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यह सब की बात है:51 साल पुरानी फ़िल्म 'सत्यकाम' जिसने दुनिया की निर्लज्जता को खेंचकर चौराहे पर खड़ा कर दिया था

राजकुमार केसवानी7 महीने पहले
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जिस दौर में चारों ओर झूठ का बोलबाला हो, उस दौर में सच के नाम का एक दीया ज़रूर जला लेना चाहिए। जब न्याय-अन्याय के बीच की लकीरें मिट रही हों तो उन मद्धम पड़ती लकीरों पर जिस्म के चंद लाल क़तरे बिछाकर उसकी अस्मत की हिफ़ाज़त ज़रूर करनी चाहिए। मेरी नज़र में यह इंसानियत की सबसे बड़ी ख़िदमत है। अब चूंकि मैं अपनी बात फ़िल्म के ज़रिए कहना चाहता हूं तो बार-बार घूम-फिरकर एक ही फ़िल्म पर लौट आता हूं। दिल कहता है इस एक फ़िल्म को अपनी होली और दीवाली बना लो। तो हुज़ूर यह ‘दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं।’ तो लीजिए फिर एक बार बात ‘सत्यकाम’ की।

‘सत्यकाम’ महज़ 51 साल पुरानी फ़िल्म है, लेकिन सच और झूठ की लड़ाई हज़ारों साल पुरानी। हर गुज़रते दिन के साथ मालूम होता है कि सच की सांसें उखड़ रही हैं। आस छूटती और उम्मीद टूटती सी महसूस होती है। लेकिन यह सब महज़ इंसानी अहसासात का सच है। सच की सिफ़त और सच की ताकत ही यही है कि वो हर हाल में सच ही रहता है। दुनिया के हर बदलाव से अप्रभावित, अक्षुण्ण। सत्य का आदि सत्य और अंत भी सत्य है।

फ़िल्म ‘सत्यकाम’ के संवाद लेखक राजेंद्र सिंह बेदी ने दादाजी की भूमिका निभाते अशोक कुमार से एक बड़ी पते की बात कहलवाई है; ‘सच बोलने का अभिमान नहीं... सच बोलने का साहस होना चाहिए।’ यह फ़िल्म इसी संवाद का ज़िंदा सबूत है।

फिल्म की शुरुआत होती है, एक कहानी के साथ जो इस तरह है ...

सत्यकाम ने गुरु गौतम के पास जाकर कहा : भगवन मुझे अपना शिष्य बनाइये।

गुरु गौतम ने पूछा : तुम्हारा गोत्र क्या है?

सत्यकाम ने कहा : मां से मैंने पूछा था। मां ने कहा बहुतों की सेवा करके तुम्हें पाया। इसलिए तुम्हारे पिता का नाम मैं नहीं जानती। लेकिन मेरा नाम जबाला है इसलिए तुम्हारा नाम जबाल सत्यकाम है। यही कहा।

गौतम ने सत्यकाम का सर चूमकर कहा : तुम्ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हो, क्योंकि तुममें सत्य बोलने का साहस है।

दोस्तों, यह एक कहानी है। पौराणिक कहानी। मगर सच तो यह है कि मेरे अन्दर आज तक न तो यह कहानी खत्म हुई है और न यह फिल्म। मैं खुद भले ही न सत्यकाम सा सत्यवादी बन पाया और न ही फिल्म के नायक सत्यप्रिय आचार्य जैसा महान आदर्शवादी, मगर वैसा हो पाने की ललक ज़रूर रही है। आज भी है। मैं जानता हूं मेरी तरह के असफल लोगों की एक बड़ी तादाद है। सो सत्यकाम की यह बात अपनी उन्हीं तमाम दोस्त-अहबाब के नाम है।

इस फ़िल्म का अंत भी उसके आरम्भ की तरह ही है। कथा के नायक सत्यप्रिय की मृत्यु हो जाती है। दादा (अशोक कुमार) जिसने सत्यप्रिय के विवाह और बच्चे को कभी स्वीकार नहीं किया। वजह यह कि वह शादी से पहले हुए बलात्कार से जन्मा है। वही बच्चा सार्वजनिक रूप से सामने आकर उनसे कहता है कि वे इसलिए दूर रखना चाहते हैं क्योंकि वह उनके पोते का बेटा नहीं है। सत्यकामनुमा इस सच से हैरान दादाजी अपने भगवा वस्त्रों और लहराती सफेद दाढ़ी में बेचैन होते पूछते हैं कि आखिर इतने छोटे से बच्चे को इतना कड़वा सच किसने बताया। बालक ने जवाब दिया - ‘मां ने’।

