रसरंग में क़िस्सागोई:इंदिरा गांधी के कहने पर भी जब गुजराल ने रूसी प्रमुख को नहीं दी थीं अपनी घड़ी

रशीद किदवई18 दिन पहले
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प्रधानमंत्री के तौर पर इंद्र कुमार गुजराल का कार्यकाल काफी संक्षिप्त रहा। अप्रैल 1997 में उन्होंने देश के 12वें प्रधानमंत्री के रूप में पद की शपथ ली थी। मार्च, 1998 में उनकी सरकार गिरा दी गई। लेकिन अपने इस संक्षिप्त कार्यकाल के बावजूद गुजराल अपनी विनम्रता, सभ्य व शिष्ट व्यवहार, बेदाग छवि व ईमानदारी के कारण हमेशा याद किए गए। अपने सिद्धांतों के प्रति वे बेहद अडिग थे। उनकी इस सिद्धांतवादिता को लेकर कई किस्से भी रहे हैं।

यह किस्सा 1976 में तब का है, जब गुजराल मास्को में भारत के राजदूत थे। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के दौरे पर पहुंचीं। उनके स्वागत-सत्कार में क्रेमलिन में एक शानदार कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें गुजराल भी उपस्थित थे। गुजराल ने तब एचएमटी की बनी घड़ी पहनी हुई थी। उस समय सरकारी उपक्रम क्षेत्र की कंपनी एचएमटी की घड़ियों का जलवा हुआ करता था। सोवियत संघ प्रमुख ब्रेजनेव को वह घड़ी बहुत पसंद आई और उन्होंने उससे मुताल्लिक ढेरों सवाल गुजराल से पूछ डाले।

दुभाषिए की बातें सुन इंदिरा ने गुजराल से हिंदी में धीरे से कहा, 'इसको दे दो ना, उतार के।' मगर कूटनीतिक शिष्टाचार से बंधे गुजराल को यह ठीक नहीं लग रहा था। तब इंदिरा दोबारा बोलीं, 'दे दो न भाई, इतनी अच्छी लग रही है जो इनको।' गुजराल ने शिष्टाचार नहीं तोड़ा, लेकिन ब्रेजनेव से वादा जरूर किया कि वह उन्हें ऐसी ही एक घड़ी भिजवा देंगे। बाद में उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया और ब्रेजनेव को उस तरह की कई घड़ियां भेजी गईं।

इससे पहले 20 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी, जिसके तहत आम नागरिकों के अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था तथा मीडिया पर पहरे बिठा दिए गए थे। उस समय इंद्र कुमार गुजराल सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उन्हीं दिनों इंदिरा ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक जनसभा का आयोजन किया। लेकिन सरकार के टीवी चैनल 'दूरदर्शन' पर उस सभा का प्रसारण नहीं किया गया। गुजराल का मानना था कि उक्त सभा पार्टी द्वारा आयोजित की गई थी, जिसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं था। सो इसके कवरेज की जरूरत नहीं थी। इस पर संजय गांधी व उनकी टीम ने इंदिरा के कान भरे तथा गुजराल से मंत्रालय का दायित्व लेकर उन्हें भारत का राजदूत बनाकर मास्को भेज दिया गया। उनकी जगह विद्याचरण शुक्ला को सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया।

गुजराल को उर्दू से बे-पनाह इश्क था, जो ताउम्र बरकरार रहा। उर्दू के विकास व प्रसार के लिए 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक समिति बनाई थी, जिसका नेतृत्व गुजराल को सौंपा गया था, जो उस वक्त केन्द्रीय निर्माण व आवास राज्य मंत्री थे। पाकिस्तानी नेताओं के साथ वार्ताओं में गुजराल उर्दू का खूबसूरत इस्तेमाल किया करते थे। नवाज शरीफ से उनके संबंध बहुत अच्छे थे। मालदीव की राजधानी माले के निकट स्थित एक द्वीप पर दोनों देशों की बैठक के दौरान जब ये दोनों दिग्गज नेता उपस्थित थे। तब गुजराल मशहूर शायर अली सरदार जाफरी की ये पंक्तियां अक्सर सुनाया करते थे- 'गुफ्तगू बंद न हो, बात से बात चले...।'

जब बन गया गिनीज रिकॉर्ड...

कांग्रेस छोड़ने के बाद भी विद्वत्ता व स्पष्ट विचारों के चलते गुजराल की प्रासंगिकता सदैव बनी रही। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर दोनों के प्रधानमंत्रित्व काल में गुजराल को विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया। इराक व कुवैत के बीच खाड़ी युद्ध भड़क उठा तो गुजराल ने एक अविस्मरणीय काम कर दिखाया। उन्होंने उस क्षेत्र में फंसे 1 लाख 70 हजार भारतीयों को हवाई जहाजों द्वारा सुरक्षित देश तक लाने में सफलता पाई। एक बार में इतने सारे लोगों को एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित करने का यह विश्व रिकॉर्ड गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया।

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