रसरंग में चिंतन:टिके रहना चाहते हैं तो अंदर से मज़बूत होना ज़रूरी

गुणवंत शाह15 दिन पहले
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तस्वीर प्रतीकात्मक। - Dainik Bhaskar
तस्वीर प्रतीकात्मक।

मानवजाति के इतिहास में श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण शोध आखिर क्या हो सकती है? सबसे महान शोध यानी लोकतंत्र की शोध। दूसरी महत्वपूर्ण शोध है मानवतावादी सेक्युलरिज्म। तीसरी है मानव अधिकार की रक्षा के लिए तैयार संरचना। यदि धर्मशास्त्र की तमाम पुस्तकें नष्ट भी हो जाएं, फिर भी उपरोक्त तीनों शोध को आंच तक नहीं आएगी। सच तो यह है कि अगर मानवता बच जाती है, तो धर्म बच जाता है। मानवता की मौत के बाद धर्म का भी कोई अस्तित्व ही नहीं रहता।

हिटलर और माओ जेडोंग जैसों ने मानवता को ही नष्ट करने वाले अपराध किए थे। आज भी नक्सलवादी माओवाद को अपना आदर्श मानते हैं और निर्दोष लोगों का कत्ल करते हैं। इंसानों का खून भी वे आदर्श के नाम पर करते हैं। क्या इन लोगों के देशद्रोह को भी आदर्शवाद माना जाए?

हाल ही में एक किताब पढ़ी, जिसके लेखक सैन्य एक अधिकारी रह चुके हैं। इस किताब में कई तथ्यों को प्रमाण समेत उजागर किया गया है, जिसे पढ़कर हमारी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। एक तरह से यह किताब हमारी आंखें खोलने वाली है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग सदैव आलोचना ही करते रहते हैं। लोकतंत्र में पूर्वग्रहों को पालने की प्रवृत्ति की खुली छूट है। लेकिन सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जा सकता। सच्चाई सत्य की सगी बहन है। सच्चाई पवित्र है और सत्य अतिपवित्र। झूठे मनुष्य का पूर्वाग्रह भी आदर्शवाद में खप जाता है। पुस्तक के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं।

छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के 75 जवानों की नृशंस हत्याओं के बाद एक वर्ग बहुत ही ज्यादा खुश था। इस वर्ग के लोगों ने रात भर जश्न मनाया। वे खूब नाचे। इन्होंने भारतीय जवानों को अनाचारी निरुपित किया। इन्हें चीन-पाकिस्तान से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष मदद मिलती है। जेहाद और माओवाद के मिश्रण से जन्मा यह आदर्शवाद उन्हें प्यारा लगता है। पार्टी पूरी रात चली। इसी तरह 5 सितम्बर 2010, शिक्षक दिवस पर नक्सलियों ने एक प्राथमिक शाला में मासूमों के सामने एक शिक्षक का गला काट दिया। उन्हें सूचना मिली थी कि यह शिक्षक उनके खिलाफ मुखबिरी करता है। उस दिन से वह स्कूल आज तक बंद है। ऐसे आतंक के कारण आसपास की अन्य शालाएं भी बंद हैं। हत्या का कारण क्या था?

इस किताब के लेखक से दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने कहा था कि इस इलाके में माओवादियों द्वारा राजीव गांधी सरकार द्वारा खड़े किए गए बिजली के खंभों को धराशायी कर दिया गया। राजीव गांधी सरकार की विद्युतीकरण योजना के तहत जंगली इलाकों में बिजली पहुंचाने की कोशिश की थी।

इस किताब की प्रस्तावना बहुत ही सधे तरीके से लिखी गई है। उस प्रस्तावना का सार कुछ इस तरह से है कि सोवियत यूनियन टूटकर बिखर गया, उसका पतन हो गया। इससे हम सभी को यही सबक मिलता है कि कोई भी देश बाहर से चाहे कितना भी मजबूत हो, पर यदि वह अंदर से मजबूत नहीं है, तो फिर भी वह एक देश की तरह टिककर नहीं रह सकता। वास्तव में अंदर की ताकत ही बाहर की शक्ति का पोषण करती है। सोवियत संघ आदर्श और मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर पड़ चुका था।

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