ग्रेट स्पीच ऑफ द वर्ल्ड:'मेरा एक सपना है' मार्टिन लूथर किंग जूनियर का ऐतिहासिक भाषण

एक वर्ष पहले
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  • मार्टिन लूथर किंग जूनियर का यह भाषण अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन का अहम लम्हा रहा

हमारे देश के इतिहास में यह मार्च आज़ादी के लिए किए गए अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शन के तौर पर शामिल होगा और इस अवसर पर मैं आपसे साथ शामिल होकर खुश हूं।

लगभग सौ साल पहले एक महान अमरिकी (अब्राहम लिंकन) ने आज़ादी के एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे।इस खास हस्ताक्षर ने अन्याय की आग में झुलस रहे लाखों की तादाद वाली गुलाम नीग्रो आबादी के मन में आशा की रोशनी जलाई थी। ये वैसा ही था जैसे लंबी रात के बाद सुबह के उजाले की रोशनी फैलती है। लेकिन आज सौ साल बाद भी नीग्रो आज़ाद नहीं हैं। सौ साल बीत जाने के पश्चात भी नीग्रो आबादी भेद-भाव की बेड़ियों में जकड़ी हुई है और अलग-थलग है। आज सौ साल बाद भी नीग्रो आबादी, समृद्धि के विशाल दरिया के बीच गरीबी के टापू पर फंसी हुई है। सौ साल बाद भी नीग्रो आबादी को अमेरिकी समाज में हाशिए पर अटका रखा है। नीग्रो अपने ही देश में निर्वासित पाता है और इसलिए ही हम सभी आज यहां इस शर्मनाक स्थिति को दुनिया के सामने पेश करने के लिए जमा हैं।

देखा जाए तो हम अपने देश की राजधानी में एक चेक को कैश कराने आए हैं। जब हमारे गणतंत्र के आर्किटेक्ट, संविधान और आज़ादी का घोषणापत्र को शब्दों में ढाल रहे थे तो उन्होंने एक वचन-पत्र पर दस्तखत भी किए थे, जिसका वारिस हर अमेरिकी था। ये एक वादा था कि यहां सभी लोग जिंदा रहने, आज़ाद और खुश रहने के बराबर हकदार होंगे फिर वो काले हों या गोरे। आज यह तय है कि अमेरिका अपने अश्वेत देशवासियों से यह वादा निभा नहीं पा रहा है। इस बड़ी ज़िम्मेदारी को निभाने के बजाए इस देश ने नीग्रो आबादी को एक ऐसा चेक नवाजा, जो हमारी कौम को 'अपर्याप्त फंड्स' लिखकर लौटा दिया गया है। लेकिन हम यह नहीं मानते हैं कि इंसाफ का बैंक अब दिवालिया है। हम यह भी नहीं मानते हैं कि इस देश में अवसरों का खज़ाना खर्च हो चुका है। इसीलिए ही हम इस चेक को कैश कराने यहां जमा हुए हैं। यही चेक हमें आजादी और न्याय की सुरक्षा दिलाएगा।

हम अमेरिका को इस मौके की नज़ाकत से रूबरू कराने के लिए जमा हुए हैं। हम यहां आए हैं ताकि बता सकें कि शांत रहकर सही वक्त का इंतज़ार करने की सहूलियत अब हमारे पास नहीं है। यह प्रजातंत्र से सच्चे वादे करने का वक्त है। ये वक़्त है अंधेरे और अन्याय के रास्तों से निकलकर नस्लीय न्याय की उजली जमीं पर पांव रखने का। ये वक़्त है अपने देश को नस्लीय अन्याय के कीचड़ से निकाल कर सद्भाव की चट्टान पर पहुंचाने का। ये वक़्त है नस्लीय न्याय को सभी के लिए एक सच्चाई बनाने का।

