पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

आपस की बात:चाकू-छुरी और बंदूक बिना भी घिनौने विलेन का किरदार निभाने वाला शख्स

राजकुमार केसवानीएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
फ़िल्म 'मदर इंडिया' के एक दृश्य में सुक्खी लाला के किरदार में कन्हैयालाल। - Dainik Bhaskar
फ़िल्म 'मदर इंडिया' के एक दृश्य में सुक्खी लाला के किरदार में कन्हैयालाल।

फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ को अक्सर नरगिस के साथ जोड़कर ही देखा जाता है। लेकिन सच तो यह है कि बिना सुक्खी लाला के सच सामने ही नहीं आता। अगर कहानी और अभिनय के लिहाज़ से देखा जाए तो दोनों किरदार और दोनों अदाकार एक दूसरे से इक्कीस होते हुए ही दिखाई दे जाते हैं।

कन्हैयालाल इस गुज़रे दौर का एक ऐसा अद्भुत कलाकार था, जिसकी बदल न कभी उनसे पहले थी और न ही उनके बाद। फ़िल्मी पर्दे पर फ़िल्मी खलनायक तो एक से एक आला किस्म के नज़र आए लेकिन कन्हैयालाल के स्वाभाविक अभिनय की सिफ़त यह थी कि उनका हर किरदार विश्वसनीय लगता था। बिना किसी चाकू-छुरी और बंदूक और अजब-अजब घिनौनी शक्लें या सिगरेट के छल्ले बनाकर ख़ुद को गुंडा या असामाजिक तत्व बनाने की बजाय हमारे-आपके बीच का ही एक इंसान बनकर इंसान के एक घिनौने रूप को उजागर करने में माहिर। उसी वक़्त बिना वलगर हुए अद्भुत कामेडी भी कर डालते थे। वो लेखक भी थे और कवि भी। फ़िल्मों के लिए डायलाग और गीत भी लिखे हैं।

कन्हैयालाल का जन्म हुआ था 1910 में बनारस में। पिता भैरोदत्त चौबे की अपनी एक नाटक मंडली थी - सनातन धर्म नाटक समाज। कन्हैयालाल के बड़े भाई संकटा प्रसाद तो पिता के नाटकों में अभिनय करते थे लेकिन कन्हैयालाल को उन्होंने स्टेज के अन्य कामों में लगा दिया। कभी-कभार छोटे-मोटे रोल्स भी कर लेते।

स्टेज का मज़ा और स्टेज का नशा, सिर्फ़ वही समझ सकता है जिसने स्टेज पर काम किया हो। चचा ग़ालिब के इश्क़ की तरह - ‘कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।’ सो कन्हैयालाल को स्टेज की लत सी लग गई और घरवालों ने चार जमात पास कर लेने के बाद उनको बिठा दिया एक किराने की दुकान पर। बनारस में एक मस्जिद के पास की इस दुकान की गद्दी पर बैठने वाले किशोर वय के इस लड़के की नज़रें दुकान की तराजू पर कम और घड़ी पर ज़्यादा रहती थीं। घड़ी का रिश्ता नाटक से था। उसमें देखकर ही मालूम होता था कि नाटक का समय हो गया है। घड़ी का इशारा मिलते ही दुकान बंद। ग्राहक खड़े हों कि चिला रहे हों कन्हैया बाबू बिला नागा भागते हुए नाटक में पहुंच जाते। नतीजा वही हुआ जो होना था। दुकान ठप और ग्राहक नदारद। थक-हार पिता को हार माननी पड़ी और नाटक मंडली में शामिल करना पड़ा।

कन्हैयालाल को स्टेज पर बाकायदा एक रोल मिला आगा हश्र काश्मीरी के नाटक ‘आंख का नशा’ में। यह भूमिका थी एक तबले वाले की। उसके बाद तो वो स्टेज पर जम ही गए। नाटक लिखने भी लगे। 1930 में नाटक ‘कृष्ण सुदामा’ में वे बने सुदामा। इस सुदामा को देखने वाले कभी भूल न पाए।

