रसरंग में मायथोलॉजी:दयानंद और विवेकानंद : भारत में हिंदू पुनर्जागरण के असली लीडर्स

देवदत्त पटनायक14 दिन पहले
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11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित हुई धर्मसंसद में भाग लेते स्वामी विवेकानंद। - Dainik Bhaskar
11 सितंबर 1893 को शिकागो में आयोजित हुई धर्मसंसद में भाग लेते स्वामी विवेकानंद।

उन्नीसवीं सदी में हिंदू धर्म को दो वजहों से पुनर्गठित किया गया था। पहला कारण यह था कि ईसाइयों ने भारत में धर्मप्रचार शुरू किया था, जिनका उद्देश्य लोगों का धर्मान्तरण करना था। दूसरा कारण यह था कि उस काल में यूरोप प्रबोधन युग से गुज़र रहा था और भारतवासी उस युग के मानवतावादी मूल्यों तथा समानता और न्याय जैसे विचारों से परिचित हुए थे। इसके बाद जो पुनर्गठन हुआ उसे हिंदू ‘रिनेसांस’ अर्थात ‘नवजागरण’ के नाम से जाना जाने लगा। ‘नवजागरण’ शब्द का उपयोग स्पष्ट रूप से 15वीं सदी के यूरोपीय ‘नवजागरण’ के संदर्भ में किया गया था, जिसमें धर्म और विवेक के बीच संघर्ष हुआ था।

यह पुनर्गठन समरूप नहीं था। विभिन्न समूहों ने पुनर्गठन के बहुत अलग-अलग मार्ग अपनाए। कुछ ने उन लोकप्रिय हिंदू अनुष्ठानों को अस्वीकार किया, जिनमें मूर्तियों, पेड़ों और गायों की पूजा की जाती थी। दूसरों ने अनुष्ठानों के लिए वैज्ञानिक या कम से कम तार्किक स्पष्टीकरण देकर उन्हें उचित ठहराने की कोशिश की।

कुछ लोगों का मानना था कि अनुष्ठान और विश्वास दूषित हुए थे और उनका शुद्धिकरण करना आवश्यक था। दूसरों के अनुसार वे परिपूर्ण थे और उन्हें बदलने की कोई आवश्यकता नहीं थी; उन्हें बस ग़लत ढंग से समझा गया था। इस काल के दो प्रमुख हिंदू धार्मिक गुरुओं स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद का अध्ययन करने पर यह विविधता स्पष्ट होती है।

दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात में हुआ था, जबकि स्वामी विवेकानंद बंगाल में जन्मे थे। दोनों संपन्न परिवारों से थे। दोनों पढ़े-लिखे थे। दोनों ने गृहस्थ होने के बजाय वैरागी बनना चुना। दोनों समानता, न्याय और सार्वभौमिक भाईचारे में विश्वास रखते थे। दोनों राष्ट्रवाद और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता में विश्वास रखते थे।

दयानंद संस्कृत में पारंगत थे और तर्क-वितर्क करना पसंद करते थे। लेकिन समय के साथ वे अपने विचारों को जन-मानस तक पहुंचाने के लिए हिंदी में अधिक बोलने लगे थे। विवेकानंद अंग्रेज़ी अच्छे से बोलते थे और अपनी वक्तृत्व कला के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने ही पाश्चात्य देशों को हिंदू धर्म से परिचित कराया था। दोनों हस्तियों ने अपने विचारों को फैलाने के लिए संगठन स्थापित किए- क्रमशः आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन। दोनों ने ही जाति की धारणा को अस्वीकार किया। दोनों ने अपने संगठनों में महिलाओं को सदस्य बनने की अनुमति दी। दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद दोनों के कई अनुयायी थे। दयानंद के अधिकतर अनुयायी उत्तर भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों में थे, जबकि विवेकानंद के अनुयायी भारत के पूर्वी और दक्षिणी भागों में थे।

लेकिन वेदों पर दोनों के बहुत अलग विचार थे। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत मंत्रों के संग्रह, अर्थात संहिताओं, को अधिक महत्व दिया, जिन्हें उन्होंने दिव्य प्रकटन माना। दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद ने उपनिषदों पर ध्यान केंद्रित किया, जो वेदांत, अर्थात वैदिक विचार के चरम का आधार थे। दयानंद पुराणों, मूर्तिपूजा और मंदिर के अनुष्ठानों के कट्टर विरोधी थे, लेकिन यज्ञ को महत्व देते थे। चूंकि स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के अनुयायी थे, जो ख़ुद एक काली मंदिर में पुजारी थे, इसलिए वे देवी की प्रतीक के रूप में पूजा को महत्व देते थे, जैसे परंपरागत रूप से किया जाता था।

दोनों के कई आलोचक थे। कुछ प्रामाणिक आलोचक उनकी व्याख्याओं से असहमत थे; दूसरों को बस उनकी सफलता से ईर्ष्या थी या वे उनके निंदक थे। दयानंद की वैदिक छंदों की रचनात्मक व्याख्या करने और अन्य धर्मों की आलोचना करने के लिए आलोचना की गई। लोगों ने विवेकानंद की समुद्र के पार यात्रा करने (परंपरागत मान्यता यह थी कि इससे लोग जाति के विशेषाधिकार खो देते थे), मांसाहारी भोजन खाने और हिंदू धर्म का राष्ट्रवादी पुनर्गठन करने पर आलोचना की।

21वीं सदी में हम भले ही यह मानना चाहें कि पूर्व हिंदू नेता एक जैसे सोचते थे और उनके कोई आलोचक नहीं थे, लेकिन सभी बातों की तरह भारत में हिंदू पुनर्जागरण भी जटिल, विविध और गतिशील रहा था।

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