आज के लम्हे को अनदेखा करना हमारे देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। नीग्रो आबादी के असंतोष की गर्माहट तब तक समाप्त नहीं होगी जब तक आज़ादी और समानता का बसंत नहीं आ जाता। 1963 कोई अंत नहीं बल्कि एक शुरुआत है। जिन्हें उम्मीद है कि नीग्रो अपना क्रोध दिखाकर फिर शांत हो जाएंगे और यह देश फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा, उन्हें अब जागना होगा। अमेरिका में तब तक शांति नहीं स्थापित होगी जब तक नीग्रो आबादी को नागरिक अधिकार नहीं मिल जाते। विद्रोही हवाएं तब तक हमारे देश की नींव हिलाती रहेंगी जब तक न्याय का उजला दिन नहीं निकल आता

मैं न्याय के महल की दहलीज़ पर खड़े अपने लोगों से कुछ कहना जरूर चाहूंगा। अपना हक पाने की कोशिश में हमें कोई गलत काम करने का दोषी नहीं साबित होना है। हमें नफरत और कड़वाहट के प्याले से अपनी आज़ादी की प्यास नहीं बुझाना है। हमें यह संघर्ष हमेशा ही अनुशासन और मर्यादा में रहकर पूरा करना है। हमें अपने रचनात्मक विरोध को किसी भी सूरत में हिंसा का रूप नहीं देना है। हमें खुद को इतना ऊपर उठाना है कि हिंसा का सामना आत्मिक शक्ति से हो जाए।

नीग्रो आबादी में पनपे उग्रवाद को हमें श्वेत लोगों में अविश्वास की वजह नहीं बनने देना है। इसकी वजह यह है कि हमारे कई श्वेत भाई इस बात को समझ रहे हैं कि उनका भविष्य भी हमारी किस्मत से जुड़ा हुआ है और इसीलिए वो आज यहां इस मार्च में मौजूद भी हैं। वो भी इस बात को जान रहे हैं कि उनकी और हमारी स्वतंत्रता पूरी तरह से एक दूसरे से जुड़ी हुई है और कोई अकेला नहीं चल सकता। हम इस बात का प्रण करें कि हमेशा आगे ही बढ़ेंगे, कभी पीछे नहीं हटेंगे।

कुछ लोग हमसे पूछ रहे हैं “आखिर तुम कब संतुष्ट होगे?” उन्हें हम बता दें कि हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक कोई नीग्रो, पुलिस की दहशत और बर्बरता का शिकार होता रहेगा। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे, जब तक किसी सफर की थकान से चूर होने के बावजूद हमें हाइवे और शहरों के होटलों प्रवेश देने से रोका जाएगा। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हर नीग्रो, एक छोटी बस्ती की गंदगी से निकलकर बढ़िया माहौल हासिल नहीं कर लेता। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक 'केवल गोरों के लिए' के बोर्ड लगाकर नीचा दिखाना और गरिमा को ठेस पहुंचाना बंद नहीं होगा। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक मिसीसिपी में रहने वाले हर नीग्रो को वोट देने का अधिकार नहीं मिल जाता। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक न्यूयॉर्क में रहने वाले नीग्रो को वोट करने के लिए पर्याप्त विकल्प नहीं मिल जाते। हम संतुष्ट नहीं हैं और हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक पानी की तरह न्याय और तेज नदी की तरह सच्चाई बहने नहीं लगती।

मैं जानता हूं कि आप से कुछ लोग बहुत सारी तकलीफें झेलकर यहां तक आए हैं। कुछ तो अभी-अभी जेल की छोटी कोठरियों से निकल कर आए हैं। कुछ ऐसी जगहों से आए हैं, जहां उन्हें आज़ादी के लिए अत्याचार सहना पड़े, यहां तक कि पुलिस बर्बरता के आगे झुकना पड़ा। आप रचनात्मक प्रतिरोध के सिपाही हैं, आपने तकलीफ और दुख को खूब देखा है। इस भरोसे के साथ अपना काम करते रहिए कि आपको इस तकलीफ का फल जरूर हासिल होगा।

मिसीसिपी वापस जाओ, अलबामा वापस जाओ, साउथ कैरोलाइना वापस जाओ, जॉर्जिया वापस जाओ, लुसियाना वापस जाओ, उत्तरी शहरों की झोपड़पट्टियों और गंदी बस्तियों में वापस जाओ – ये जानते हुए कि हर हाल में ये हालात बदलेंगे और इन्हें बदलना ही होगा।

