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रसरंग में पाकिस्तान डायरी:मर्दों की कॉमरेड औरतें! बस ख़्वाब ही रह गया

ज़ाहिदा हिना16 दिन पहले
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 हाल ही में पाकिस्तान के कराची और दूसरे कई शहरों में औरतों ने अपने हकों की आवाज बुलंद की। - Dainik Bhaskar
 हाल ही में पाकिस्तान के कराची और दूसरे कई शहरों में औरतों ने अपने हकों की आवाज बुलंद की।

गत 20 मार्च को कमेटी ऑफ प्रोग्रेसिव पाकिस्तान की तरफ से एक महफिल हुई जिसके नेशनल को-ऑर्डिनेटर जनाब उमर लतीफ और मोहतरमा फौज़िया तनवीर थीं। इसमें हमारी मशहूर शायर और अदीब नसीम सईद के अलावा दूसरी भी कई सरगर्म ख़्वातीन शामिल हुईं। यह महफिल औरतों के संघर्ष और पाकिस्तान में उनके हालात के बारे में थी।

उस रोज़ बात का आगाज करते हुए मुझे करीब 70-75 साल पहले की बात याद आ गई। वह ब्रिटिश हुकूमत का ज़माना था। लाहौर की ज़नाना जेल के बाहर बहुत-सी औरतें जमा थीं, जो अपनी उन साथियों की आज़ादी की मांग कर रही थीं, जिन्हें कुछ दिनों पहले हुकूमत का विरोध करने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। ये औरतें इस ख़्याल में थीं कि नए मुल्क में उन्हें आज़ादी से जीने का हक़ मिलेगा।

इसी सिलसिले में दूसरी कई तस्वीरों के साथ बेगम अतिया ज़ेदी की मुस्कराती हुई तस्वीर भी है। वो हिंदुस्तान के बड़े दानिश्वरों और शायरों मौलाना शिबली नोमानी और अल्लामा इक़बाल की नज़रों में क़ाबिले एहतराम थीं। अदब और रक़्सो मौसीक़ी की सरपरस्त थीं। जायदाद से सम्पन्न थीं और एक शानदार बोहरा ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थीं। जिन्ना साहब से उनकी मुलाक़ात हुई तो जिन्ना ने उनसे कहा कि मुसलमानों का एक नया मुल्क वजूद में आ रहा है। वो आएं और उसकी तामीर में अपना किरदार अदा करें। अतिया अपनी जायदाद, अपनी जागीर, अपनी लक़दक़ कोठी छोड़कर कराची आ गईं। यहां उन्होंने अपनी गिरह से अपने फन की सरगर्मियां शुरू कीं लेकिन जल्द ही उन्हें यह अंदाज़ा हो गया कि यहां पर रक़्स और मौसीक़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। जिन्ना साहब गुज़र चुके थे, हुकूमत और सियासत पर बुनियाद परस्तों की गिरफ्त बहुत मज़बूत हो चुकी थी। अतिया को भला कौन पूछता, अल्लामा इक़बाल के हवाले से वो एक ऐसी शख़्सियत थीं जिन्हें पसंद नहीं किया जाता था। उनके ज़ेवर और दूसरा क़ीमती सामान धीरे-धीरे बिक गया, परेशानियों ने उनका घर देख लिया, आख़िरकार अतिया और उनके शौहर फैज़ी रहमीन दुनिया से रुखसत हो गए। अब बोहरा क़ब्रिस्तान में अतिया के साथ-साथ उनके ख़्वाबों की ख़ाक भी सोती है।

साल 1944 में अलीगढ़ के एक जलसे में जिन्ना साहब ने मुसलमान औरतों से कहा था कि कोई भी क़ौम बुलंदियों पर नहीं पहुंच सकती, जब तक उसकी औरतें घर की चारदीवारियों में क़ैदियों की तरह नज़रबंद हों। इसी ज़माने में उन्होंने औरतों से कहा था कि वो नए मुल्क में मर्दों की कॉमरेड होंगी। ऐसी तक़रीरों को सुनने वाली लड़कियों और औरतों ने कैसे-कैसे ख़ूबसूरत ख़्वाब देखे होंगे। लेकिन जब पाकिस्तान बन गया तो निचले और मध्यम तबके की औरतों के हाथ कुछ भी नहीं आया। हिंसा का शिकार होने वाली बशीरन बीबी ने बिलख-बिलखकर बताया कि पाकिस्तान सिर्फ ताक़तवर मर्दों के लिए ही बना था, मुझ जैसी कमज़ोर और ग़रीब औरतों के लिए नहीं। हम यहां पैरों की धूल के अलावा कुछ भी नहीं हैं। समाज में हमें जो आज़ाद और ख़ुदमुख़्तार औरतें नज़र आती हैं, वे तो बस आटे में नमक के बराबर ही हैं।

इन दिनों एक बार फिर हिजाब का, नक़ाब का और अबाया का दौर उठा है। ख़ैबर पख़्तोनख़्वा और बलूचिस्तान सबसे ज़्यादा इंतेहापसंदों के निशाने पर हैं। अख़बार हमें स्कूलों और कॉलेजों में रोज़ लागू होने वाले नए-नए क़ानूनों और पाबंदियों के बारे में बताते हैं। हम दूर क्यों जाएं, इसी साल कराची और दूसरे कई शहरों में 8 मार्च को लड़कियों और औरतों ने जुलूस निकाला। ये अपने अधिकारों की मांग का जुलूस था। इसी साल मज़हबी इंतहापसंदों ने उनके विरोध में एक बड़ा जुलूस निकाला। औरतों को धमकियां दी गईं। उन्हें घर में रहने की हिदायत दी गई।

- ज़ाहिदा हिना पाकिस्तान की जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका और स्तंभकार हैं।

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