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टॉकिंग पाइंट:रितिक रोशन : हर त्रासदी को जीत में बदलने वाला हीरो

भावना सोमाया15 दिन पहले
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बाल कलाकार के तौर पर अपनी पहली फिल्म 'भगवान दादा' (1986) में रजनीकांत के साथ रितिक रोशन।    - Dainik Bhaskar
बाल कलाकार के तौर पर अपनी पहली फिल्म 'भगवान दादा' (1986) में रजनीकांत के साथ रितिक रोशन।   

इस कोराना नामक महामारी ने हर किसी को मानवीय और रचनात्मक बना दिया है। रचनात्मकता के मामले में आरफीन खान का आइडिया तो अद्भुत रहा। उन्होंने 30 फीट की ऊंचाई पर छत से लटकते स्टूडियो में 12 फीट ऊंची प्रोजेक्शन स्क्रीन लगाई जो 60 फीट तक फैल सकती थी। इस तरह 360 डिग्री पर घूमती हुई ऐसी स्क्रीन बन गई जिस पर लोग वर्चुअल एक्सपीरियंस ले सकते थे। इसके लिए सैकड़ों कम्यूटर्स-लैपटॉप्स और अल्ट्रा हाई स्पीड वाले इंटरनेट की मदद ली गई। दुनिया भर से हजारों लोग एक साथ जुड़े। और यह जादू इसलिए भी संभव हो सका क्योंकि इसके साथ जुड़ा था एक बहुत बड़ा ब्रांड - रितिक रोशन, जो कहते हैं, ‘अगर आपका खुद पर भरोसा है तो आप हर बाधा को पार कर सकते हैं।’

रितिक रोशन की जिंदगी पर यह बात पूरी तरह से लागू होती है। उन्हें बचपन से ही कई त्रासदियों का सामना करना पड़ा लेकिन मन में दृढ़ विश्वास के बूते वे हर त्रासदी को जीत में बदल सके। वे अपने दाहिने हाथ में दो अंगूठे के साथ पैदा हुए थे। जब चार साल की उम्र में वे पहली बार कक्षा में गए तो साथी बच्चों ने उनका मजाक उड़ाया। थोड़ी और बड़ी कक्षाओं में जाने पर उनके लिए इसको लेकर की जाने वाली छींटाकशी सहनशक्ति से बाहर होने लगी तो वे एकांत में रहने लगे। लेकिन अलग-थलग रहने के कारण वे हकलाने लगे और परिवार इसको लेकर काफी परेशान हो गया।

12 साल की उम्र में उनके दादा जे. ओमप्रकाश ने ‘भगवान दादा’ फिल्म में उन्हें एक कैमियो करने को कहा। इसमें बोलने का दृश्य था। लेकिन रितिक ने इतनी आसानी से अपने डायलॉग्स बोल दिए कि सभी आश्चर्यचकित रह गए। इस घटना से उन्हें दो बातें महसूस हुईं। एक, दृढ़ निश्चय से वे हर काम कर सकते हैं। और दूसरा, बड़े होकर वे भी अपने पिता की तरह एक सफल अभिनेता बन सकते हैं।

जब वे युवा ही थे, उस दौरान उन्हें एक और बीमारी स्कोलियोसिस ने जकड़ लिया जिसमें उनके शरीर के सभी मूवमेंट कम हो गए। लेकिन रितिक ने जल्दी ही दर्द के साथ अपनी दिनचर्या शुरू कर दी। एक दिन वे समुद्र तट पर धीरे-धीरे दौड़ रहे थे कि उसी समय बारिश होने लगी। बारिश से बचने के लिए वे तेजी से दौड़ लगाने लगे। उसी समय उन्होंने महसूस किया कि उनके शरीर का सारा दर्द अचानक से गायब हो गया। रितिक जानते थे कि अब वे अपनी पहली फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ के लिए तैयार हैं।

जब व्यक्ति सितारा बन जाता है तो उससे कई तरह की उम्मीदें लगनी शुरू हो जाती हैं। जाने-अनजाने में वह कई तरह के दुस्साहस भी करने लगता है। जैसे ‘धूम 3’ में एक आकर्षक चोर बनने के लिए उन्होंने स्केट बोर्डिंग, स्नो बोर्डिंग और सैंड सर्फिंग का विशेष प्रशिक्षण लिया। ‘जोधा अकबर’ के लिए उन्होंने तलवारबाजी सीखने, उर्दू की जुबान में महारत हासिल करने और सूफ़ी नृत्य के लिए तीन अलग-अलग प्रशिक्षकों की सेवाएं लीं। भंसाली की ‘गुजारिश’ फिल्म के लिए उन्होंने लकवा के शिकार लोगों के साथ कई दिन बिताए ताकि वे ऐसे लोगों के दिलो-दिमाग में चल रहीं गुत्थियों को समझ सके। उनके सधे हुए अभिनय में भी इसका असर साफ नजर आया।

हालांकि कभी-कभार उनके इस दुस्साहस ने उन्हें संकट में भी डाल दिया। ‘कृष’ के एक्शन दृश्यों के लिए वे प्रशिक्षण लेने के वास्ते चीन गए और वहां उनके पैर में गंभीर चोट लग गई। लेकिन इसके बावजूद वे तब तक वहां से नहीं लौटे, जब तक कि उनका प्रशिक्षण पूरा नहीं हो गया। ‘बैंग बैंग’ की शूटिंग के दौरान थाईलैंड में तो उनके सिर पर इतनी गहरी चोट लगी कि उनकी तत्काल ब्रेन सर्जरी करनी पड़ी। इस वजह से उन्हें काफी समय फिल्मों से दूर भी रहना पड़ा।

मैंने यहां उनकी ये सब कहानियां इसलिए बताई हैं कि अगली बार आप जब भी उन्हें परदे पर देखें तो केवल यह न सोचें कि कितने भाग्यशाली हैं ये। बल्कि यह जानें कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कितने ही मोर्चे मुस्कराते हुए फतेह कर लिए। हैप्पी बर्थ डे रितिक। आप कई लोगों के लिए प्रेरणा हों।

(भावना सोमाया जानी-मानी फिल्म लेखिका, समीक्षक और इतिहासकार हैं।)

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