंथोनी गॉर्डन का कहना है, यह जानना आश्चर्यजनक है कि इस महामारी में उपलब्ध दवाइयों से जिंदगी बचाई जा सकती है। डॉ गॉर्डन के नेतृत्व में यह स्टडी हुई है। ये दवाइयां डेक्सामीथासोन जैसे कुछ स्टेरॉयड की सूची में शामिल हो गई हैं जिनके कारण कोविड मौतों की संख्या घटी है। स्टडी में शामिल लोगों को भी अस्पताल में स्टेरॉयड दिए गए थे। 800 मरीजों पर हुए ट्रायल में मृत्यु दर में भारी गिरावट से कुछ विशेषज्ञ चकित हैं। टोसिलिजुमाब और सारीलुमाब के प्रभाव का परीक्षण करने के लिए पहले हुए कुछ अन्य अध्ययनों में वायरस से संक्रमित लोगों को बहुत कम फायदा हुआ था। कई दवा कंपनियों ने दवा के ट्रायल बंद कर दिए थे। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ इस्टीट्यूटस ने क्लीनिकल ट्रायल को छोड़कर इलाज में इस दवा का उपयोग बंद कर दिया था। लेकिन,नई स्टडी के नतीजों से विशेषज्ञों का हौसला बढ़ा है।

इम्यून सिस्टम को सहारा

कोविड की कई अन्य दवाइयां कोरोना वायरस को निशाना बनाती हैं पर टोसिलिजुमाब और सारीलुमाब चुपचाप इम्यून सिस्टम के साथ मिलकर वायरस को बेअसर करती हैं। नई स्टडी अभी किसी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई है। फिर भी, उसके बेहतर परिणामों की वजह से ब्रिटेन में सरकार ने अस्पतालों में टोसिलिजुमाब रखने के निर्देश दिए हैं।

ब्रिटेन के बाहर कुछ विशेषज्ञ सावधानी बरत रहे हैं। अमेरिकी विशेषज्ञों डॉ. श्वार्टज और डॉ.केपलान लुईस का कहना है, हालांकि फूड, ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा अमेरिका में इन दवाओं के इमर्जेंसी इस्तेमाल की अनुमति के लिए पर्याप्त डेटा उपलब्ध है पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। संक्रामक बीमारियों फिजिशियन डॉ, कबिसेन टिटानजी का कहना है, स्टडी में केवल चार प्रतिशत अश्वेत शामिल थे। इसलिए सामान्य लोगों पर इसके परिणाम लागू नहीं होंगे। यह पता लगाने के लिए और अधिक स्टडी की जरूरत है कि दोनों दवाइयां कब और किस तरह के मरीजों को फायदा पहुंचा सकती हैं। यह भी पता लगाना जरूरी है कि पूर्व के ट्रायल में ये दवाइयां असरकारक क्यों नहीं पाई गई थीं।

कैथरीन वू

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