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रसरंग में चिंतन:सच्चे संत की तरह होते हैं घर के बाग में खिले फूल

गुणवंत शाह13 दिन पहले
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तस्वीर प्रतीकात्मक है। - Dainik Bhaskar
तस्वीर प्रतीकात्मक है।

क्या आपने कभी पूरी तरह से खिले हुए किसी पुष्प के पास जाकर उसे जी-भरकर निहारा है? उस समय ऐसा लगता है मानों हम किसी सच्चे संत के साथ सत्संग कर रहे हैं। गांधी युग में देश को अनेक खादीधारी साधु मिले हैं। स्वामी आनंद किसी खिले हुए फूल की तरह ही साधु थे। वर्ष 1957 में रविशंकर महाराज से मिलने के लिए स्वामी आनंद कुड़सद आने वाले थे। हम सब खुशी-खुशी उनसे मिलने के लिए चल पड़े। मन में खुशी थी कि आज स्वामी जी के दर्शन होंगे। किसी कारणवश स्वामी जी कुड़सद नहीं पहुंच पाए। इससे हम सभी काफी निराश हो गए।

गांधीयुग के दूसरे साधु हुए केदारनाथ जी। सच्चे अध्यात्म का परिचय प्राप्त करना हो तो केदारनाथ जी की बेहतरीन किताब 'विवेक और साधना' अवश्य पढ़ें। गांधीयुग के तीसरे किंतु कम प्रसिद्ध साधु थे साने गुरुजी। गुरुजी इतने अधिक संवेदनशील थे कि गांधीजी के अवसान के बाद भ्रष्ट राजनीति से दु:खी होकर उन्होंने आत्महत्या कर ली। किंतु इसके पहले वे समाज को कुछ श्रेष्ठ पुस्तकें दे गए, जैसे 'श्याम ची आई', 'आस्तिक', और 'गीता हृदय'। विनोबा जी ने धूलिया की जेल में गीता के जो प्रवचन दिए, उन्हें सुंदर अक्षरों में लिखने वाले साधु थे साने गुरुजी।

घर के बगीचे में रोज सुबह चहल-कदमी करते हुए यह महसूस होता है जैसे मैं संतों के बीच से गुजर रहा हूं। मनुष्य को अपने भावजगत में तैरने, चलने और उड़ने का अधिकार है। मोरारी बापू जब भी घर आते हैं, तो उनसे रामायण द्वारा सृजित किए गए भावजगत की दो बातों पर ही चर्चा होती है। राम एक विचार का नाम है और विचारों की कभी मृत्यु नहीं होती। इसलिए राम अमर हैं। इसे यदि कोई गहराई से समझा है, तो वह है दलित जाति में पैदा हुई शबरी। कोई धूर्त या चालाक व्यक्ति इसे समझ ही नहीं सकता।

संत कवि दादू दयाल के जीवन की एक घटना बहुत ही महत्वपूर्ण है। संत दादू अपने घर में बैठे-बैठे चमड़ा सील रहे थे। वे अपने काम को पूरी तरह से भक्तिभाव में डूबकर करते थे। काम के साथ-साथ वे अपनी मस्ती में गाते भी रहते थे। इस दौरान कबीर के शिष्य कमाल, संत दादू दयाल के घर पहुंचे। कमाल ने देखा कि संत अपने काम में पूरी तरह से मशगूल हैं। उनके काम में किसी प्रकार का खलल न हो, इसलिए वे बाहर आंगन में खड़े हो गए। कुछ समय बाद संत की नजर उन पर पड़ी। वे तुरंत ही खड़े हो गए। कमाल का हाथ पकड़ा और उन्हें स्नेहपूर्वक अपने घर के भीतर ले आए। फिर उनसे पूछा कि आपको मेरे अस्वच्छ घर में आने में कोई संकोच तो नहीं हुआ ना? तब कमाल ने कहा- संकोच कैसा, मैं तो आपके दर्शन के लिए आया हूं। फिर उन्होंने कमाल को बैठने के लिए चमड़े का आसन बिछा दिया। यह देखकर कमाल की आंखों में आंसू आ गए। संत ने कहा- इसे अन्यथा न लें, मैंने यह आसन आपको जान-बूझकर नहीं दिया है। मेरे पास इसके सिवाय दूसरा कोई आसन ही नहीं है। तब कमाल ने संत से कहा- मैं आपके दरवाजे पर एक क्षण के लिए खड़ा रहा। आपने स्नेह से मेरा स्वागत किया। मेरा हाथ पकड़कर मुझे अंदर ले आए। बैठने के लिए आसन दिया। मुझे पता ही नहीं है कि ईश्वर मेरे हृदयरूपी आंगन के दरवाजे पर इस तरह से चुपचाप खड़े हैं। मुझे बार-बार यही लग रहा था कि उनकी दृष्टि कब मुझ पर पड़े। मैं कब अपने ईश्वर को अपने भीतर लाकर उन्हें हृदय के आसन पर बिठाऊंगा। इतना कहते हुए कमाल की आंखें भर आईं। तब भरे गले से संत दादू ने कहा-बेटा, घबराना नहीं, इन क्षणों में ईश्वर स्वयं तुम्हारे भीतर पधारे हैं। बस उन्हें भीतर की आंखों से देखने की देर है।

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

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