रसरंग में मायथोलॉजी:ध्रुव : कैसे एक मां ने अपने पुत्र को ईश्वर की खोज के लिए प्रेरित किया

देवदत्त पटनायक16 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
1890 में राजा रवि वर्मा की प्रसिद्ध तस्वीर में भगवान विष्णु और ध्रुव। - Dainik Bhaskar
1890 में राजा रवि वर्मा की प्रसिद्ध तस्वीर में भगवान विष्णु और ध्रुव।

ध्रुव की कहानी पौराणिक परंपराओं और विशेष रूप से विष्णु पुराण और भागवत पुराण में पाई जाती है। यह आध्यात्मिक कहानी होने के साथ-साथ एक भक्तिमय कहानी भी है, जिसे बहुत सरलता से वर्णित किया गया है।

एक बार ध्रुव नामक लड़का हुआ करता था जो राजा उत्तानपाद व रानी सुनीति का बेटा और मनु का पोता था। उसके पिता की सुरुचि नामक एक और रानी और उससे उत्तम नामक एक और बेटा था। सुरुचि और उत्तम राजा उत्तानपाद के प्रिय थे। लेकिन बड़ा बेटा होने के कारण ध्रुव अपने पिता के सिंहासन का उत्तराधिकारी था। इस वजह से सुरुचि उससे जलती थी।

एक दिन उत्तम को अपने पिता की गोद में बैठा देखकर ध्रुव में भी यह कामना जाग उठी। वह उनकी गोद में बैठने जा ही रहा था जब उसकी सौतेली मां सुरुचि ने उसे गोद से नीचे खींच लिया। उसे डांटते हुए सुरुचि ने ज़ोर देकर कहा कि केवल उत्तम ही उनके पिता की गोद में बैठ सकता है। आख़िरकार सुरुचि और उत्तम राजा के प्रिय जो थे। ध्रुव को वहां से भगा दिया गया और राजा उत्तानपाद चुपचाप देखते रहे।

अत्यंत दुखी होकर ध्रुव अपनी मां के पास गया। उसे सांत्वना देते हुए सुनीति ने कहा कि उसके पिता की गोद में बैठने के बजाय उसे भगवान की गोद में बैठने की इच्छा रखनी चाहिए, क्योंकि जबकि उसके पिता नश्वर हैं, भगवान अमर हैं। वह अपने पिता की गोद में केवल कुछ समय के लिए बैठ सकता था, जबकि भगवान की गोद में वह सदा के लिए बैठ सकता था।

नन्हे ध्रुव ने अपनी मां से पूछा कि वह भगवान को कैसे खोज सकता है? इस पर सुनीति ने बताया कि भगवान विश्व में हर जगह उपस्थित हैं और यह कि अपना पूरा ध्यान उन पर केंद्रित करने पर भगवान उसके पास आ जाएंगे। उसे बस निरंतर भगवान के बारे में सोचना आवश्यक था।

ध्रुव ने अपनी मां की सलाह को गंभीरता से लिया। एक स्थान पर बैठकर वह लगातार भगवान के बारे में सोचने लगा। उसने अपने मन को इतना केंद्रित किया कि उसने अपने आस-पास के विश्व को भी नज़रअंदाज़ कर दिया और सूंघना, देखना, सुनना तथा महसूस करना रोक दिया। उसने अपनी भूख और इच्छाओं को नियंत्रण में कर लिया। बालक की एकाग्रता देखकर सभी चौंक गए। आख़िरकार स्वयं विष्णु उसके सामने प्रकट हुए और उससे पूछा कि वह क्या चाहता है।

ध्रुव ने पूछा कि क्या वे वास्तव में भगवान हैं। विष्णु ने हां कहा तो ध्रुव ने कहा, 'तो क्या मैं आपकी गोद में बैठ सकता हूं? मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे आपकी गोद से नीचे उतारे,' ध्रुव ने उनसे कहा। विष्णु ने ध्रुव की इच्छा पूरी की। इसलिए यह माना जाता है कि आज भी बालक ध्रुव ध्रुवतारा अर्थात पोल स्टार के रूप में भगवान की गोद में विराजमान है।

इस कहानी की कई परतें हैं। एक स्तर पर यह कारण की व्याख्या करने वाली कथा है कि कोई कैसे व्याख्या करता है कि पोल स्टार आकाश में क्यों स्थित है। भारतीय पुराणशास्त्र के अनुसार पोल स्टार विष्णु की गोद में बैठा नन्हा ध्रुव है।

दूसरे स्तर पर यह एक रूपकात्मक कहानी है: इसमें एक पिता अपने दोनों बेटों को समान महत्व और प्रेम देने के लिए तैयार नहीं हैं। राजा के इस पक्षपा त के कारण वे बेटों से समान प्रेम नहीं करते, जिससे उनके राज्य में असंतोष पैदा होता है। हालांकि एक मां फिर सही रास्ता दिखाती हैं।

इस प्रकार इस कहानी में मानव व्यवहार और आचरण का वर्णन है। रूपक के उपयोग से वह बताती है कि कैसे मानवीय इच्छाओं से भौतिक संसार में पीड़ा का निर्माण होता है। इस इच्छा को दूर करने का एकमात्र तरीका भगवान का भक्त बनना है। यह कहानी भक्ति परंपरा से आई है, जो 1500 साल पहले भारत में उभरी और जिसका 500 साल पहले विस्तार हुआ।

इस कहानी को बहुधा बालकथा के रूप में सुनाया जाता है, इस कहावत के साथ कि उत्तर की ओर देखकर हम ध्रुव की दृढ़ भक्ति के बारे में जान सकते हैं, जिसने न केवल भगवान को पृथ्वी पर लाया, बल्कि ध्रुव को स्वर्ग तक उन्नत किया।

खबरें और भी हैं...