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आपस की बात:एक तिलकधारी ब्राह्मण ने रखी थी पांच वक़्त के नमाज़ी डायरेक्टर महबूब ख़ान के स्टूडियो की नींव

राजकुमार केसवानी3 महीने पहले
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मुंबई के बांद्रा में स्थित महबूब स्टूडियो। - Dainik Bhaskar
मुंबई के बांद्रा में स्थित महबूब स्टूडियो।

लम्बी उम्र की दुआओं के पीछे अक्सर मां-बाप की मुहब्बत होती है और मुहब्बत की ताकत यह है कि वो उम्र की लम्बाई के बिना भी वो कारनामे कर दिखाती है जो लम्बी-लम्बी उम्र वाले भी नहीं कर पाते। महबूब ख़ान भी इस बात की एक मिसाल हैं। कुल जमा 58 बरस का वक़्त मिला और इस मुख़्तसर से वक़्त में वो इतना कुछ कर गए कि 1906 में जन्मे इस इंसान के कारनामों को 2021 में याद करने के लिए आज दसवें हफ़्ते भी यह सिलसिला जारी है।

'मदर इंडिया' की बात फिर से शुरू करने से पहले मैं बात करूंगा महबूब स्टूडियो की। महबूब ख़ान की दूरंदेशी का ही नतीजा है कि इस हर रोज़ रंग बदलती दुनिया में आज 67 साल बाद भी अपने वजूद को कायम रहे हुए है। यूं भी नहीं कि इस दर्मियान इसके बंद होने की नौबत न आई हो लेकिन एक अनपढ़ की वसीयत ने तमाम पढ़े-लिखे इंसानों की कोशिशों को अब तक नाकाम रखा है।

जिस वक़्त मैंने लफ़्ज़ ‘अनपढ़’ कहा, उस वक़्त मुराद महबूब ख़ान से है और जो पढ़े-लिखे इंसान कहा तो उस वक़्त इशारा उनकी औलादों की तरफ़ है। महबूब ख़ान की दो बीवियां थीं। पहली शादी तो मां-बाप ने 1922 में ही फ़ातिमा के साथ करवा दी थी और दूसरी शादी की महबूब ने 1942 में अपनी हीरोइन सरदार अख़्तर के साथ। कुल जमा छह औलादें। तीन बेटे – अयूब ख़ान, इक़बाल ख़ान और शौकत ख़ान। तीन बेटियां नजमा, मुमताज़ और ज़ुबैदा। छहों की छहों पहली बीवी से। सरदार अख़्तर के कोई औलाद न थी। महबूब ख़ान ने अपनी सारी औलादों को अच्छी से अच्छी तालीम दिलवाने में कोई कसर न छोड़ी। बहरहाल, यह सारे भाई-बहिन और उनकी जवान हो चुकी औलादें एक-दूसरे से अपना ‘हक़’ हासिल करने के लिए अदालतों में मुकदमे लड़ने मसरूफ़ हैं।

महबूब ख़ान इम्पीरियल, सागर मूवीटोन और नेशनल स्टूडियो में नौकरी करते हुए ही अपने स्टूडियो के ख़्वाब देखता रहता था। 1949 में 'अंदाज़' की शानदार कामयाबी के बाद इस ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलने जैसे हालात बनने लगे। इस काम के लिए ज़रूरी ज़मीन की तलाश शुरू हुई तो बात जाकर टिकी बांद्रा के एक जंगलनुमा प्लाट पर। जी बिल्कुल सही कहता हूं। आज के बांद्रा का यह रंग-रंगीला इलाका उस दौर में एक सुनसान सा इलाका था। यहां की कोई पहचान थी तो वह थी पहाड़ी पर कायम माऊंट मेरी चर्च। इसी चर्च के पास, समंदर के नज़दीक तकरीबन सवा चार एकड़ के इस प्लाट के मालिक थे एक बोहरा व्यापारी जाफ़र भाई।

1951 में सौदा हुआ और 1 मार्च 1952 को बाकायदा पूजा-पाठ के साथ रखा गया महबूब स्टूडियो की नींव का पहला पत्थर। एक तिलकधारी ब्राह्मण ज़मीन पर हवन सामग्री के साथ संस्कृत के श्लोक पढ़ता रहा। पांच वक़्त के नमाज़ी महबूब ख़ान और उनकी बीवी सरदार अख़्तर बिना एक भी लफ़्ज़ का मतलब समझे इस सारी रस्म के दौरान पूरे अदब और अक़ीदत के साथ शामिल रहे।

