आपस की बात:असित सेन बनाम असित सेन

राजकुमार केसवानी8 महीने पहले
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'बीस साल बाद' जैसी फिल्मों में काम करने वाले कॉमेडी एक्टर असित सेन। - Dainik Bhaskar
'बीस साल बाद' जैसी फिल्मों में काम करने वाले कॉमेडी एक्टर असित सेन।

कितना आसान है कहना - नाम में क्या रखा है। अब शेक्सपीयर साहब का क्या है, वो तो थे ही बड़े नामवर इंसान। सो उनके लिए नाम का महत्व भले न रहा हो लेकिन इस दुनिया की सारी घसड़-पसड़ के पीछे या तो दाम वसूलने के कारनामे या फ़िर नाम कमाने की जद्दो-जहद। और जो ख़ुदा-न-ख़्वास्ता आप नाम कमाकर ज़रा हुक्का गुड़गुड़ाने को बैठे और मंज़र पर हल्लू से सेम टु सेम नाम वाला एक और शख़्स उभर आए तो हाय! क्या-क्या न तमाशे हो जाते हैं।

फ़िल्मी दुनिया में यूं तो अक्सर इस टकराव से बचने के लिए लोग अपने नाम तक बदलते रहे हैं लेकिन होनी तो हो के रहे। सो ऐसी होनी हुई दो प्रतिभाशाली लोगों के बीच। शेक्सपीयर के ड्रामे 'कामेडी ऑफ एरर्स' में एक से चेहरों की भूल-भुलैयां में फंसे किरदारों की दास्तान थी तो असल ज़िंदगी में इस भूल-भुलैयां में उलझे रहे दो असित सेन। दोनों के दोनों डायरेक्टर हुए। बाद को एक ने डायरेक्शन छोड़ कामेडी को चुन लिया। ऐसा करते ही उनकी डायरेक्ट की हुई फ़िल्में दूसरे असित सेन के खाते में दर्ज की जाने लगीं। इधर जब कभी किसी जानकार ने बताया कि भाई एक्टर असित सेन डायरेक्टर भी है, तो कुछ नीम-हकीमों ने डायरेक्टर बने रहने वाले असित सेन की फ़िल्मों की क्रेडिट भी एक्टर-डायरेक्टर के खाते में डाल कर दिखा दीं।

करने वालों के लिए दूध का दूध और पानी का पानी करना आसान होता होगा, लेकिन एक दूध को दूसरे दूध से अलग करना ज़रा ज़्यादा टेढ़ी खीर हो जाती है। यह क्या दूध और खीर के चक्कर में पड़ गया मैं भी। सीधे-सीधे दो असित सेन की कत्था कहता हूं। इन दो की अलग पहचान की ख़ातिर हिंदी के प्रसिद्ध लेखक रॉबिन शा पुष्प का एक बड़ा पुराना बयान सुनाता हूं। बहुत दिलचस्प है। सुनिए।

'एक हैं दुबले असित सेन ‘अनोखी रात’ और ‘सफ़र’ के निर्देशक और दूसरे हैं मोटे असित सेन ‘अपराधी कौन’ और ‘परिवार’ के निर्देशक। शुक्र है ख़ुदा का कि दो फ़िल्में डायरेक्ट करने के बाद भी मोटेवाले असित सेन डायरेक्टर बनते-बनते बच गए। यदि आज होते, तो फ़र्क दिखाने के लिए फ़िल्म के पोस्टर पर कुछ इस तरह लिखना पड़ता...

फ़िल्म : 'आंवले का मुरब्बा' (रंगीन) – निर्देशक दुबले वाले असित सेन

फ़िल्म : 'चूं-चूं का मुरब्बा' (वेस्टमेन कलर) – निर्देशक मोटेवाले असित सेन।'

अब इन दो को लोगों के अंतर को जानने का मंतर मिल गया तो पहले बात शुरू करते हैं वज़नदार असित सेन की। उम्र के लिहाज़ से भी वे बड़े ही थे। सो पहले बड़े की बात।

रोज़गार के सिलसिले में पश्चिम बंगाल के जिला बर्दवान से आकर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में आबाद हुए बंगाली परिवार में 13 मई 1917 को आमद हुई असित सेन की। भरा-पूरा संयुक्त परिवार था, जो रोज़गार के दबाव में धीरे-धीरे बिखरता चला गया। असित सेन के पिता कभी रेडियो और ग्रामोफ़ोन की दुकान तो कभी बिजली के सामान और कभी यह भी है और वह भी है टाईप की दुकान चलाते रहे।

असित सेन को दुकान पर बैठना पसंद न था। फ़ोटोग्राफ़ी का शौक अलबता ज़रूर था। मेट्रिक पास हुए तो मां को शादी की फ़िकर लग गई लेकिन असित सेन तो कलकते में न्यू थियेटर्स के नामवर डायरेक्टर नितिन बोस के साथ फ़िल्म बनाने का हुनर सीखना चाहते थे। किस्मत ने भी उनका साथ दिया। एक शादी के सिलसिले में कलकता पहुंचे और वहीं ठहर गए। बहाना काम आया कि मुझे बी. कॉम की पढ़ाई करनी है।

कलकता में कुछ नाटकों में अभिनय पर भी हाथ आज़मा लिया। ख़ूब वाह-वाही मिली। उम्मीद जगी। तभी गोरखपुर जाना पड़ा। यहां एक घटना ऐसी हुई कि उड़ने को बेताब पंछी बेबस होकर रह गया।