हर युग में मां जबाला और सत्यकाम होते रहे हैं, होते भी रहेंगे फिर चाहे दुनिया भले ही उनको उनके सत्य रूप में पहचान पाए कि न पहचान पाए। वह होते ज़रूर हैं।

अब ज़रा फ़िल्म की मुख़्तसर सी कहानी। सत्यप्रिय आचार्य यानि धर्मेन्द्र इंजीनियरिंग का छात्र है। वह एक ऐसे परिवार से आता है जिसमें पीढ़ियों से सत्य, धर्म और शुद्ध आचरण के प्रति घनघोर समर्पण है। पिता तो परिवार छोड़कर संन्यासी भी बन गए और ऋषिनुमा दादा के सानिध्य में बचपन गुज़रा है। सत्यप्रिय का सत्य के प्रति आग्रह और आचरण की शुद्धता दीवानगी की हद तक है। संजीव कुमार यानि नरेन उसका सहपाठी और सबसे नज़दीकी दोस्त है।

जिन लोगों को हमारे भ्रष्ट तंत्र की जानकारी है वे बखूबी जानते हैं कि इंजीनियर होने का अर्थ सबकी नज़रों में मलाईदार ओहदा है। राजनैतिक भ्रष्टाचार के भागीदार बनने को लालायित कुछ लोगों ने सारी कौम पर ऐसा लेबल चस्पा किया है कि हटाए नहीं हटता। जो इस लेबल से मुक्त होकर जीने की कोशिश करता है वह उसकी कीमत इस या उस रूप में ज़रूर चुकाता है। याद कीजिए उत्तर प्रदेश के उस इंजीनियर हत्याकाण्ड को जिसने नेताओं को चन्दा देने से इंकार कर दिया था। वही। लगभग वही हश्र इस सत्यप्रिय आचार्य का भी फिल्म में होता है। वह आखिर लड़ते-भिड़ते कैंसर का शिकार हो जाता है। शायद कथा लेखक नारायण सान्याल और निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी प्रतीक रूप में कहना चाहते थे कि भ्रष्टाचार बहुत बड़ा कैंसर है जो ईमान को खा जाता है।

पूरी कहानी जानबूझकर नहीं सुना रहा लेकिन हम सब खूब जानते हैं कि सत्यप्रिय जैसे लोगों की समाज में क्या दुर्दशा होती है और कैसे होती है। बात को ज़रा सलीके से आगे बढ़ाने के लिए इतना भर ज़रूर बताऊंगा कि सत्यप्रिय ने अपने इसी नैतिक दबाव के तहत रंजना (शर्मिला टैगोर) से शादी की जो कि एक ठेकेदार की हवस का शिकार होकर गर्भवती हो चुकी है। सत्यप्रिय ख़ुद को इस बलात्कार का दोषी मानता है क्योंकि उसने रंजना को उस समय ठेकेदार से बचाने की कोशिश नहीं की जब उसके साथ बलात्कार हो रहा था। शादी के बाद उसने रंजना, जो कि एक वैश्या की संतान है, को न सिर्फ पत्नी का दर्जा दिया बल्कि उसके बेटे को भी अपना नाम दिया, वह भी बिना किसी अपेक्षा के।

फिल्म के अंत में एक निहायत ख़ूबसूरत बात दिखाई गई है। ठेकेदार जिसने सत्यप्रिय के कारण पहले बहुत घाटा उठाया और फिर नाराज़ होकर उसका तबादला भी करवाया था, अंत में वही ठेकेदार आखिर में उसकी बीमारी में सबसे बड़ा सहारा बनकर खड़ा हो जाता है। यह क़ाबिले क़ुबूल बात है कि इंसान हरदम शैतान नहीं होता।

यह फिल्म देखना ख़ुद को परेशानी में डालना है। जी चाहता है कि ऐसी परेशानी को बार-बार सीने से लगा लूं ताकि जितना कुछ बच पाया है कम से कम वही बचा रह जाए। इस फिल्म से जुड़ा हर इंसान इतनी बुलन्दी पे नज़र आता है कि बार-बार सजदे में सर झुकाने को जी चाहता है। धर्मेंद्र के लगभग 60 बरस लम्बे फ़िल्मी केरियर की यह सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म है। उन्होंने अपने किरदार को इतना सच्चा और इस हद तक विश्वसनीय बनाया है कि यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह वही इंसान है जो फ़िल्म ‘फूल और पत्थर’ में शाका बना है। हृषिकेश मुखर्जी तो इसे अपने जीवन की श्रेष्ठ फ़िल्म मानते ही थे। लेकिन हज़ार फ़र्शी सलाम के हक़दार हैं लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी।