‘मैं अंग्रेज़ों का जासूस था’, ‘क्रांतिवीर चन्द्रशेखर आज़ाद और उनके दो ग़द्दार साथी’ जैसी पुस्तकों के लेखक धर्मेंद्र गौड़ लिखते हैं कि ‘... कृष्ण सुदामा नाटक ने मैनपुरी जैसे छोटे शहर में लगातार आठ दिन चलकर ख़ासी धूम मचा दी। ‘सुदामा’ की भूमिका में प्राण डालने वाले कन्हैयालाल ने सबका मन मोह लिया। बाज़ारों, गलियों, घरों तक में उनका अभिनय चर्चा का विषय बन गया। लोगों की ज़ुबान पर था, ‘न्यू एल्फ़्रेड कोरंथियन (उस दौर की प्रसिद्ध ड्रामा कम्पनी) की ऐसी-तैसी करके रख दी कन्हैयालाल ने।’

पिता की मृत्यु के बाद दोनों भाइयों ने मिलकर नाटक मंडली को चलाने की कोशिश की मगर सफ़लता न मिली। थक हार बड़े भाई संकटा प्रसाद बम्बई निकल लिए और उस दौर की गूंगी फ़िल्मों में काम करने लगे। कन्हैयालाल बनारस में ही डटे रहे। लेकिन कब तक? सो उन्होंने भी एक दिन बम्बई की राह ली। इरादा था राइटर-डायरेक्टर बनने का लेकिन मौका मिला एक्स्ट्रा का। वह भी चिमनलाल देसाई की सागर मूवीटोन में जहां इम्पीरियल के एक्स्ट्रा महबूब ख़ान डायरेक्टर बनकर कामयाब हुए थे। पहली बार कैमरे के सामने आने का मौका मिला 1938 की फ़िल्म ‘सागर का शेर’ में लेकिन डायलाग बोलने का मौका मिला फ़िल्म ‘झूल बदन’ में। वह भी एक संयोग से। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की कथा पर आधारित इस फ़िल्म के हीरो मोतीलाल के पिता की भूमिका निभाने वाला कलाकार ऐन वक़्त पर सेट से ग़ायब था। आनन-फ़ानन में इस ‘एक्स्ट्रा’ कन्हैयालाल को यह रोल करने के लिए बुला लिया गया। हाथ में दे दिए गए एक फ़ुल स्केप शीट लम्बे डायलाग। बक़ौल कन्हैयालाल सेट पर मौजूद लोग अपनी हंसी दबाए मेरी फ़जीहत का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन पहला शॉट ही ओके हो गया। तनख़्वाह 35 रुपए से बढ़कर 45 रुपए हो गई।

इतने लम्बे डायलाग्स को इस कामयाबी से अदा कर जाने के पीछे एक राज़ भी है। राज़ यह है कि कन्हैयालाल अपने डायलाग पढ़ ज़रूर लेते थे लेकिन बोलते समय सीन के हिसाब से उसमें अपनी लेखकीय प्रतिभा के दम पर रद्दो-बदल भी कर लेते थे। यह बदलाव हमेशा ही पसंद किया गया और सराहा भी गया। सो यह जान लें कि उनके बोले गए संवादों में ख़ुद उनका अद्भुत योगदान रहता था।

एक छोटी सी मिसाल देता हूं। बिमल रॉय की फ़िल्म ‘नौकरी’ में वे एक नौकर हरि की भूमिका निभा रहे थे। एक सीन में मालिक तीन-चार बार आवाज़ देता है - हरि, ओ हरि! कुछ देर में हरि मतलब कन्हैयालाल आता है और देर की माफ़ी वाले असल संवाद की जगह अपने रचे संवाद बोलता है - ‘मालिक, इस बहाने सुबह-सुबह भगवान का नाम ले लिया, तो क्या बुरा हुआ?’ बिमल रॉय पहले तो चकित हुए और फिर मुस्कराकर शाट ओके कर दिया।