हुआ यूं कि गोरखपुर में कमिश्नर साहब का तबादला हो गया। विदाई समारोह का आयोजन हुआ। समारोह हो और फ़ोटोग्राफ़र न हो, ऐसा कैसे हो सकता था। सो जब कोई और न मिला तो इस काम की ज़िम्मेदारी आन पड़ी असित सेन पर। काम पसंद का था सो बड़े प्यार से उसे अंजाम भी दिया।

अब प्यार-मुहब्बत से किए हर काम की ख़ुश्बू ज़माने भर में फैल जाती है। सो असित सेन की इतनी तारीफ़ हुई कि वो गोरखपुर में ही सेन फ़ोटो स्टूडियो खोलकर बैठ गए। सब बढ़िया चल रहा था कि 1939 में दूसरी जंग-ए-अज़ीम छिड़ गई। मतलब वही वर्ल्ड-वॉर 2। अब उस वक़्त फ़ोटोग्राफ़ी का सारा सामान विदेशों से ही आता था। जंग की वजह से धीरे-धीरे सामान मिलना बंद हो गया।

रोटी की तलाश में नज़रें इधर-उधर घुमाईं तो नज़रें इस बार जा टिकीं बम्बई पर। बम्बई में पहुंचते ही काम भी मिल गया - स्टिल फ़ोटोग्राफ़र का। वह भी एक फ़िल्म कम्पनी में। दो महीने भी न गुज़रे थे कि तार आया – मां बीमार है। घर आओ।

अब वो ज़माना कोई आज का ज़माना तो था नहीं कि कह दिया - 'आई एम वेरी बिज़ी। किसी अच्छे डाक्टर को दिखा दो। पैसे भेज दूंगा।' तब के ज़माने में मां की बीमारी की ख़बर का मतलब बेटे-बेटियों के लिए प्रलय की ख़बर जैसी बात थी। सो बेटे महाराज फ़ौरन सब-कुछ छोड़कर भागे गोरखपुर। ख़बर मां की बीमारी की आई थी, लेकिन मां से पहले दादी चल बसीं। उनके पीछे-पीछे मां भी गईं। यह सब कुछ दो-तीन माह के भीतर ही हो गया।

इस दुखद घटनाक्रम ने असित सेन को अंदर से बुरी तरह तोड़ दिया। न गोरखपुर में रहने का मन होता और न किसी और शहर में टिकने की इच्छा। नतीजतन, बन बंजारा, फिरा बिचारा, मारा-मारा।

इसी अटक-भटक सफ़र में पांव कलकता की तरफ़ भी मुड़ गए। वहां जो हुआ, उसके बारे ख़ुद असित सेन ने 1960 में एक इंटरव्यू में जो बताया था, वह कुछ यूं है।

'उन्हीं दिनों मेरी मुलाक़ात अपने एक और साथी कृष्णकांत से हुई जो ‘बनफूल’ फ़िल्म में कानन बाला के साथ काम कर रहा था। मेरा आना-जाना उसके पास हुआ था तो सुमित्रा देवी (के.एल. सहगल की फ़िल्म 'मॉय सिस्टर' की हीरोइन) के पति देव मुखर्जी से मेरा परिचय हो गया जो आगे चलकर बड़ा काम आया।

बिमल रॉय अपनी पहली फ़िल्म ‘उदयेर पाथे’ बना चुके थे और अब हिंदी में बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें एक हिंदी भाषी सहायक की ज़रूरत थी। सो मुझे रख लिया। रखा तो मुझे तीसरे सहायक के रूप में गया था लेकिन धीरे-धीरे मैं तीसरे से दूसरा और फिर पहला सहायक बन गया। कलकता में फिर मैंने फ़िल्मों में अभिनय भी किया। सर्वप्रथम 'हमराही' में मैंने एक मामूली सी भूमिका की।'

1945 से 1949 तक असित सेन न्यू थियेटर्स से ही जुड़े रहे। 50 की शुरुआत में ही बिमल रॉय ने बम्बई जाने का फ़ैसला किया और जिन लोगों को अपनी टीम की तरह साथ लिया, उनमें असित सेन का फ़ेहरिस्त में नाम बहुत ऊपर था।

अब असित सेन की शेष कथा पूरी करेंगे अगली बार। मतलब ज़रा प्यार से, तफ़्सील से सुनाऊंगा। सही है न?

और ...

कहने को तो कह दिया कि अगली बार सब कुच्छ तफ़्सील से सुनाऊंगा, लेकिन यह जो मनुष्य के भीतर एक जंतु होता है न जिसे लोग अलग-अलग नाम से याद करते हैं, वह भोत कुलबुला रिया हे। ‘वो वाली बात तो अभी सुना दो, वो वाली बात तो अभी सुना दो।'

सुनानी पड़ेगी। वरना यह कटखना बहुत तंग करेगा। हां अलबता बस इशारे भर में सुनाऊंगा। असित सेन को बतौर कॉमेडियन उनकी बड़ी पहचान मिली थी 1962 की फ़िल्म 'बीस साल बाद' में उनके गोपीचंद जासूस वाली भूमिका से। उनका वो सुस्त से अंदाज़ में एक-एक लफ़्ज़ वाले स्टाइल में बोला गया डायलाग 'क्या... मैं ... अंदर ... आ सकता हूं ...? ... अरे... मैं तो... अन्दर ... आ ही गया।' तो आपको याद ही होगा।

तो फ़िल्म की रिलीज़ से पहले कुछ लोगों ने फ़िल्म देखकर इतनी नकारात्मक प्रतिक्रिया दी कि डायरेक्टर बीरेन नाग ने उनके ढेर सारे सीन ही उड़ा दिए। फिर क्या हुआ? वही तो बताऊंगा अगली बार। कसम से पूरी की पूरी बात। आपस की बात

जय-जय।

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