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टॉकिंग पाइंट:फ़िल्मों की 'क्रूर दुनिया' में एक मोहक मुस्कान

भावना सोमाया8 दिन पहले
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आज से 30 साल पहले 21 फरवरी 1991 को जानी-मानी अभिनेत्री नूतन ने अंतिम सांस ली थी। नूतन ने चौदह साल की उम्र में ‘हमारी बेटी’ से कॅरिअर की शुरुआत की थी जो 1950 में रिलीज हुई थी। 1955 में ‘सीमा’ आई और उसके बाद उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

मैं 1977 में पहली बार नूतन से तब मिली थी, जब मुझे ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ फिल्म की शूटिंग की रिपोर्टिंग करने का दायित्व सौंपा गया था। निर्देशक राज खोसला ने लंच के दौरान मुझे नूतन से मिलवाया। पहली ही मुलाकात में वे बहुत ही मिलनसार लगीं। उन दिनों फिल्मों की रिपोर्टिंग करने वाले मुझ जैसे नवोदित पत्रकारों के लिए सेट पर पूरा दिन बिताना सामान्य बात थी, ताकि हम फिल्म यूनिट के लोगों के साथ मित्रता कर सके और फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया को निकट से जान सके। उन दिनों अभिनेता-अभिनेत्री भी पत्रकारों की उपस्थिति में इतना असहज महसूस नहीं करते थे, जैसा कि आज के जमाने में होता है।

करीब एक घंटे के बाद नूतन ने पत्रकारों के साथ बातचीत शुरू की। अधिकांश पत्रकार पहले से ही तैयार किए हुए ऐसे सवाल लाए थे, ताकि उनसे विवाद पैदा हो सके। मैंने नूतन से कहा- ‘मैंने एक दिन पहले ही दूरदर्शन पर बिमल राय के बारे में आपका साक्षात्कार देखा है। आपने ‘बंदिनी’ के कई महत्वपूर्ण दृश्यों को जिस तरह से समझाया, वह बहुत अच्छा लगा।’ वे मुस्कुराई और कहा, ‘बिमल दा दिग्गज सर्जक थे और बड़े अच्छे से कहानियां बुनते थे।’

नूतन ने ‘सुजाता’ के बारे में भी बातें की, लेकिन मुझे याद नहीं कि उस समय उन्होंने जो कुछ कहा था, उसे मैं पूरी तरह से समझ भी पाई थी या नहीं। लेकिन वे जिस तरह से और जितनी मीठी आवाज में बोल रही थीं, उस वजह से मैं बहुत देर तक वहां ठहरी रही।

मेरी उनसे दूसरी बार मुलाकात एक दशक के बाद सुभाष घई द्वारा ‘मेरी जंग’ के लिए आयोजित एक पार्टी में हुई थी। उस पार्टी में नूतन भी अपने पति रजनीश बहल के साथ आई थीं। लेकिन वे बहुत ज्यादा लोगों से घुली-मिली नहीं। दोनों एक कोने में ही बैठे रहे और फिर जल्दी से वहां से निकल गए।

एक दशक और गुजर गया। और फिर अचानक एक दिन मेरी भेंट नूतन की करीबी दोस्त व पत्रकार ललिता तम्हाने से हो गई। ललिता ने मुझसे कहा कि वे नूतन पर एक किताब लिख रही हैं, लेकिन उन्हें भरोसा नहीं है कि किताब पूरी भी हो पाएगी या नहीं। मैंने इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि नूतन इन दिनों कैंसर से जूझ रही हैं और उनके पास बहुत कम वक्त बचा है। ललिता ने कहा, ‘इतने सालों तक फिल्मों में काम करने के बावजूद यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कोई भी उनके बारे में पूछ नहीं कर रहा है? फिल्मों की दुनिया इतनी क्रूर क्यों है?’ ललिता के ये शब्द मेरे जेहन में सदैव गूंजते रहे। मैं हमेशा सोचती हूं कि हमें लोगों की याद उनके गुजर जाने के बाद ही क्यों आती है।

आज भी जब मैं नूतन की फिल्में देखती हूं तो रूपहले पर्दे पर उनके जादुई क्षणों से मोहित हो जाती हूं। मैं घड़ी की सुइयों को पीछे ले जाना चाहती हूं और उनसे पूछना चाहती हूं कि ‘सीमा’ में जब शुभा खोटे गाती है कि ‘बात बात में रुठो ना’ तो उस समय वे क्या सोच रही थीं। वे उस समय क्या महसूस कर रही थीं जब ‘काली घटाएं छाए मोरा जीया घबराए’ पर वे रोमांस कर रही थीं? मैं उनसे कहना चाहती हूं कि ‘बंदिनी’ में वे गलत नाव में सवार हो गई थीं। अगर वे धर्मेंद्र को चुनती तो ज्यादा खुश रहतीं। मैं उनसे कई बातें पूछना चाहती हूं, कई बातें कहना चाहती हूं। नूतन, क्या आप इसके लिए मुझे एक अवसर देंगी?

(भावना सोमाया जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार हैं।)

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