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रसरंग में चिंतन:दंभ की ‘चाबी' से चलती है परिवार की राजनीति

गुणवंत शाह9 दिन पहले
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अमेरिका का मियामी बीच विश्वविख्यात है। कुछ साल पहले इसी शहर में मुझे एक रात ठहरने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस शहर में एक जैन परिवार आनंदपूर्वक रह रहा है। ऐसा अनोखा परिवार मैंने अपने जीवन में कहीं और नहीं देखा। एक बंगले में माता-पिता के अलावा सात पुत्र और सात पुत्रवधुएं बच्चों समेत रहते हैं। इसी बंगले के बगीचे में काफी संख्या में मौसम्बी और नारंगी के पेड़ लगे हुए हैं। वहां पानी मांगे जाने पर गिलास भरकर मौसम्बी का रस मिलता है। अमेरिका जैसे देश के मियामी शहर में संयुक्त परिवार को देखना अच्छा लगा।

ब्रिटेन के विख्यात मनोवैज्ञानिक रोनाल्ड लेचिंग ने दो किताबें लिखी हैं, जिसे 1968-69 में पढ़ने का अवसर मिला। किताबों के नाम हैं - पॉलिटिक्स ऑफ द फैमिली और पॉलिटिक्स ऑफ एक्सपीरियंस। इसमें से एक किताब का उदाहरण नहीं भूल पाता। एक महिला का तलाक हो गया होता है। वह अपनी बेटी के साथ रहती है। महिला से मिलने के लिए जब उसका पुरुष मित्र घर आता, तब उस पुरुष का पूरा ध्यान उसकी बेटी पर लगा रखता है। यह महिला को गंवारा न था। इसलिए उसने एक उपाय खोजा। अब वह अपने मित्र को तभी बुलाती, जब उसकी बेटी घर पर नहीं होती। मां-बेटी के बीच इस तरह की राजनीति चलती रहती।

भारतीय समाज में परिवार की राजनीति का केंद्र बिंदु सास मानी जाती रही है। सासु मां का सुख का आधार ही होता है उसका दंभ। पति-पत्नी के पास स्टील की अलमारी होती है, जिसकी एक चाबी वह सदैव अपने पास ही रखती। इससे उसे पता चल जाता कि बहू के पास कितनी साड़ियां हैं और उसने कितने नए जेवर बनवाए। यह जानकारी ससुराल से मायके आने वाली घर की बेटी को भी मिल जाती। इस तरह से संकीर्णता के बीच राजनीति चलती जाती। हालांकि अब जमाना बदल गया है। अब तो शिक्षित पुत्रवधू ऐसे मामलों में सास-ननद से बेहतर तालमेल बिठा लेती है। सास स्वयं भी चाबी रखने से मना कर देती है। वर्तमान में सास-बहू के विवाद भी कम होने लगे हैं। शिक्षा को इसका श्रेय दिया जा सकता है। अब तो सास को अपने वाहन के पीछे बिठाकर बहू मंदिर या फिल्म देखने जाने लगी है।

यह भी सच है कि कितनी ही सासुएं हिटलर की तरह होती हैं। जब पुत्रवधू को दबाने की सारी कोशिशें नाकामयाब होती हैं, तब एक टीवी धारावाहिक का जन्म होता है। ऐसे धारावाहिकों से छल-कपट, बदला लेने का संकल्प और अहंकार को निकाल दो तो फिर क्या बचता है? यह विचारणीय है। अहंकार की यह मुठभेड़ रोज रात को हमारा कीमती समय बरबाद करती है। इस तरह के सीरियल को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं लल्लू जैसे पति या फिर जेठ-देवर।

अब तो आश्रम में 'संसार' घुस गया है

संसार में आश्रम जैसा वातावरण रचा जाना संभव हो सकता है। इसके विपरीत आश्रम में संसार घुस जाता है। शुरुआत दानपेटी से होती है। फिर रसीद बुक का क्रम आता है। आखिर में कुछ लोग अपना काला धन सफेद करने के लिए दान देना शुरू कर देते हैं। गुरुजी अपनी खूबसूरत शिष्याओं के रूप-जाल में फंस जाते हैं। बात बहुत आगे तक बढ़ जाती है, तब गुरुजी सलाखों के पीछे होते हैं। आजकल आश्रम में जो कुछ होता है, यह उसी का काला पक्ष है।

अपने भीतर की आवाज को दबाकर जीने की बुरी आदत पड़ जाती है। इसे हम ऐसी मौत कह सकते हैं, जिसकी श्मशान यात्रा नहीं होती। रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं- पुष्प का खिलना ही उसका मोक्ष है। टीवी पर रोज परोसे जाने वाले धारावाहिक तो मनुष्य को मोक्ष से भी मुक्त कर देते हैं।

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

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