रसरंग में क़िस्सागोई:'करी' कथा : कोरमा आसफजाही से लेकर कलिया दाराशाही तक!

पुष्पेश पंत16 दिन पहले
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'करी' शब्द अमूमन सामिष व्यंजनों के साथ ही ज्यादा जुड़ा रहा है। निरामिष में 'काजू करी' अकेले ही मोर्चा लेती नजर आती है। - Dainik Bhaskar
'करी' शब्द अमूमन सामिष व्यंजनों के साथ ही ज्यादा जुड़ा रहा है। निरामिष में 'काजू करी' अकेले ही मोर्चा लेती नजर आती है।

दुनियाभर में भारतीय भोजन की प्रमुख पहचान 'करी' से जुड़ी है। हर तरी वाले व्यंजन के साथ यह विशेषण जुड़ा रहता है - मटन करी, चिकन करी, फिश करी, एग करी इत्यादि। अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के लिए करी का प्रयोग इतनी उदारता से किया कि हमारे रोगन जोश, दो प्याजा, कोरमे, सालन, कलिए आदि की विविधता धुंधलाती चली गई। बहरहाल, इस शब्द का मूल तमिल भाषा का 'कारी' शब्द है जिसका अर्थ है मसालों के साथ पकाया सामिष या निरामिष व्यंजन जिसका शोरबेदार होना जरूरी नहीं। तमिलनाडु से जुड़े केरल में 'उप्पकरी' से हमारी मुलाक़ात होती है जो थेचे, चटनी तथा पचड़ी के समीप पहुंचता है।

ऐसा नहीं था कि औपनिवेशिक शासकों के राज में करी का विकास नहीं हुआ। जब मद्रास और कलकत्ता के शहरों से अंग्रेज देश के दूसरे हिस्सों में अपने पैर पसारने लगे तब उनकी पसंद वाली करी का भी कायाकल्प होने लगा। डाकबंगलों एवं रेलगाड़ी के आगमन के बाद 'मद्रास रेलवे मटन करी', 'डाकबंगलो चिकन करी' का आविष्कार हुआ। इनको तैयार करने के लिए सीमित सुलभ मसालों का ही उपयोग होता था। वैसे भी अंग्रेज हाकिम न तो मिर्च का तीखापन बर्दाश्त कर सकते थे और न ही उनकी ज़ुबान को सुवासित मसालों का आनंद लेने का अभ्यास था। मेम साहिबों की रसोई के लिए रेडीमेड करी पाउडर ईजाद किया गया। रंग के लिए हल्दी, नाम मात्र को धनिया-जीरा, गोरों की परिचित काली मिर्च इसके प्रमुख तत्व थे। आप यह भी कह सकते हैं कि इस करी पाउडर ने ही आज के मीट मसाले तथा चिकन मसाले के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

जब भारत में अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा बीताकर अंग्रेज स्वदेश वापस लौटते तो इंडिया नामक मायावी उपनिवेश की यादों को जगाने व जीवित रखने में करी उनकी मदद करती थी। लंदन में 19वीं सदी में ही करी रेस्तरां खुलने लगे थे। आज तक यह उस बिरादरी में लोकप्रिय है जो अपने को 'जवां मर्द' समझते हैं और यह दिखाने को बेक़रार रहते हैं कि वह कितनी मिर्च खा-पचा सकते हैं। हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकाई भोजनालय भले ही अलग-अलग क़िस्म का खाना पेश करते हों, इन सभी की गिनती करी रेस्रराओं में ही होती है।

भारत में सामिष व्यंजनों के नामकरण मेनू में नित बदलते रहते हैं। सब इस बहाने उनको शाही-नबाबी विरासत का उत्तराधिकारी प्रमाणित करना चाहते हैं। कोई कोरमा आसफजाही कहता है तो कोई कलिया दाराशाही! करी को पेश करते वक़्त उसे 'होम-स्टाइल' कहकर पेश किया जाता है।

खान-पान के शौक़ीन करी के तिलिस्म को भेदने में माहिर होते हैं। गोआ में विंडालू हो या सारपोटेल, इनके नाम से यह अनुमान बाहर वाला नहीं लगा सकता कि यह किस पदार्थ से पकाए गए है और आर्डर देने पर कौन सा ज़ायक़ा चखने या छकने को मिलेगा। 'गोआ की फ़िश करी' मशहूर है, मगर इसकी रंगत और स्वाद पड़ौसी 'मंगलूर की फ़िश करी' से बिल्कुल जुदा होता है। कुर्ग के पहाड़ी जंगली इलाक़े में सुअर के मांस से पकाई जाने वाली 'पौंडी करी' के ज़िक्र के बिना करी की कथा अधूरी ही रह जाएगी।

अंत में एक नज़र उस मुहावरे पर जिसे करी ने जन्म दिया है- 'हरी स्पॉइल्स दि करी' याने जल्दबाज़ी में काम बिगड़ सकता है। कुछ समय पहले तक डाक्टर अलसर के पीड़ितों को 'हरी, वरी, करी' से परहेज़ करने की राय देते थे- हड़बड़ी, चिंताओं तथा करी के मसालेदार व्यंजन से दूर रहना ही सेहत के लिए फायदेमंद समझा जाता था। जल्दबाज़ी, तनाव-चिंता से दूर रहना निश्चय ही लाभदायक है, पर करी का सेवन आप निश्चिंत होकर सकते हैं!

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