रसरंग में कवर स्टोरी:कैसी होगी डिजिटल करेंसी?

अविनाश शेखर एवं अजीत कुमार3 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
प्रतीकात्मक तस्वीर। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक तस्वीर।
  • आरबीआई जल्दी ही देश में डिजिटल करेंसी जारी कर सकता है। इसकी तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। यह डिजिटल करेंसी कैसी होगी और इससे क्या बदलेगा, इसी की पड़ताल करती इस बार की कवर स्टोरी...

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी. रवि शंकर ने हाल ही में कहा है कि आरबीआई देश में व्यवस्थित डिजिटल करेंसी के ऑपरेशन के लिए मॉडल को इस साल के अंत तक पेश कर सकता है। डिजिटल करेंसी का मुद्दा पिछले कई माह से ट्रेंड में है और रवि शंकर के इस ताजा बयान के बाद यह एक कदम और आगे बढ़ गया है। इससे पहले उन्होंने कहा था कि डिजिटल करेंसी से जुड़े विभिन्न पहलुओं का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया जा रहा है। क्रिप्टो/प्राइवेट वर्चुअल करेंसी से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अध्ययन के लिए बनी अंतर मंत्रिमंडलीय समिति ने साल 2019 में ही सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी की सिफारिश की थी।

क्या है डिजिटल करेंसी?
यह देश की फिएट मुद्रा (जैसे रुपया, डॉलर या यूरो) का एक डिजिटल संस्करण है। इसे केंद्रीय बैंक जारी करता है। साथ ही इसकी गारंटी भी देता है। यह फिएट मुद्रा के साथ ही वन टू वन एक्चेंजेबल है। हालांकि यह प्राइवेट मनी के मौजूदा रूपों जैसे ई-मनी (प्रीपेड वॉलेट में संगृहीत मनी) या बैंक डिपॉजिट/जमा, जिसे कार्ड या मोबाइल पेमेंट सिस्टम का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसफर किया जा सकता है, से यह अलग होगा।

क्या यह क्रिप्टोकरेंसी का ही रूप होगा?

नहीं। यह निजी संस्थाओं द्वारा जारी क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉयन से अलग है। क्रिप्टोकरेंसी के प्रति कोई लाएबल नहीं होता है, जबकि इसके ठीक विपरीत डिजिटल करेंसी केंद्रीय बैंक की देनदारी होगी। क्रिप्टोकरेंसी की कीमत में बहुत उतार-चढ़ाव होता है। बिटकॉइन इसका उदाहरण है। पिछले तीन महीने में बिटकॉइन की कीमत गिरकर आधा से कम रह गई है। क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग होती है। इसके लिए ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है। इसको कोई सरकार या कोई विनियामक अथॉरिटी जारी नहीं करती है। इसके उलट डिजिटल करेंसी को केंद्रीय बैंक जारी करता है। हालांकि अभी बहुत ही कम देश ऐसी मुद्राएं जारी करने के लिए आगे आए हैं।

डिजिटल करेंसी की डिजाइनिंग :
विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर अब यह जानते हैं कि सीबीडीसी के क्या क्या फॉर्म हो सकते हैं:
1. रिटेल सीबीडीसी या होलसेल सीबीडीसी : जनरल या रिटेल सीबीडीसी मुख्य रूप से आम लोगों और व्यवसायों (हाउसहोल्ड व बिजनेस) के लिए होगा और इसे व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा। जबकि होलसेल सीबीडीसी का उपयोग केवल अंतर-बैंक भुगतान, सिक्योरिटी सेटलमेंट या अन्य थोक लेनदेन के लिए किया जाएगा।
2. अकाउंट आधारित या टोकन आधारित : टोकन आधारित सीबीडीसी भी दो तरह के या तो रिटेल या होलसेल हो सकते हैं। जबकि खाता आधारित सीबीडीसी जनरल पर्पस के लिए हो सकता है।

किस तरह यह बदलाव ऐतिहासिक होगा?

