मायथोलॉजी:पुराणों में भी मिलते हैं 'सरोगेसी' के उदाहरण

देवदत्त पटनायक9 महीने पहले
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नाथद्वारा शैली की एक पेंटिंग में बलराम। उन्नीसवीं सदी की यह दुर्लभ पेंटिंग लॉस एंजिलिस काउंटी म्यूजियम ऑफ आर्ट में रखी हुई है।   - Dainik Bhaskar
नाथद्वारा शैली की एक पेंटिंग में बलराम। उन्नीसवीं सदी की यह दुर्लभ पेंटिंग लॉस एंजिलिस काउंटी म्यूजियम ऑफ आर्ट में रखी हुई है।  

अब निस्संतान दंपतियों के लिए माता-पिता बनना दूर की कौड़ी नहीं रह गया है। आधुनिक विज्ञान की प्रगति के साथ ही ऐसे कई उपाय आ गए हैं जो पति या पत्नी या दोनों की संतोनोत्पत्ति में असमर्थता को दूर करने में मददगार होते हैं। इनमें टेस्ट ट्यूब बेबी से लेकर सरोगेसी तक के उपाय शामिल हैं।

यह तो आधुनिक जमाने की बात है। लेकिन भारतीय पुराणशास्त्रों में भी विविध तरीक़ों से संतान पैदा करने की कई कहानियां मिलती हैं। जैन पुराणशास्त्र में 24वें तीर्थंकर महावीर के जन्म की कहानी है। कहते हैं कि देवनंदा नामक एक ब्राह्मण स्त्री गर्भवती थी। फिर इंद्र गर्भ को एक और उचित कोख अर्थात त्रिशला की कोख में ले जाते हैं और 24वें तीर्थंकर महावीर जन्म लेते हैं। त्रिशला, क्षत्रिय राजा सिद्धार्थ की रानी थीं।

भागवत पुराण में कंस ने देवकी के सारे बच्चों को मारने की ठान ली थी, क्योंकि उसकी मृत्यु देवकी की आठवीं संतान के हाथों लिखी थी। छह संतानों का वध होने के बाद भगवान् विष्णु सातवें भ्रूण को कंस से बचाने के लिए रोहिणी की कोख में ले जाते हैं। इस तरह बलराम का जन्म होता है।

रामायण में दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या उन्हें संतान देने में असमर्थ थीं। दशरथ को ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि कैकेयी एक महान राजा की मां होंगी। इसलिए वे कैकेयी से विवाह करते हैं। जब कैकेयी भी उन्हें संतान नहीं दे पातीं तो वे तीसरा विवाह करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें दैवीय सहायता की जरूरत है। तब ऋष्यशृंग ऋषि को बुलाया जाता है। वे देवों का आवाहन करते हैं ताकि उनसे दशरथ की पत्नियों को गर्भवती बनाने की जादुई औषधि मिल सके।

महाभारत में जब विचित्रवीर्य बिना किसी संतान के देवलोक चले जाते हैं तो उनकी मां सत्यवती के कहने पर ऋषि व्यास विचित्रवीर्य की विधवाओं के साथ नियोग करते हैं। इससे विचित्रवीर्य की पहली पत्नी अंबिका धृतराष्ट्र को व दूसरी पत्नी अंबालिका पांडु को जन्म देती हैं।

ऋषि दुर्वासा के दिए गए मंत्र से कुंती अलग-अलग देवताओं का आवाहन करके युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को जन्म देती हैं। वे पांडु की दूसरी पत्नी मादरी के साथ भी यही मंत्र बांटती हैं। उस मंत्र से नकुल और सहदेव पैदा होते हैं। पांचों बच्चे पांडव कहलाते हैं। हालांकि वे पांडु की संतानें नहीं हैं। पांडु सिर्फ़ इन बच्चों की माताओं के पति हैं, जिस कारण वे उनके पिता कहलाने का अधिकार प्राप्त करते हैं। इस हैसियत से कर्ण भी उनके पुत्र हैं। लेकिन चूंकि कर्ण पांडु की अनुमति के बिना जन्मे थे, कुंती असमंजस में हैं कि पांडु को कर्ण के बारे में बताया जाए या नहीं। इस तरह जीव-विज्ञान के अलावा राजनीति और उत्तराधिकार भी पितृत्व का निर्धारण करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

भारत में सरोगेसी के नियमों में भी यह स्पष्ट दिखाई देता है। संतान पैदा करने के लिए सिर्फ़ विषमलैंगिक, विवाहित जोड़ियां सरोगेसी का रास्ता अपना सकती हैं। अविवाहित लोगों और समलैंगिक जोड़ियों को सरोगेसी की अनुमति नहीं है। फिर भी दो ब्रह्मचारी ऋषियों युज और उपयज ने अग्नि कुंड से द्रौपदी और दृष्टद्युम्न इन जुड़वां बच्चों का निर्माण किया।

आप अपने बच्चे के सिंगल पैरेंट बन सकते हैं, लेकिन पैटरनिटी टेस्ट के ज़रिए आपको साबित करना होगा कि बच्चा आपका है। अविवाहित लोग संतान को गोद ज़रूर ले सकते हैं, जैसे कण्व ऋषि जंगल में अकेली छोड़ी गई शकुंतला को गोद लेते हैं। लेकिन आप बच्चे को खरीद नहीं सकते, क्योंकि खरीदे हुए बच्चे का शोषण किया जा सकता है। हालांकि इस बात की क्या गारंटी है कि गोद लिए गए बच्चे का शोषण नहीं होगा? आधुनिक भारत में इससे संबंधित नियम शायद हरिश्चंद्र की कहानी पर आधारित है। हरिश्चंद्र 100 गायें देकर सुनहशेप को खरीदते हैं, ताकि अपने असली बेटे रोहित की जगह वे उसकी बलि देकर वरुण को ख़ुश कर सकें।

(लेखक प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता हैं।)

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