पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

रसरंग में चिंतन:हिमालय कभी ठंड की खोज नहीं करता, पंछी होना ही एक उड़ान है!

गुणवंत शाह12 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
तस्वीर प्रतीकात्मक है। - Dainik Bhaskar
तस्वीर प्रतीकात्मक है।

अपने हिमालय प्रवास के दौरान एक साधु ने मुझे कान में कहा- हम जिसे नहीं खोज सकते, वही मैं हूं। हमारा होना ही इतना सत्य है कि इसे ढूंढना एक झूठी कवायद मानी जाती है। क्या नदी वास्तव में नदी को खोजने निकलती है? क्या हिमालय कभी ठंड की खोज करता है? कोयल अपनी कूक की तलाश में कभी बगीचे में भटकती है भला? इस दुनिया में इंसान ही एक ऐसा प्राणी है, जो कुछ न कुछ खोजने की कोशिश करता रहता है। अगर वह अपने अस्तित्व को ही जान ले, तो फिर उसे किसी भी खोज की आवश्यकता नहीं होगी। पक्षी को उड़ान की तलाश नहीं करनी पड़ती। पंछी होना ही एक उड़ान है!

जब मैं सूरत में एक बहुमंजिली इमारत के तीसरे माले पर रहता था, तब खिड़कियों में ग्रिल नहीं थी। स्वजनों ने मुझे सलाह दी कि अभी समय का भरोसा नहीं। इसलिए खिड़कियों में सलाखें तो होनी ही चाहिए। मैंने मजाक में जवाब दिया- इतनी ऊंचाई पर खुद को जोखिम में डालकर तीसरे माले पर कोई घर में घुस आए, तो वह खाली हाथ जाए, यह मुझे गंवारा नहीं। चंद्रमा की किरणों को घर में आने से रोकने में सलाखें नाकामयाब होती हैं, परंतु मेरे और चंद्रमा के बीच यदि सलाखें होती हैं, तो मुझे लगता है कि मैं कैद में हूं।

अंधेरा हम पर कई उपकार भी करता है। निशाचरों को यह बहुत ही भाता है। आधी रात को जागने वाले रचनाकार के लिए अंधेरा भी प्रकाश की किरण बन जाता है जबकि उजाले की सगुण और साकार सृष्टि उसे उबाऊ लगने लगती है। अंधकार में अंदर से प्रकट होने वाली निर्गुण और निराकार सृष्टि में सृजन को समाहित करने की संभावना होती है। जो सृजन भीतर से पैदा न हो, उसे सिंथेटिक सृजन कहा जाता है। वह लेखन पाठकों तक तो पहुंचता है, पर उनके हृदय को छू नहीं पाता।

रॉबर्ट फ्रॉस्ट कहते हैं- यदि लेखक की आंखों में आंसू न हो, तो पाठक की आंखों में कभी आंसू नहीं आ सकते। दुनिया में वही कविता, वही उपन्यास, वही कहानी टिक पाई है, जिसने लेखक और पाठक को एकाकार किया है। विनोबा भावे ने एकरूपता के लिए 'गीता प्रवचन' में 'एकचित्तसमाधि' शब्द का प्रयोग किया है। वे कहते हैं- गीता के उपदेश के दौरान कृष्ण और अर्जुन के बीच एकचित्त समाधि हुई थी। इस बात को समझने के लिए विद्वान साहित्यकार निष्फल साबित होते हैं। आजकल साहित्य के क्षेत्र में कनेक्टिविटी लगातार क्षीण होती जा रही है। यह दु:खद सत्य है। समाज और संस्कृति का मूल्यांकन किस तरह से किया जाए। सही मापदंड तो कविता है। हमारे यहां रामायण-महाभारत जैसे दो-दो महाकाव्यों की सौगात मिली है। दोनों महाकाव्यों का एक भी श्लोक रसहीन नहीं है। क्या इन्हें पाठ्यपुस्तकों में स्थान नहीं मिल सकता? पहली से लेकर पी-एच.डी. करने तक विद्यार्थियों को इन दोनों महाकाव्यों का संस्पर्श न मिले, तो क्या इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए?

क्या है मन का राजसी रोग?

क्या मन का कोई राजसी रोग भी है भला? भीतर से आवाज आती है कि मन के इस रोग का नाम अहंकार है। दर्शन की दृष्टि से देखें तो दंभ का संबंध तो असल में 'स्व' से दूर जाने की प्रक्रिया के साथ ही माना जाता है। मनोविज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाए तो पाखंड अपर्याप्तता की भावनाओं की संतान है। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में दंभ को कृष्ण आसुरी सम्पत्तियों की सूची में पहले स्थान पर रखते हैं।

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

खबरें और भी हैं...