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रसरंग में किस्सा-ए-क्रिकेट:स्टेडियम में जहां से सिक्सर की मांग आई, वहीं जड़ दिए दो छक्के

सुशील दोशी13 दिन पहले
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सलीम दुर्रानी - Dainik Bhaskar
सलीम दुर्रानी

बात 1973 की है। मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में मैं भारत और इंग्लैंड के बीच हो रहे टेस्ट मैच की कमेंट्री कर रहा था। सलीम दुर्रानी जब बल्लेबाजी करने आए, तब उनके प्रदर्शन को लेकर सभी में उत्सुकता थी। दरअसल, कानपुर के पिछले टेस्ट मैच में उन्हें नहीं खिलाया गया था। तब स्टेडियम में दर्शक पोस्टर लेकर बैठ गए थे - नो दुर्रानी, नो टेस्ट।

अंतत: उन्हें मुंबई टेस्ट मैच में खिलाया गया। सलीम दुर्रानी के साथ टाइगर पटौदी बल्लेबाजी कर रहे थे। वे एक-एक रन के लिए बड़ा संघर्ष कर रहे थे। तभी पैवेलियन के एक कोने में बैठे कुछ दर्शकों ने नारे लगाने शुरू कर दिए - सिक्सर वांटेड। सलीम ने ये नारे सुने और ठीक उसी समय उसी दिशा में उन्होंने दो छक्के ठोंक दिए। 'सिक्स ऑन डिमांड' के लिए मशहूर सलीम ने उस दिन स्टेडियम का दृश्य ही बदल दिया। उन्होंने पहली पारी में 73 और दूसरी पारी में 37 रन ही बनाए, पर दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता देखकर मैं अवाक् रह गया था।

एक बार जयपुर में किशन रूंगटा के मान हाउस में हम एक टेस्ट के दौरान चंदू सरवटे के साथ रुके थे। सलीम दुर्रानी भी साथ थे। तब मैंने उनसे पूछा कि वे ऑन डिमांड छक्का कैसे जड़ देते हैं? तब उन्होंने इसका श्रेय अपने टैलेंट को देने के बजाय ईश्वर को देते हुए कहा था, 'सब ऊपर वाले की कृपा है कि उस समय गेंद भी वैसी ही आ जाती थी। जब 5-6 बार ऐसा हो गया तो दर्शकों को लगा कि उनकी मांग पर ही छक्का जड़ दिया है।'

कुछ न कुछ अद्भुत करके चौंका देने की उनकी क्षमता का कोई जोड़ नहीं था। साल 1971 में भारत ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड में शृंखला जीतकर विश्व में अपनी उभरती ताकत का परिचय दिया था। जिस पोर्ट ऑफ स्पेन के दूसेर टेस्ट मैच में भारत ने जीत हासिल कर शृंखला जीतने की तरफ कदम बढ़ाया था, उसमें सलीम दुर्रानी का चमत्कारिक योगदान आज भी याद आता है। वेस्टइंडीज की दूसरी पारी में गैरी सोबर्स और क्लाइव लॉयड विकेट पर जम चुके थे और बड़ी भागीदारी पनपती लग रही थी। ऐसे वक्त में सलीम दुर्रानी अपने कप्तान अजित वाडेकर के पास गए और कहने लगे, 'एक ओवर मुझे दे दो कैप्टन, मैं दोनों को आउट कर दूंगा।' पहले तो वाडेकर ने सलीम की इस मांग को तवज्जो नहीं दी। लेकिन जब दोनों बल्लेबाज आउट होने का नाम ही नहीं ले रहे थे तो अंतत: वाडेकर ने गेंद सलीम को सौंप दी। और फिर एक ही ओवर में उन्होंने वो कमाल कर दिया कि उसकी मिसाल कम ही मिलती है। पहले तो उन्होंने सोबर्स को बोल्ड किया। फिर उसी ओवर में लॉयड को कैच आऊट करा दिया। इसके बाद कप्तान को गेंद थमाते हुए कहा, 'लो,अब आगे जिससे चाहो, गेंद करा लो।' इस अप्रत्याशित प्रदर्शन ने भारत को टेस्ट मैच में जीत और बाद में शृंखला में भी जीत दिला दी।

अपनी दरियादिली के कारण सलीम दुर्रानी को उनके चाहने वाले प्रिंस सलीम भी कहते थे। एक बार घरेलू क्रिकेट खेलने के लिए वे सुनील गावसकर के साथ एक ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। तब सनी घर से कंबल लाना भूल गए थे। रास्ते में कड़ाके की ठंड थी। सनी जैसे-तैसे सो तो गए, लेकिन सुबह जागकर देखा तो हैरत में पड़ गए। सलीम दुर्रानी ने अपना कंबल उन पर डाल दिया था और खुद ऐसे ही सो गए थे।

आज 86 साल के हो चुके सलीम दुर्रानी ऐसे एकमात्र भारतीय क्रिकेटर हैं जिनका जन्म अफगानिस्तान में हुआ था। बाद में उनका परिवार अविभाजित पाकिस्तान में आकर बस गया था। पिता अब्दुल अजीज भी क्रिकेटर थे। बाद में जामनगर के महाराजा ने पिता को परिवार सहित जामनगर बुला लिया। विभाजन के बाद पिता तो पाकिस्तान में बस गए, जबकि सलीम अपनी मां के साथ जामनगर में ही रह गए जहां उन्होंने अपनी शुरुआती क्रिकेट प्रतिभा को तराशा।

- सुशील दोशी, पद्मश्री से सम्मानित जाने-माने क्रिकेट कमेंटेटर

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