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रसरंग में मायथोलॉजी:भागवत पुराण : भगवान को भव्यता से सादगी तक ले जाने की कथा

देवदत्त पटनायक23 दिन पहले
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पुणे के पास स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर के परिसर में गोपियों के साथ रासलीला रचाते श्रीकृष्ण की प्रतिमा। - Dainik Bhaskar
पुणे के पास स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर के परिसर में गोपियों के साथ रासलीला रचाते श्रीकृष्ण की प्रतिमा।

लोग अक्सर भागवत पुराण (जिसे साधारणतः भागवत कहा जाता है) और भगवद्गीता (जिसे साधारणतः गीता कहा जाता है) में उलझ जाते हैं। भगवद्गीता महाभारत का ही एक हिस्सा है।

भागवत में भगवान पर ध्यान केंद्रित किया गया है जो दुनिया से जुड़ते हैं। वह कृष्ण को विष्णु के अवतार के रूप में स्थापित करता है। जबकि महाभारत भरत वंश के झगड़ों पर ध्यान केंद्रित करता है। महाभारत में भरत वंश के झगड़ों के माध्यम से भगवान कृष्ण का रूप लेकर दुनिया से जुड़ते हैं। भागवत कृष्ण के पांडवों से मिलने से पहले के जीवन का वृत्तांत है, जबकि उनके पांडवों से मिलने के बाद का वृत्तांत महाभारत में पाया जाता है। भागवत में कृष्ण चरवाहे के रूप में ग्रामीण भाग में जीवन बिताते हैं, जबकि महाभारत में वे शहर आकर योद्धा और रणनीतिज्ञ के रूप में जीवन बिताते हैं। भागवत भावनाओं (भक्ति मार्ग) पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि महाभारत क्रिया (कर्म मार्ग) और विचारों (ज्ञान मार्ग) में सामंजस्य स्थापिति करने को महत्व देता है। गीता, जो महाभारत का हिस्सा है, तीनों मार्गों को जोड़ती है।

जो विचार गीता में प्रस्तुत किया गया है, वही विचार कृष्ण की रसलीला के माध्यम से बिलकुल अलग तरीक़े से भागवत में भी प्रस्तुत किया गया है। भागवत में कृष्ण के बचपन की घटनाओं का वर्णन किया गया है कि वे कैसे उन्हें मारने के लिए भेजे गए असुरों का वध करते हैं, प्राकृतिक विपत्तियों से गांव की रक्षा करते हैं, अपने दोस्तों के साथ गायों को चराने ले जाते हैं और ग्वालिनों की हंसी उड़ाकर उनका मक्खन चुराते हैं। इस वर्णन के बाद भागवत प्रणय का वर्णन करता है। हर पूर्णिमा की रात कृष्ण तुलसी की झाड़ियों के सुगंधित वन अर्थात वृंदावन में अपनी बांसुरी बजाते हैं। इस मधुर संगीत से आकर्षित महिलाएं गहरी नींद में सोए हुए अपने पिता, भाई, पति और पुत्रों को छोड़कर कृष्ण के चारों ओर गोलाकार में नृत्य करने के लिए दौड़ती हैं। इस प्रकार डरावना वन रमणीय मधुवन में बदल जाता है। आनंद के चक्र (रस-मंडल) की इस रचना को रसलीला कहते हैं। यह तब तक बनी रहती जब तक स्त्रियां कृष्ण पर अपना अधिकार नहीं जमाने लगतीं। और तब तक रसलीला चलती, जब तक हर महिला को लगता कि कृष्ण केवल उसके साथ नृत्य कर रहे हैं।

कुरुक्षेत्र की रणभूमि और मधुवन में नृत्य के बीच अंतर स्पष्ट है। इधर युद्ध हो रहा है तो उधर नृत्य, इधर पुरुष हैं तो उधर महिलाएं, इधर खून बह रहा है तो उधर दूध, इधर सभी क्रोधित हैं तो उधर प्रणय भरा वातावरण है, इधर दिन है तो उधर रात, इधर प्रकृति मैदान के रूप में पालतू है तो उधर प्रकृति का जंगली रूप है।

इसके अलावा भागवत में कृष्ण की माताओं की बात की गई है: देवकी, जो उन्हें जन्म देती हैं और यशोदा, जो उन्हें पालती हैं। उसमें कृष्ण की प्रेमिकाओं का उल्लेख है: राधा, जिसे कृष्ण गोकुल में छोड़ आते हैं और यमुना, जो द्वारका तक उनका पीछा करती हैं। कृष्ण की पत्नियों का उल्लेख है: सत्यभामा, जो धनवान हैं और जिनकी अनंत अभिलाषाएं हैं और रुक्मिणी, जो दीन और विनम्र हैं। भागवत शाही दरबारों की नहीं बल्कि आंतरिक निवासों की कहानियां सुनाता है; शहर की नहीं गांव की कहानियां, रणभूमि की नहीं चरागाह की कहानियां। कृष्ण महान रणनीतिज्ञ, योद्धा और शिक्षक भले ही हों, लेकिन वे किसी के पुत्र, प्रेमी, पति, यहां तक ​​कि किसी के भाई और पिता भी हैं। वे हमेशा अचूक नहीं होते हुए, अक्सर लोगों में चिढ़ भी पैदा करते हैं। इस कारण जहा महाभारत एक पौरुष कथा है, भागवत एक बहुत ही स्त्रैण कथा है, जो भगवान को घर के बाहर की भव्यता से अंदर की सादगी तक ले आती है।

- देवदत्त पटनायक, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक

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