उस वक़्त तो शायद यह क़व्वाली न बजी हो लेकिन इस वक़्त मेरे कानों में शंकर-शम्भू की गाई इस क़व्वाली के बोल ज़रूर गूंज रहे हैं – 'मंज़िल हर एक शख़्स को पाना तो एक है / रस्ते अलग-अलग हैं, ठिकाना तो एक है।' मेरी दुआ यह है कि इस ठिकाने से पहले ही इंसान के होश ठिकाने रहें तो हर तरफ़ यही गूंज होगी - 'यह ज़िंदगी कितनी हसीन है।'

दो साल बाद जाकर महबूब स्टूडियो ने एक शक्ल ले ली। पांच फ्लोर पूरी तरह शूटिंग के लिए तैयार और छठा अधूरा। ख़ूब ख़ुली-खुली जगह। गाड़ियों की पार्किंग के लिए अलग जगह। फ़िल्म प्रोसेसिंग लेबोरट्री, रिकार्डिंग स्टूडियो, ट्रायल शोज़ के लिए मिनी थियेटर गोया फ़िल्म प्रोडक्शन के लिए हर ज़रूरी चीज़ एक छत के नीचे वाले ख़्वाब की ताबीर अभी बाकी थी। लेकिन जो कुछ बनकर तैयार हुआ था, वह अपने आप में लाजवाब था। और क्यों न हो, यह जगह इमारत कम और मुहब्बत का मुजस्समा ज़्यादा है। इस जगह की हर दीवार पर महबूब ख़ान की मुहब्बत की ख़ुश्बू आज भी महकती रहती है।

स्टूडियो के शक्ल लेने से पहले ही महबूब ख़ान ने इस ज़मीन पर अपनी फ़िल्म 'आन' के लिए एक विशाल एरीना का निर्माण करवाया था। स्टेडियमनुमा इन एरीना में हुक्मरानों की तफ़रीह के लिए तरह-तरह के तमाशे होते थे, जिनमें ख़ूनी लड़ाइयां भी शामिल थीं। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार पहले एक बेकाबू घोड़ी पर काबू पाकर दिखाते हैं और फिर प्रेमनाथ के साथ अपनी तलवारबाज़ी के जौहर।

फ़िल्म के लगभग 11 वें मिनट में ही दिखने वाले इस सीक्वेंस को देखकर आपको इस स्टूडियो की विशालता का अंदाज़ हो जाएगा। क्योंकि यह पूरा स्टूडियो नहीं बल्कि उस ज़मीन का एक हिस्सा है। और हां, किसी क़िले के लाल पत्थरों का भरम पैदा करने वाला यह सेट पत्थरों की चुनाई से नहीं बल्कि किसी और चीज़ से बना हुआ है।

'हमने 'आन' के लिए यह क़िला मिट्टी और गोबर की मदद से बनाया था। उन दिनों, सेट की छोटी-छोटी चीज़ों पर बारीकी के बजाय वक़्त पर नज़र रहती थी। हम अक्सर ही काफ़ी सारे सेट्स दो से तीन दिन में तैयार कर लेते थे।' (पांडुरंग नारायण – महबूब स्टूडियो के पुराने दौर का एक मुलाज़िम)

जब स्टूडियो बनकर तैयार हुआ तो देव आनंद, चेतन आनंद, गुरूदत्त जैसे फ़िल्मकारों ने इसी स्टूडियो को अपनी पसंद बना लिया। गुरूदत्त की 'मिस्टर एंड मिसेज़ 55' जैसी हल्की-फ़ुल्की फ़िल्म हो कि 'काग़ज़ के फूल' जैसी क्लासिक फ़िल्म, उनका एक बड़ा हिस्सा इसी स्टूडियो में शूट हुआ। ज़रा याद कीजिए फ़िल्म के शुरुआती सींस को और फिर वह भुलाए न भूलने वाला आख़िरी मंज़र जहां स्टूडियो का दरवाज़ा खुलते ही रोशनी की किरणें जिनसे अंदर सेट पर रखी डायरेक्टर की कुर्सी पर गुरूदत्त का मुर्दा जिस्म उजागर होता है।