सागर मूवीटोन के ज़माने में ‘साधना’(38) और ‘संस्कार’(39) के गीत और संवाद उन्होंने कन्हैयालाल चतुर्वेदी के नाम से लिखे थे। उस वक़्त उनके लेखन की प्रशंसा भी हुई थी। गीतों के कुछ मुखड़े सुन लें। ‘कैसा जादू डाला, भोली भाली भाभी ने’(संस्कार)। ‘साधना’ में मिस बिब्बो के गाए ‘अब तो बजे बधाई, प्रीतम घर हो आई’ और ‘कलियां बनतीं फूल, देख कर दुनिया जाती भूल’ और हरीश का गाया ‘सावन आए या न आए, पिया घर आए सावन है।’

इस गीत के बोल सुनकर आपको 1966 की फ़िल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ के लिए शकील बदायूनी का लिखा, मुहम्मद रफ़ी और आशा भोसले का गाया ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है’ तो याद नहीं आ गया? कोई ख़ास बात नहीं। ऐसा तो होता ही रहता है। और यूं भी पहले गीत में पिया के घर आने पर सावन है और दूसरे में जिया के झूमने पर सावन है।

लेखक वजाहत मिर्ज़ा कन्हैयालाल की इस प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। जिस वक़्त उनकी लिखी फ़िल्म ‘औरत’(40) के लिए सुक्खी लाला के किरदार की बात आई तो उन्होंने महबूब को समझा दिया कि अकेले कन्हैयालाल ही इस किरदार को ज़िंदा कर देने की क़ुव्वत रखते हैं। महबूब ख़ान ने बात मान ली और ख़ुद भी इस बात के इस क़दर कायल हुए कि जब ‘मदर इंडिया’ बनाने की बारी आई तो ‘औरत’ की सारी कास्ट बदल देने के बावजूद सुक्खी लाला के लिए कन्हैयालाल को ही बुलाना पड़ा। और कन्हैयालाल ने दूसरी बार में तो पहली बार वाले अपने बेंचमार्क को क़ुतुब मीनार की ऊंचाई तक ऊपर उठा दिया।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि इस फ़िल्म के लिए नरगिस के बाद सबसे ज़्यादा फ़ीस कन्हैयालाल को ही दी गई थी। यह रकम थी पूरे दस हज़ार। नरगिस को मिले थे माहाना 5000 रुपए।

राजेंद्र कृष्ण लिख गए हैं कि ‘कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते।’ सच है। कहने को वाकई बहुत कुछ है लेकिन समेटना पड़ेगा। लेकिन एक बात ज़रूर कह छोड़ूंगा कि कन्हैयालाल के अभिनय का आकलन करना हो तो उनकी 120 फ़िल्मों में निभाई कई सारी भूमिकाओं को देखना पड़ेगा। ख़ासकर 1969 की फ़िल्म ‘धरती कहे पुकार के।’ इस फ़िल्म में वो ‘मदर इंडिया’ से एकदम उलट, एक कर्ज़दार किसान है। अपने छोटे भाई संजीव कुमार की वकालत की पढ़ाई के लिए ज़मींदार के पास अपनी ज़मीन गिरवी रखकर कर्ज़ लेकर पिसता किसान।

दिलीप कुमार की ‘गंगा जमुना’(61) के मुनीमजी के रूप में कुत्ते से जान बचाने की कोशिश में किए गए उनके करतब और उससे पैदा होने वाली ख़ालिस कामेडी, भुलाए नहीं भूलती। दिलीप कुमार ने ख़ुद भी कहा है कि कन्हैयालाल के साथ सीन करना चुनौती से कम नहीं था।

और तो और मोतीलाल जैसे दिग्गज अभिनेता की राय भी दिलीप कुमार से कुछ अलग न थी। बात 1944 की है। धर्मेंद्र गौड़ ने उनसे सवाल किया, ‘कन्हैयालाल के बारे में आपकी क्या राय है?’ जवाब मिला; ‘उस ज़ालिम के बारे में पूछते हो? ‘पगली दुनिया’(41) में बखिया उधेड़ कर रख दी मेरी! ... उससे अच्छा केरेक्टर एक्टर तो पैदा ही नहीं हुआ। मैं तो उसे ‘गुरु’ मानता हूं।’