अब हमें निराशा की गर्त में नहीं रहना है। मैं कहना चाहता हूं कि आज और कल की कठिनाइयों से घिरे होते हुए भी मेरा सपना कायम है। ये सपना ‘अमेरिकन ड्रीम’ से गहराई तक जुड़ा हुआ है। मेरा सपना है कि एक दिन इस देश का उदय होगा और यह सही मायनों में अपने सिद्धांत को अपनाएगा जो है ''हम इस सत्य को स्वत: प्रमाणित समझते हैं कि सभी इंसान बराबरी के साथ धरती पर भेजा गया है''।

मेरा सपना है कि एक दिन जॉर्जिया की लाल पहाड़ियों पर बरसों तक गुलामी करने वालों के बच्चे और मालिकों के बच्चे मिल-जुलकर एक साथ बैठ सकेंगे।

मेरा सपना है कि अन्याय और अत्याचार की आग में जल रहा मिसीसिपी राज्य, आज़ादी और न्याय की हरियाली में रंगा नजर आएगा।

मेरा सपना है कि एक दिन मेरे चारों बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उन्हें चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र पहचाना जाएगा।

आज मेरा एक सपना है !

मेरा सपना है कि उस अलबामा में, जहां क्रूर नस्लवादी हैं, अश्वेत लड़के-लड़कियां और श्वेत लड़के-लड़कियां भाई-बहन की तरह हाथ से हाथ मिलाकर साथ रहेंगे।

आज मेरा एक सपना है !

मेरा सपना है कि एक दिन हर घाटी को पाट दिया जाएगा, हर पहाड़ समतल कर दिया जाएगा और जटिल बीहड़ सपाट हो जाएंगे। तब ईश्वर की कृपा बरसेगी और इसे सभी इंसान महसूस करेंगे।

यही हमारी आशा है और इसी यकीन के साथ मैं दक्षिण वापस जाऊंगा। इसी भरोसे के साथ कि हम निराशा के पर्वत को तराशएंगे और उम्मीद के पत्थर निकाल पाएंगे। इसी विश्वास के साथ कि हम उत्पात के शोर को भाईचारे की सिम्फनी में तब्दील कर पाएंगे। इसी यीकन के साथ कि हम एक साथ काम कर सकेंगे, पूजा कर सकेंगे, साथ संघर्ष कर पाएंगे, साथ जेल जा पाएंगे, आजादी के लिए साथ खड़े हो पाएंगे, ये जानते हुए कि हम एक दिन आज़ाद होंगे।

यदि अमेरिका को महान देश बनना है, इसे सच होना ही होगा। और इसके लिए न्यू हैम्पशायर की ऊंचाइयों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। न्यू यॉर्क के भव्य पर्वतों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। पेंसिलवेनिया की अलेगेनीज़ की ऊंचाइयों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। बर्फ में छुपी कोलोराडो की चट्टानों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। कैलिफोर्निया की घुमावदार ढलानों से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए।

सिर्फ यही नहीं, जॉर्जिया के स्टोन माउंटेन से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। टेनेसी के लुकआउट माउंटेन से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। मिसीसिपी की हर पहाड़ी से आज़ादी का संगीत बजना चाहिए। जब ऐसा होगा, जब हम हर गांव, हर बस्ती, हर राज्य और हर शहर से आज़ादी का संगीत बजने देंगे, तब हम उस दिन तक पहुंच सकेंगे जब ईश्वर के सभी बच्चे – श्वेत और अश्वेत, यहूदी और गैर-यहूदी, प्रोटेस्टेंट और कैथलिक – सभी हाथ से हाथ मिलाकर नीग्रो समुदाय का आध्यात्मिक गाना गा सकेंगे :

आखिर हम आज़ाद हैं, आखिर हम आज़ाद हैं ! शुक्रिया मेरे ईश्वर, आखिर हम आज़ाद हैं !

(28 अगस्त 1963 को वॉशिंगटन डीसी के 'द लिंकन मेमोरिअल' पर मार्टिन लूथर किंग जूनियर)

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