पब्लिक-प्राइवेट सहभागिता के आधार पर सीबीडीसी के दो मॉडल हो सकते हैं:
1. डायरेक्ट - इस मॉडल के तहत केंद्रीय बैंक सीबीडीसी जारी करने से लेकर अंतिम उपयोगकर्ताओं तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने से संबंधित सभी पहलुओं के लिए व्यापक रूप से जिम्मेदार होगा।
2. इनडायरेक्ट: इसमें केंद्रीय बैंक एक कोर सिस्टम विकसित करता है और प्राइवेट प्लेयर्स को यूजर्स तक सीबीडीसी प्रणाली और अन्य मूल्य वर्धित सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है। दोनो हीं मॉडलों के तहत सीबीडीसी केंद्रीय बैंक की देनदारी होगी।

इस बात की संभावना ज्यादा है कि आरबीआई देश में आम जनता के लिए रिटेल सीबीडीसी की शुरुआत कर सकता है। यह आरबीआई के अपने मौजूदा ऑपरेशनल सिस्टम में एक तरह से ऐतिहासिक बदलाव/प्रस्थान होगा। क्योंकि मौजूदा सिस्टम में आरबीआई का अंतिम उपभोक्ताओं के साथ कोई सीधा संबंध नहीं है। डायरेक्ट/प्रत्यक्ष मॉडल के मामले में, आरबीआई सारी नई गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होगा, जिसके लिए बैंक के भीतर नई दक्षताओं की आवश्यकता होगी।

----------

सीबीडीसी के क्या होंगे 6 बड़े फायदे?

अभी सीबीडीसी जारी नहीं हुई है। इसलिए विभिन्न बैंकर्स और तकनीकीविदों के आकलन के आधार पर इसके ये फायदे गिनाए जा सकते हैं :

1. नकद पर निर्भरता घटेगी: डिजिटल करेंसी शुरू होने से कैश पर निर्भरता घटेगी और करेंसी छापने में होने वाले खर्च पर भी लगाम लगेगी। यूके और स्वीडन जैसे देशों के विपरीत, भारत में अभी भी नकदी का चलन ज्यादा है। भारत के 12 फीसदी की तुलना में स्वीडन और यूके में कैश इन सर्कुलेशन (नकदी का चलन) टू जीडीपी रेश्यो क्रमशः 2.3 फीसदी और 3.4 फीसदी है।

2. वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलेगा: अपनी विशाल जनसंख्या के कारण भारत में अभी भी 19 करोड़ ऐसे लोग हैं जिनके पास बैंक अकाउंट नहीं हैं। यह आंकड़ा 2017 तक का है। बीते तीन सालों में स्थिति में थोड़ा बहुत ही अंतर आया होगा। एक हद तक सीबीडीसी वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने का एक विकल्प हो सकता है।

3. डिजिटलीकरण को बढ़ावा मिलेगा : भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। डिजिटल करेंसी शुरू होने से भुगतान प्रणाली की दक्षता में सुधार के साथ-साथ इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और इनोवेशन को बढ़ावा मिल सकता है।

4. प्राइवेट डिजिटल करेंसी पर लगाम : अगर देश के ज्यादा लोग प्राइवेट डिजिटल करेंसी (जैसे बिटकॉइन) को अपनाते हैं तो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति और वित्तीय स्थिरता से संबंधित अपने कार्यों को क्रियान्वित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है जो अंतत: देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक होगा। केंद्रीय बैंक का मानना है कि सीबीडीसी प्राइवेट डिजिटल करेंसी पर लगाम लगाने में मददगार हो सकता है।

5. वित्तीय अपराध की रोकथाम हो सकेगी : सीबीडीसी वित्तीय अपराध मसलन मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी से निपटने के लिए देश की क्षमता में सुधार कर सकता है, क्योंकि सीबीडीसी सिस्टम से लेनदेन को ट्रैक करने और पहचान करने में आसानी हो सकती है।

6. सीमा-पार भुगतान प्रणाली में सुधार होगा: सीमा-पार भुगतान प्रणाली की दक्षता बढ़ाने में भी सीबीडीसी बड़ी भूमिका निभा सकता है। इस सिस्टम में विदेशी मुद्रा के लेन-देन के मामले में टाइम जोन अलग होने के बावजूद सेटलमेंट में कोई देरी नहीं होगी। यह अंतत: देश की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होगा।

- अविनाश शेखर, को-सीईओ, जेब-पे, अजीत कुमार, वित्त मामलों के विशेषज्ञ

खबरें और भी हैं...