रसरंग में मायथोलॉजी:हिंदू धर्म : स्वत: पूर्ण अवस्था में शुरू हुआ था या इसे इतिहास ने आकार दिया?

देवदत्त पटनायक16 दिन पहले
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हिंदुओं के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक ऋग्वेद संभवतः करीब 3,500 साल पहले सिंधु घाटी के आसपास रचे गए थे। - Dainik Bhaskar
हिंदुओं के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक ऋग्वेद संभवतः करीब 3,500 साल पहले सिंधु घाटी के आसपास रचे गए थे।

कई हिंदू मानते हैं कि हिंदू धर्म को ऋषियों ने रचा था और वह पूर्ण अवस्था में शुरू हुआ था और यह भी कि मोक्ष उसका स्पष्ट उद्देश्य है। उनके अनुसार, सभी पवित्र ग्रंथ हज़ारों साल पहले पूर्ण अवस्था में बनाए गए थे। हिंदू धर्म न तो किसी विकास की प्रक्रिया से गुजरा और न ही इसमें कोई परिवर्तन हुआ है। उनके अनुसार हिंदू धर्म एक अतींद्रिय धारणा है जो काल, स्थान और पात्र के आधार पर अलग-अलग तरीक़ों से प्रकट होती है। और इसी बात पर इतिहासकारों और हिंदू धर्मियों में विवाद है।

इतिहासकार मानते हैं कि हिंदू धर्म को इतिहास ने आकार दिया है। यह एक नदी जैसा है जिसमें कई सहायक नदियां अलग-अलग समय में और अलग-अलग जगहों पर मिली हैं। उनके अनुसार 2,500 साल पहले यानी गौतम बुद्ध से पहले ‘धर्म’ शब्द का इस्तेमाल बहुत कम किया जाता था। ‘मोक्ष’ शब्द का महत्व भी बहुत बाद में बढ़ा, खासकर एक हज़ार साल पहले हिंदू मठों के उदय के बाद। चाणक्य का अर्थशास्त्र मानव जीवन की केवल तीन आधारशिलाओं की बात करता है: धर्म (व्यवस्था), अर्थ (सफलता) और काम (आनंद)। चौथी आधारशिला मोक्ष (मुक्ति) की बात बाद में और भक्ति की बात तो उससे भी बाद में की गई है।

रूढ़िवादी हिंदू इस विश्लेषण को ‘पाश्चात्य’ कहकर अमान्य करते हैं। उनके अनुसार सभी विचार वेदों में मौजूद हैं। वेदों में धर्म, मोक्ष और भक्ति का उल्लेख ज़रूर किया गया है, लेकिन इस तरह से कि सिर्फ़ विश्वास रखने वालों को वे बातें समझ में आती हैं।

इधर विद्वानों के अनुसार 3,500 साल पहले ऋग्वेद संभवतः सिंधु घाटी के आसपास रचे गए थे। हड़प्पा सभ्यता के पतन के पांच सदियों बाद सरस्वती नामक नदी यहां बहा करती थी। अधिकांश लोगों का मानना ​​है कि हड़प्पा के शहरों में वैदिक प्रथाएं नहीं थीं। लेकिन कई लोगों ने उत्तरक़ालीन वैदिक प्रथाओं में हड़प्पा के विचारों का प्रभाव देखा है, जो किसी न किसी रूप में दोनों में निरंतरता का संकेत है।

ढाई हज़ार साल पहले गंगा के निचले मैदानों में उपनिषद उभरे। इसके बाद रामायण, महाभारत और विभिन्न बौद्ध व जैन विद्याओं की रचना भी हुई। लगभग 2,000 साल पहले ऋषि और संन्यासी समुद्र तटों और नदियों के किनारों से होते हुए इस ज्ञान को दक्षिण भारत ले गए, जहां तमिल में संगम काव्य रचा जा रहा था। जल्द ही दक्षिण भारत के शहरों और नदियों को दक्षिण-काशी और दक्षिण-गंगा जैसे नामों से जाना जाने लगा।

संगम काव्य के देवगण वेदों के देवगण से अलग हैं: पहाड़ों पर मुरुगन, जंगलों में पेरुमल और रणभूमि पर कोत्रवई। उनकी पहचान कार्तिकेय, विष्णु और काली के साथ की जाती है। लेकिन उन्हें यह पहचान किसने दी - उत्तर से आए ब्राह्मणों ने या क्या यह पहचान पहले से ही मौजूद थी, एक ही विचार की अलग-अलग भाषाओं में अभिव्यक्ति? संगम काव्य की दुनिया में एक भौतिक जुनून पाया जाता है, जो वैदिक स्तोत्रों के अतींद्रिय विचारों से बहुत अलग है और यज्ञ की तुलना में पृथ्वी से कहीं अधिक निकटता से जुड़ा हुआ है। इसका अंततः हिंदू विचारधारा पर गहरा प्रभाव पड़ा।

कई हिंदू मानते हैं कि सभी हिंदू विचार उत्तर में स्थित हिमालय और गंगा के मैदानों में उभरे और वहां से फैले। बहुत कम लोग भक्ति और तंत्र जैसे विचारों के दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी स्रोत को स्वीकार करते हैं, जिनके साथ हिंदू धर्म को अब पहचाना जाता है।

आस्तिकता और ईश्वर की अधीनता के क्रांतिकारी विचार वेदों में नहीं, बल्कि भगवद् गीता में पाए गए। इन विचारों को एक हज़ार साल पहले रहने वाले अलवर और नयनार नामक विष्णु और शिव के भक्तों की तमिल कविता में पूर्ण अभिव्यक्ति मिली। शंकर, रामानुज और माधव ने वैदिक सिद्धांत को देवताओं से जुड़ी इस भावना से जोड़ा, जो बदले में पहाड़ों और नदियों से जुड़ी थी। रामानंद और वल्लभ इन विचारों को उत्तर भारत ले आए। आज नानक, कबीर, मीरा, सूरदास और तुलसीदास के साथ जोड़े जाने वाले भक्ति आंदोलन को उन्होंने प्रेरित किया।

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