रसरंग में मायथोलॉजी:हमारी संस्कृति का एक और पहलू है हंस और डिम्भक की कहानी

देवदत्त पटनायक20 दिन पहले
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करीब दो हजार साल पहले भारत में राज करने वाले यूनानी राजाओं द्वारा जारी किए गए सिक्के। भारत में हंस और डिम्भक की कहानी यूनान से प्रभावित भी हो सकती है। - Dainik Bhaskar
करीब दो हजार साल पहले भारत में राज करने वाले यूनानी राजाओं द्वारा जारी किए गए सिक्के। भारत में हंस और डिम्भक की कहानी यूनान से प्रभावित भी हो सकती है।

कुछ वर्ष पहले तक भारत में लोग मानते थे कि समलैंगिकता संस्कृति और प्रकृति दोनों के विरुद्ध है। लेकिन हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि समलैंगिकता प्रकृति में ही नहीं, बल्कि संस्कृति में भी पाई जाती है। उनके अनुसार वे एक पशु चिकित्सक हैं और वे पशुओं में समलैंगिक व्यवहार देख चुके हैं। समलैंगिकता की सांस्कृतिक पुष्टि के लिए उन्होंने महाभारत की एक कहानी का उल्लेख किया। सभा पर्व की यह कहानी हंस और डिम्भक के बारे में है। इस कहानी के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब कंस के ससुर यानी मगध के राजा जरासंध ने इसका प्रतिशोध लेने के लिए मथुरा पर आक्रमण किया। हंस और डिम्भक जरासंध के दो मुख्य सेनापति थे। मथुरा की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण और उनके ज्येष्ठ भाई बलराम ने बहुत प्रयास किए। लेकिन हंस और डिम्भक को पराजित करना बहुत कठिन था। तब श्रीकृष्ण ने एक युक्ति से उन्हें हराया। उन्होंने ये ख़बर फैलाई कि हंस की मृत्यु हो गई है। वास्तव में हंस नामक सेनापति की नहीं, बल्कि उसी नाम के एक राजा की मृत्यु हुई थी। लेकिन डिम्भक यह बात नहीं जानता था। यह सुनते ही वह हताश हो गया और उसने यमुना नदी में जल समाधि ले ली। डिम्भक की जल समाधि का समाचार मिलते ही हंस ने भी हताश होकर जल समाधि ले ली। इस कहानी से प्रतीत होता है कि हंस और डिम्भक प्रेमी थे, जो एक-दूसरे के बिना नहीं जी सकते थे। इसलिए ऐसा लगता है कि ये कहानी दो समलैंगिक योद्धाओं के बारे में है, जिस कारण मोहन भागवत ने कहा कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति का भाग रही है। कुछ वर्षों पहले जब देश में लोग समलैंगिकता का विरोध कर रहे थे, तब कोई भी इस कहानी की बात नहीं करता था, लेकिन अब ये प्रसिद्ध हो गई है। इस कहानी से स्पष्ट है कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के कई पहलुओं में से बस एक और पहलू है। यह कहना कठिन है कि ये कहानी कितनी पुरानी है। जो लोग मानते हैं कि महाभारत का युद्ध 5,000 साल पहले लड़ा गया था, वे कहेंगे कि यह कहानी भी उतनी ही पुरानी है। लेकिन पांडुलिपियों से पता चलता है कि महाभारत को 2,000 साल पहले लिखित रूप दिया गया था। इस काल में भारत पर यूनान का बहुत गहरा प्रभाव था। ईसवी पूर्व 327 में सिकंदर भारत आया। इतिहास में यह बात दर्ज है कि सिकंदर का हेफ़ायस्टीयन नामक समलैंगिक प्रेमी था, जिसकी मृत्यु के बाद सिकंदर हताश हो गया था। यूनान में ‘सेक्रेड बैंड ऑफ़ थीब्ज़’ नामक एक सेना थी। समलैंगिक प्रेमियों से बनी यह सेना कई युद्धों में विजयी रह चुकी थी। मान्यता यह थी कि समलैंगिक योद्धा अपने प्रेमियों की रक्षा और उन्हें प्रभावित करने के लिए भीषण लड़ाई करते थे। सिकंदर को उनके बारे में पता था। सिकंदर के भारत आने के बाद कई यूनानी राजाओं ने उत्तर भारत पर शासन किया। उनका सबसे बड़ा प्रभाव गांधार और मथुरा में दिखाई देता है और उनके द्वारा जारी किए सिक्कों में भी। श्रीकृष्ण और बलराम की प्रारंभिक छवियां भी इन सिक्कों पर हैं। सबसे रोचक बात यह है कि जरासंध ने मथुरा को नष्ट करने के लिए अठारह सेनाएं भेजीं। हंस और डिम्भक ने पहली सेना का नेतृत्व किया। अठारहवीं सेना का नेतृत्व कालयवन नामक सरदार कर रहा था, जिसके नाम का शाब्दिक अर्थ है ‘श्याम रंग का यूनानी’। यह इस बात को इंगित करता है कि हंस और डिम्भक की कहानी संभवतः यूनान से प्रभावित हो। ये कहानी 5000 साल पुरानी है या 2000 साल पुरानी है और क्या यह विश्वास पर आधारित है या विज्ञान पर आधारित है, इस पर हम तर्क-वितर्क कर सकते हैं। लेकिन, महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों ने अब स्वीकार किया है कि समलैंगिकता भारत का अभिन्न अंग रही है।

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