कुछ दिन बाद इन्हीं गौड़ साहब ने कन्हैयालाल से मोतीलाल को लेकर वही सवाल किया। कन्हैयालाल गंभीर हो गए और बोले; ‘मोती ‘मोती’ है। उसका जवाब नहीं। ‘पगली दुनिया’ में मुसीबत करके रख दी थी मेरी। हालांकि चित्र में मैं उसका बड़ा भाई बना था। मैं उसे अभिनय कला में ‘गुरु’ मानता हूं।’

कहिए। लगता है न कि गाया जाए - ‘जाने कहां गए वो दिन?’ एक दूसरे की क़द्र करने वाले अब जो कहीं दिख जाएं तो ख़बर ज़रूर करें।

कन्हैयालाल की अभिनय प्रतिभा से भी ज़्यादा बड़ी चीज़ थी जीवन में उनकी सहजता और ईमानदारी। अव्वल तो वो पब्लिसिटी वग़ैरह से बचते रहते थे। मजबूरन कभी किसी पत्रकार से बात भी की तो सच्ची और खरी। ऐसे ही एक बार उन्होंने एक पत्रकार को झिड़क दिया कि उनके अवगुण छिपाकर सिर्फ़ उसकी तारीफ़ में पुल बांध दिए। ज़रा उस फटकार को उन्हीं की भाषा में सुनिए।

‘यह इंटरव्यू लिखा है। सब गुड़ गोबर कर दिया। तारीफ़ के पुलिंदे बांध दिए। असलियत गोल कर दी। कहां लिखा कि मेरी दो बीवियां हैं? दुनिया का कोई नशा नहीं छोड़ा? गांजा-भांग, चरस, शराब-क़बाब। किसी चीज़ से परहेज़ नहीं। दिन भर मुंह में पान ठूंसे रहते हैं। यह सब कहां गया? कलम पकड़ना आता नहीं, चले हैं इंटरव्यू लेने।’

अब इसके बाद मैं क्या कहूं?

और ...

1965 में एक बड़ी लाजवाब फ़िल्म आई थी –’ऊंचे लोग’। फ़िल्म में अशोक कुमार, राज कुमार और फ़िरोज़ ख़ान की मुख्य भूमिकाएं थीं। कन्हैयालाल भी थे। उनका एक सीक्वेंस बहुत याद आता है। अशोक कुमार के घर के बाहर कुत्ता खड़ा है और अंदर जाने को खड़े कन्हैयालाल पर भौंकता है। अब आगे बात नमक की है, सो उसे कन्हैयालाल की ज़बानी, एक फ़लसफ़े के साथ सुन लीजिए।

‘चिलाना नहीं बेटा, चिलाना नहीं। मैं तेरे लिए लाया हूं नमकीन बिस्किट। ये ले ... ले।’

बिस्किट डालकर वह आगे बढ़ता है तो कुत्ता फिर भौंकता है।

‘अरे तू अपनी जात को बदनाम करता है। सुना नहीं तुमने कि कुत्ता कभी नमक हराम नहीं होता। तभी तो तेरे लिए नमकीन बिस्किट लाया था।’

पता नहीं कौन सही है। मैंने तो सुना है कि हमारे ज़माने में तो अपनी ड्यूटी भूलने के लिए लोग ‘मिठाई’ खिलाते हैं। नहीं अगर मैं गलत हूं तो कृप्या मुझे ज़रूर बताएं। अब ईमान की बात तो यह है कि फ़िलहाल तो मैं भी कुछ खाना चाहता हूं। मतलब बीवी जो खिला दे। ...

जय-जय

खबरें और भी हैं...

    आज का राशिफल

    मेष
    Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
    मेष|Aries

    पॉजिटिव- आर्थिक दृष्टि से आज का दिन आपके लिए कोई उपलब्धि ला रहा है, उन्हें सफल बनाने के लिए आपको दृढ़ निश्चयी होकर काम करना है। कुछ ज्ञानवर्धक तथा रोचक साहित्य के पठन-पाठन में भी समय व्यतीत होगा। ने...

    और पढ़ें