रसरंग में पाकिस्तान डायरी:हसन नासिर : मत समझो हमने भुला दिया, हर लहज़ा तुम को याद रखा

ज़ाहिदा हिना24 दिन पहले
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विचारक व शायर हसन नासिर। - Dainik Bhaskar
विचारक व शायर हसन नासिर।

हमारे यहां का पुराना पढ़ा-लिखा तबका हसन नासिर के बारे में जरूर जानता है। वे हमारे उपमहाद्वीप की एक बेमिसाल शख़्सियत थे। एक आदर्शवादी दानिश्वर और अदीब। वे हैदराबाद दक्षिण (जिसे हम हिंदुस्तान में तेलंगाना कहा जाता है) के एक मशहूर अशर्फिया ख़ानदान में पैदा हुए थे। उन्हें आला तालीम लेने के लिए विलायत भेजा गया लेकिन वे तो शायराना मिजाज़ रखते थे। इसलिए काग़जी इल्म में उनका मन कहां लगता। उनके परिवार के लोग उन्हें सिविल सर्विस के लिए भेजना चाहते थे, पर वे तो शामिल हो गए कम्युनिस्ट तहरीक में। महज़ बीस साल की उम्र में ही उन्होंने इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी में इतनी जगह बना ली कि बड़े-बड़े कम्युनिस्ट नेता उनका एहतराम करने लगे। वे पाकिस्तान आ गए और उन्होंने जी जान से पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करने लगे। हसन नासिर कराची में लगभग दस साल रहे। वहां उन्होंने अपना ज़्यादातर वक़्त भूमिगत रहने और सिक्युरिटी वालों से बचने में गुज़ारा। हसन नासिर से मार्क्सवाद की इल्म लेने वाले मोहम्मद अली का कहना है था कि हसन नासिर का कोइ स्थाई घर नहीं था और उनके खाने-पीने और सोने-जागने का कोई भी तय वक़्त नहीं था। सब बेक़ायदा था। मोहम्मद अली के मुताबिक़ वे गली में मिलने वाला सादा खाना ही खा लिया करते थे। उन्हें पार्क की बेंच, पार्टी ऑफिस या किसी भी मज़दूर के क्वार्टर में थोड़ी-सी जगह मिल जाती तो वहीं सो जाया करते थे।

वे किसी दोस्त की मुख़बिरी पर गिरफ्तार हो गए। कराची से लाहौर ले जाए गए जहां के शाही किले में उन पर बहुत भयानक ज़ुल्म किए गए और आख़िरकार वे हलाक कर दिए हो गए। जिस समय वे हलाक किए गए, उस वक्त उनकी उम्र महज 32 साल थी। हालांकि पाकिस्तानी सरकार का कहना था कि उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली। हालांकि ये बात बिल्कुल ग़लत थी क्योंकि हसन नासिर इतने कमजोर इंसान कतई नहीं थे जो ख़ुदकुशी कर लें, भयानक जु़ल्मों और सितम के बावजूद। उनका पूरा ख़ानदान हैदराबाद दक्षिण में रहता था और आज भी रहता है।

हसन नासिर की वालिदा बेगम अलमदार हुसैन को उनके वहशियाना क़त्ल की इत्तेला मिली तो वे एक काला ताबूत लेकर पाकिस्तान पहुंची, ताकि हसन नासिर के बेजान जिस्म को हैदराबाद दक्षिण ले जाएं। लेकिन सरकार आखिर उनको हसन नासिर की लाश कैसे दे सकती थी? भयावह ज़ुल्मो-सितम के कारण भयावह स्थिति में थी। इसलिए किसी पुरानी क़ब्र से एक गुमनाम लाश निकालकर हसन नासिर की मां को सौंप दी गई। इतनी बेहयाई तो कोई शैतान भी नहीं करता है। लेकिन उन्होंने की। जाहिर सी बात थी, हसन नासिर की वालिदा ने इस लाश को अपने बेटे की लाश मानने से इंकार कर दिया और ख़ाली हाथ खा़ली ताबूत लेकर वापस लौट आईं।

हसन की रुख़्सत को करीब 59 साल हो गए हैं, लेकिन वे अपने आदर्शवादी साथियों के दिलों में आज भी ज़िंदा हैं। हर साल 13 नवंबर को उनकी याद मनाई जाती है। इस मौके पर उन्हे ंचाहने वाले एक गीत गाते हैं :

मत समझो हमने भुला दिया,
ये चांदनी रात ये सुनहरी किरन
इस जगमग रात का एक एक पल
हम ने तुम से आबाद रखा
हर लहज़ा तुम को याद रखा।

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