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रसरंग में विज्ञान हैरान:बैक्टीरिया की बायोफैक्ट्री में पैदा होगा मकड़ी का अद्भुत रेशम

डाॅ. विपुल कीर्ति शर्मा11 दिन पहले
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नेफिला क्लेविप्स नामक मकड़ी ज� - Dainik Bhaskar
नेफिला क्लेविप्स नामक मकड़ी ज�

कई लोग मकड़ियों से बहुत डरते हैं और उन्हें मारकर ही दम लेते हैं। किन्तु वैज्ञानिक मकड़ियों को तीन कारणों से मूल्यवान समझते हैं। पहला यह कि फसलों को चौपट करने वाले कीटों को यह मारकर उन्हें नियंत्रित करती हैं। दूसरा, मकड़ियों में पाए जाने वाले विष के अनेक चिकित्सकीय उपयोग हो सकते हैं। और अब तीसरा कारण यह सामने आया है कि मकड़ियों के जाले का धागा बहुत ही हल्का, लचीला किंतु मजबूत होता है। भले ही हम मकड़ियों के जालों को हाथ या झाड़ू से तोड़ दें, लेकिन जाले में इस्तेमाल होने वाला धागे को तोड़ना मुश्किल होता है। इसका इस्तेमाल चिकित्सा, एयरोस्पेस तथा वस्त्र उद्योगों में किया जा सकता है।

मकड़ियों से रेशम का उत्पादन :

वैसे तो मकड़ियों की रेशम उत्पन्न करने वाली ग्रंथियां अनेक प्रकार के रेशमी धागे उत्पन्न कर सकती हैं, लेकिन सबसे मजबूत रेशमी धागों को ’ड्रेगलाइन सिल्क’ कहते हैं। यह मजबूत, लचीला, हल्का और बायोडिग्रेडेबल होता है। यह बायोकम्पैटिबल भी है, मतलब शरीर में प्रवेश कराने पर प्रतिरक्षा प्रणाली इसे स्वीकार कर लेती है। अतः इस रेशम का उपयोग कैप्स्यूल बनाकर शरीर में दवा पहुंचाने, आंखों का लेंस टेन्डन और अन्य इम्प्लांट के निर्माण में, प्रयोगशाला में मानव अंग बनाने के लिए मोल्ड बनाने आदि में भी उपयोग किया जा सकता है। मकड़ियों के रेशम के इन गुणों के कारण ही वैज्ञानिक रेशम का व्यापक तौर पर उपयोग करना चाहते हैं। किंतु मुश्किल यह है कि प्रत्येक मकड़ी अपने जीवनकाल में बहुत कम रेशम उत्पादित करती है। लाखों मकड़ियों को रेशम उत्पादन के लिए पालने पर भी उतना उत्पादन नहीं होता है जिससे कुछ खास बनाया जा सके और मकड़ियों को पालने पर भी अधिक खर्चा आता है। हजारों मकड़ियों को एक साथ पालना भी असाध्य कार्य है क्योंकि मकड़ियां इलाके बनाकर रहती हैं एवं स्वजाति भक्षी भी होती हैं।

इसलिए मकड़ियों से रेशम प्राप्त करने के बजाय वैज्ञानिकों ने इसके रेशम बनाने वाले जीन्स को पौधों, यीस्ट और कीटों में डालकर रेशम उत्पादन के सफल प्रयोग किए हैं किन्तु उन पर होने वाले भारी व्यय के कारण व्यवसायिक रूप से उत्पादन प्रारंभ नहीं किया जा सका।

नए शोध से उम्मीद जागी :

हाल ही में जापान के रिकन सेंटर फाॅर सस्टेनेबल रिसोर्स साइंस के वैज्ञानिकों ने बैंगनी रंग के समुद्री बैक्टीरिया ’रोडोवुलम सल्फिडोफिलम’ में मकड़ी के रेशमी धागे उत्पन्न करने वाला जीन डालकर बैक्टीरिया को मकड़ी का रेशम उत्पन्न करने वाली औद्योगिक फैक्ट्री में बदल दिया। बैक्टीरिया को एक आदर्श जैविक फैक्ट्री में बदलना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि बैक्टीरिया के संवर्धन में प्रयोगशालाओं को अधिक व्यय नहीं करना पड़ता है। समुद्री जल में रहने वाले बैक्टीरिया वातावरण से कार्बन डायआक्साइड और नाइट्रोजन सोखकर सौर ऊर्जा से स्वयं का भोजन बनाकर वृद्धि करते हैं जो प्रचुर मात्रा में हमेशा उपलब्ध होते हैं। अक्सर फैक्ट्रियां लगाने पर ऊर्जा, पानी, ठोस अपशिष्ट पदार्थों का निराकरण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। लेकिन समुद्री बैक्टीरिया का फैक्ट्री के रूप में उपयोग बिना किसी व्यय के होता है।

कौन सी मकड़ी का उपयोग किया गया?

जापानी वैज्ञानिकों की टीम के प्रमुख किजी नुमाता ने अपने प्रयोग के लिए ’नेफिला क्लेविप्स’ नामक मकड़ी चुनी। यह मकड़ी अमेरिका के अधिकांश भागों में पाई जाती है और इसे सामान्य रूप से गोल्डन सिल्क स्पाइडर कहते हैं। क्योंकि इनसे उत्पन्न रेशम का रंग स्वर्ण जैसा दमकता है। 1.5 इंच लंबी यह बड़े आकार की मकड़ी है तथा बड़े वृक्षों के बीच में ये लगभग 4 फीट के गोलाकार जाले बनाती हैं।

नेफिला की भारतीय प्रजाति को नेफिला पिलिप्स कहते हैं। यह भारत के अनेक भागों में देखी जा सकती है। मध्य भारत के सागवान के जंगलों में इनके सुंदर जाले देखते ही बनते हैं। इनके जाले इतने मजबूत होते हैं कि कई बार छोटे आकार की चिड़िया भी इनमें फंस जाती है।

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