महबूब स्टूडियो से देव आनंद को ख़ास लगाव था। इस जगह आज भी एक कमरा ऐसा है जो देव साहब के कमरे के नाम से जाना जाता है। अपनी फ़िल्मों के प्रोडक्शन के दौरान कई साल तक इस कमरे का इस्तेमाल उन्होंने अपने दफ़्तर की तरह किया था। देव आनंद साहब के लिए भी काम किसी इबादत से कम न था। होटल सन एन सैंड में भी 12 बरस तक रूम नम्बर 226 उनका स्थायी कमरा था। यहां वो अपनी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट, म्यूज़िक, बहस-मुबाहिसे गोया फ़िल्म की शूटिंग के अलावा तमाम तैयारियां यहीं से करते थे।

उनकी 'हम दोनों' और 'गाइड' जैसी फ़िल्मों की शूटिंग भी यहीं हुई। उस दौर में दिलीप कुमार, सुनील दत्त जैसे अनेक कलाकार पाली हिल बांद्रा में रहते थे, सो उनके लिए महबूब स्टूडियो चंद मिनट का फासला था। बाद को सलमान और शाहरुख़ जैसे एक्टर भी बैंड स्टैंड बांद्रा में जा बसे तो उनके लिए भी अब यही स्टूडियो सबसे बेहतर है।

शुरुआती दौर में महबूब ख़ान को यह स्टूडियो रास न आया। उनकी फ़िल्म 'अमर'(54), उसके बाद 'आवाज़'(56 - नलिनी जयवंत-उषा किरण-डायरेक्टर ज़िया सरहदी) और 'पैसा ही पैसा' (56 – किशोर कुमार –शकीला- डायरेक्टर – मेहरिश) बाक्स आफ़िस पर नाकाम साबित हुईं। लेकिन 1957 में 'मदर इंडिया' ने आकर सारी नाकामियों को शादमानियों में बदल दिया।

और...

चचा ग़ालिब का शेर है :

हर इक मकां को है मकीं से शर्फ़ ‘असद’

मजनूं जो मर गया है तो जंगल उदास है

महबूब ख़ान के बाद इस स्टूडियो को उनके दूसरे नम्बर के बेटे इक़बाल ने बड़ी मेहनत से सम्हाला और चलाया है, लेकिन महबूब प्रॉडक्शन्स का बैनर हमेशा के लिए डूब गया।

इसकी सबसे बड़ी वजह थी इस बैनर की आख़िरी फ़िल्म 'सन ऑफ इंडिया'(62)। महबूब ख़ान ने बड़े चाव से 'मदर इंडिया' वाले बच्चे साजिद को मुख्य भूमिका में लेकर यह फ़िल्म बनाई। कुमकुम और कमलजीत की जोड़ी भी रखी। लेकिन फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप हो गई। उस ज़माने में फ़िल्म का फ़्लॉप होना मतलब प्रोड्यूसर का दिवालिया होना था। बचते वही थे जिनकी तिजोरियां मज़बूत होती थीं या साख़ मज़बूत होती थी।

महबूब ख़ान इस सदमे से उबरने के लिए 'हब्बा ख़ातून' बनाने की योजना पर काम कर रहे थे, लेकिन वो काम करते-करते ही चल बसे। उसके बाद तो कर्ज़दारों ने धावा सा बोल दिया। महबूब स्टूडियो को हथियाने की भी कोशिश की लेकिन महबूब ख़ान ने ऐसा ट्रस्ट बनाकर छोड़ा था, जिसके प्रावधानों के चलते हर कोशिश नाकाम रही।

1970 के बाद जाकर जब फ़िल्म 'मदर इंडिया' के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स एक बार फिर महबूब ख़ान के परिवार के हाथ में आए तब जाकर हालात सुधरना शुरू हुए। लेकिन पैसा आते ही परिवार के पंगे भी शुरू हो गए।

हमारे सुनहरे दौर के स्टूडियोज़ एक के बाद एक ख़त्म होते जा रहे हैं। मिट्टी से सोना बनाने का हुनर जानने वाले बिल्डर धरती के इंच-इंच पर नज़र गढ़ाए हैं। राज कपूर का आर.के. स्टूडियो देखते-देखते गुम हो गया। कमाल अमरोही के कमालिस्तान में भी कमाल हो रहे हैं। रंजीत, रूपतारा और फ़ेमस जैसे न जाने कितने नाम अपने वजूद से बेवजूद हो रहे हैं। ऐसे में यह दुआ तो बनती है कि महबूब स्टूडियो हमेशा यूं ही आबाद रहे। आमीन।

जाते-जाते 'मदर इंडिया' के एक गीत का अंतरा गाने को जी चाह रहा है। सुन लीजिए।

गिर-गिर के मुसीबत में सम्भलते ही रहेंगे

जल जाएं मगर आग पे चलते ही रहेंगे।

जय-जय

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