रसरंग में चिंतन:कठिन बातों को भी सरलता से कैसे समझाया जाएं, विनोबा भावे से सीख सकते हैं

गुणवंत शाह6 दिन पहले
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भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे। - Dainik Bhaskar
भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे।

ऋषि विनोबा भावे सदाबहार अभिनेता राजकपूर से कभी मिले भी होंगे या नहीं? लम्बी पदयात्रा के दौरान वे शायद दिलीप कुमार से मिले होंगे। वे देवानंद जैसे अभिनेता से मिले होंगे, यह भी संभव है। पता नहीं, इनमें से वे किसी से मिले या नहीं, लेकिन हां, वे कम से कम एक अभिनेता से अवश्य मिले। उनका नाम है जितेंद्र।

कुछ ही दिनों पहले मुझे दो किताबें मिलीं। पहली थी - 'विनोबा: जीवन प्रसाद' और दूसरी थी - 'विनोबा : चिंतन प्रसाद'। इन दोनों का संपादन रमेश संघवी ने किया है। बहुत ही सरल तरीके से लिखी गई इन किताबों को पढ़कर ऐसा लगा मानो रमेश भाई ने बड़ा उपकार किया है। इन दो उत्कृष्ट पुस्तकों को पढ़कर मेरा यौवन लौट आया। मैं तरोताज़ा हो गया। इन्हीं किताबों से पता चला कि विनोबा जी जब अभिनेता जितेंद्र से मिले, तो उन्होंने पूछा- नाम तो जितेंद्र है, परंतु क्या तुमने इंद्रियों को जीत लिया है? इस तरह के मजाक विनोबा जी यदा-कदा कर लेते थे। इन दोनों किताबों को पढ़कर मैं धन्य हुआ।

स्वयं विनोबा भावे उच्च स्तर के मौलिक चिंतक थे। उनकी लेखन शैली और प्रवचन शैली बहुत सरल थी। जो साहित्यकार क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं, उनके लेखन को उनकी पत्नी भी शायद नहीं पढ़तीं। ऐसे स्वयंभू साहित्यकार ही अपनी मातृभाषा के पतन के लिए जिम्मेदार हैं। विनोबा जी वेद, उपनिषद और गीता के जानकार थे। हर पखवाड़े वे 'भूमिपुत्र' के पहले लेख में बहुत ही गंभीर और गहराई से तत्वज्ञान को सरल भाषा में समझाते।

भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा जिन-जिन गांवों से होकर गुजरे, वे सभी गांव याद आ गए। सूरत के रेलवे स्टेशन में हम दो-तीन दोस्त विनोबा जी का साहित्य बेचने का काम करते। इस दौरान दो-चार अच्छे ग्राहक मिल जाते तो हमें खुशी होती। ऐसा लगता मानो हमारे दिन सुधर गए। प्रबोध चौकसी की किताब 'साम्ययोगी विनोबा' की कीमत साढ़े तीन रुपए थी। जब वह किताब बिक जाती तो हम प्रसन्नता से भर उठते। वह किताब आज शायद ही कहीं मिले।

आज सर्वोदय जगत में दो नाम ऐसे हैं, जो अब भूलने के कगार पर हैं। प्रबोध चौकसी और हर्षकांत वोरा। दोनों अच्छे मित्र थे। ये अपने काम से जाने जाते हैं। इन दिनों सूफी विचारधारा की ओर मेरा आकर्षण बढ़ता जा रहा है। मेरे मित्र डॉ. महबूब देसाई काफी बड़े विद्वान हैं। उनके विचार सर्वधर्म समभाव को समर्थन देते हैं। उनकी किताब 'गांधीजी को दिए गए मानपत्र' इतिहास को उजागर करने वाली है। महात्मा गांधी को लोगों ने अनेक मानपत्र दिए होंगे, इसे स्वीकारते हुए बापू निश्चित रूप से थक गए होंगे। लार्ड भीखू पारेख ने इसकी प्रेरणास्पद प्रस्तावना लिखी है। इसमें वे लिखते हैं - गांधी जी ने सुकरात को पहला सत्याग्रही माना था।

स्वयं की प्रशंसा महात्मा गांधी को कभी अच्छी नहीं लगती। प्रशंसा से उनके कार्यों में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं आता था। प्रशंसा के जलप्रपात के नीचे खड़े होकर भी उससे जरा भी प्रभावित नहीं होते। भीगने का सवाल ही पैदा नहीं होता। वे वास्तव में अनासक्त थे।

जहां फकीर की रोशनी, वहां मानवता ही मजहब

सूफ़ी संत मौलाना जलाल-उद-दीन रूमी ने लिखा है : इतना जान लो कि / दूरियों का आईना अनंत है / क्योंकि दिल भगवान के पास है / या हृदय ही ईश्वर है / मेरे दोस्त! सूफी वह तो समय की संतान हैं / मैं बस अपनी सांस में ही पाऊंगा / ताकि तुम मेरा जीवन बन जाओ! क्या आपने कभी किसी सूफी संत को गैर धर्मनिरपेक्ष देखा है? जहां 'फकीर की रोशनी' होती है, वहां मानवता ही मजहब होती है और जहां मानवता के साथ मोहब्बत होती है, वहां साम्प्रदायिकता कैसे टिक सकती है।

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