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टॉकिंग पाइंट:समाज के बीच से मिलते हैं सिनेमा के नायक

भावना सोमाया19 दिन पहले
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मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की जिंदगी पर बनी फिल्म 'भूमिका' के एक दृश्य में स्मिता पाटिल। - Dainik Bhaskar
मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की जिंदगी पर बनी फिल्म 'भूमिका' के एक दृश्य में स्मिता पाटिल।

दिल्ली की सीमाओं पर किसान करीब 75 दिन से आंदोलित हैं। मुझे लगता है कि कोई न कोई कहीं न कहीं इस विषय पर फिल्म बनाने के बारे में जरूर सोच रहा होगा। दरअसल, समाज में जो कुछ भी घटित होता है, उससे हमारा सिनेमा प्रेरित होता है। फिर वे व्यक्तिगत धोखा देने वाली घटनाएं हों या फिर मुंबई के बम धमाके। कुख्यात नानावती केस जिसमें एक नौसेना अधिकारी अपनी पत्नी और उसके प्रेमी की हत्या कर देता है, इस पर ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ फिल्म बनी। मुंबई के बम धमाकों पर ‘ब्लैक फ्राइडे’ या ‘मुंबई मेरी जान’ फिल्में बनीं।

कई कहानियां प्रेरणास्पद रही हैं। अगर साई परांजपे की ‘दिशा’ फिल्म महाराष्ट्र के उन ग्रामीणों के प्रति श्रद्धा भाव जगाती है जिन्होंने पानी की खोज में एक कुएं की खुदाई में पूरा जीवन लगा दिया तो श्याम बेनेगल की ‘समर’ मप्र की एक दलित बस्ती में उच्च जाति के लोगों के विरोध के बावजूद एक वॉटर पम्प शुरू करने की कहानी है। ‘तमन्ना’ एक किन्नर द्वारा एक बच्ची को गोद लेने की कहानी है। ये फिल्में वास्तविक जीवन की घटनाओं से प्रेरित थीं।

जीवित जाने-पहचाने लोगोें पर जो भी फिल्में बनीं, वे अक्सर विवादों का शिकार हो गईं, फिर वह फूलन देवी पर शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ हो या फिर जामनगर की डॉन संतोखबेन जाडेजा पर बनी विनय शुक्ला की फिल्म ‘गॉडमदर’।

नूतन ने अपने कॅरिअर की शुुरुआत ‘सोने की चिड़िया’ फिल्म से की थी जिसमें कमाने वाले सदस्य का परिवार के लोग ही शोषण करते हैं। गुरुदत्त की ‘कागज के फूल’ फिल्म एक शादीशुदा फिल्ममेकर की कहानी है जो अपनी प्रतिभा पर स्वयं ही मोहित है। सच्ची कथाओं पर आधारित दोनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं दिखा सकीं और शायद इसलिए कि दोनों का अंत त्रासदी के साथ होता है।

80 के दशक में स्मिता पाटिल अभिनीत फिल्म ‘भूमिका’ मराठी फिल्मों व रंगमंच की अदाकारा हंसा वाडकर की आत्मकथा ‘संगते आइका’ पर आधारित थी। यह कहानी अभिनेत्री के अलग-अलग रिश्तों के जरिए उनकी जिंदगी के सफर पर प्रकाश डालती है। पाटिल का एक भोली-भाली किशोरी से एक ताकतवर महिला के रूप में बदलाव होता है। हालांकि ताकतवर महिला होने के बावजूद वह पति (अमोल पालेकर) द्वारा शोषित होती है। अस्सी के दशक में ही महेश भट्‌ट निर्देशित ‘जनम’ आई जो एक फिल्म निर्माता के ‘अवैध’ परिवार पर आधारित थी। सलीम खान के नाटकीय लेखन की वजह से यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही।

रामगोपाल वर्मा का रूझान शुरू से ही फिल्मी कहानियों के प्रति रहा है। उनकी फिल्म ‘रंगीला’ एक साधारण व्यक्ति के सितारा बनने, ‘मस्त’ सितारापन की चमक-धमक से दूर भागने और ‘नाच’ एक संघर्षशील अभिनेता व एक कोरियोग्राफर की प्रेम कहानी है। अगर फराह खान ‘ओम शांति ओम’ की पृष्ठभूमि में फिल्मी दुनिया का इस्तेमाल करने को प्रेरित होती है तो जोया अख्तर ‘लक बाय चांस’ में ग्लैमर की दुनिया के जूनियर कलाकारों को परदे पर लाती हैं। वहीं रणबीर कपूर-अनुष्का शर्मा अभिनीत ‘वेलवेट’ में सिनेमा की दुनिया के अंधेरे कोनों की कहानियां दिखाई गई हैं।

हमारे लेखक ऐसी कहानियों की तलाश में रहते आए हैं जो दर्शकों को बांधे रखें। इसलिए उन्हें इस बात का कोई मतलब नहीं है कि फिल्म का विषय फिल्मी एक्टर, राजनेता, दुष्कर्म पीड़िता, स्टॉक ब्रोकर, आइटम डांसर है या फिर किसान। बस, हर कहानी में दर्शक नायक को पहचान लें।

(भावना सोमाया जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार हैं।)

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