वाह! क्या खूब संवाद लिखे हैं। ऐसा लगता है मानो हमारे समाज की पूरी की पूरी निर्लज्जता को खेंचकर चौराहे पर खड़ा कर दिया है कि लीजिए कीजिए अब इनका हिसाब।

सबसे पहले मुलाहिज़ा हो यह सीक्वेंस। ठेकेदार सप्रू, इंजीनियर सत्यप्रिय आचार्य से एक ऐसे नक्शे पर दस्तखत चाहता है जो उसने नहीं बनाया। इंकार पर एक ब्लैंक चेक़ देता है जिसे सत्यप्रिय रिश्वत कहकर ठुकराता है। इस पर सप्रू का संवाद है : ‘आप इसे रिश्वत कहते हैं। हुं! इसके भी भगवान कृष्ण की तरह 108 नाम हैं, आचार्य साहब। दिल्ली में इसे दस्तूरी कहते है। बिहार में ... बंगाल में इसे बड़ी खुशी से कहते हैं पान खाने के दिए। तमिल और तेलगू में इस सुन्दरी को क्या कहते हैं मैं नहीं जानता। क्योंकि आप सच्चाई के पुतले हैं तो आपकी सहूलियत के लिए मैं इसका नाम आनरेरियम रखे देता हूं। लीजिये।’ धरम पा जी चेक फाड़ देते हैं। ‘...राय साहब, तमिल और तेलगू में तो इसका नाम मैं भी नहीं जानता मगर हर भाषा में इसका जवाब यही है।’

दूसरी जगह दूसरे ठेकेदार से विवाद होता है और हमारा हीरो फिर अपनी ठसक के साथ सच के पक्ष में खड़ा हो जाता है। उसके जाने के बाद ठेकेदार अपने मुनीमनुमा मुसाहिब से कहता है : ‘हर आदमी की अपनी-अपनी कीमत होती है।’

‘बहुत ही मुश्किल है सर! सुना है यह आदमी बहुत ही बदमाश और एक नम्बर का पाजी है। रिश्वत वगैरह नहीं खाता सर।’

सत्यप्रिय के हालात को लेकर परेशान उसका सबसे करीबी दोस्त नरेन (संजीव कुमार) अपनी भाभी रंजना से कहता है; ‘भाभी, सत्यप्रिय तो सोना है, सोना।’ भाभी कहती है; ‘पर सोने का ज़ेवर बनाने के लिए तो उसमें भी कुछ मिलावट करनी ही पड़ती है।’

मगर सच तो यह है कि सोना भी तब तक ही सोना है जब तक वह ज़ेवर नहीं बना। उसके बाद तो वह सोना नहीं, सोने का ज़ेवर हो जाता है।

इस फिल्म में संजीव कुमार दोस्त होने के अलावा कथा का सूत्रधार भी है। कथा कहते हुए वह अपने मरहूम दोस्त की बात करते हुए कहता है ‘… ऐसा लगता था मानो उसका झगड़ा दुनिया से ही नहीं, खुद से भी है।’

‘जो है और जैसा है’ को जीवन का सच मानने वालों के बहुमत के बीच सत्यप्रिय जैसे हर इंसान को अंदर-बाहर लगातार जूझना ही पड़ता है। इस स्थिति पर सत्यप्रिय का एक संवाद आता है; ‘… मैं इंसान हूं। भगवान की सबसे बड़ी सृष्टि। मैं उसका प्रतिनिधि हूं। किसी अन्याय के साथ कभी सुलह नहीं करूंगा। कभी नहीं करूंगा।’ और...

और हां, एक और ख़ूबी है हृषि दा की इस फ़िल्म की। इस फ़िल्म में सवाल ही सवाल हैं। जवाब नहीं। यह सवाल हमारे सवाल हैं। हम सब के सवाल, लिहाज़ा एक या दो के जवाब काफ़ी नहीं होंगे। सबको एक साथ ढूंढने हैं जवाब।

ताज भोपाली ने बहुत पहले यही बात कही थी :

मैं चाहता हूं, निज़ाम-ए-कुहन बदल डालूं (पुरातन व्यवस्था) मगर यह बात, फ़क़त मेरे बस की बात नहीं उठो, बढ़ो मेरी दुनिया के आम इंसानो यह सब की बात है, दो-चार-दस की बात नहीं। जय-जय।

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