रसरंग में धुनों की यात्रा:कल्याणजी-आनंदजी : 'हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे'

पंकज राग6 दिन पहले
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कुर्बानी का सुपरहिट गीत 'हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे' को भी कम्पोज कल्याण-आनंदजी ने ही किया था। - Dainik Bhaskar
कुर्बानी का सुपरहिट गीत 'हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे' को भी कम्पोज कल्याण-आनंदजी ने ही किया था।

अभिनेता फ़िरोज़ खान की छवि एक ग्लैमरस, आधुनिक, रूमानी और कुछ-कुछ ही-मैन वाली रही है। वर्षों फ़िल्मों में नायक और सहनायक की भूमिका करने के बाद वे 1972 से निर्माता-निर्देशक भी बन गए और इस हैसियत से एफ़. के. इंटरनेशनल के बैनर तले पहली फ़िल्म थी 'अपराध' (1972)। निर्माता-निर्देशक की हैसियत से उनकी कई फ़िल्मों में संगीतकार के रूप में कल्याणजी-आनंदजी रहे। सम्भवतः उन्होंने यह चुनाव इसलिए किया क्योंकि पूर्व में 'सफ़र' के 'जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे' (मुकेश) और 'उपासना' के 'दर्पण को देखा तूने जब जब किया सिंगार' (मुकेश) जैसे उन पर फ़िल्माए बेहद लोकप्रिय गीतों के रचयिता कल्याणजी-आनंदजी ही रहे थे। मुकेश की आवाज़ भी उनकी छवि पर बहुत माकूल ठहरती थी, पर 'अपराध' के गीतों में मुकेश कहीं नहीं थे। शायद यह गीतों की प्रकृति के कारण हो जिनके साथ मुकेश का अंदाज़ मेल नहीं खाता था। आज हम फ़िरोज़ खान की निर्मित/निर्देशित कुछ ऐसी फ़िल्मों के संगीत की चर्चा करेंगे जिनके संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी रहे थे, क्योंकि इन फ़िल्मों में फ़िरोज़ और कल्याणजी-आनंदजी संगीत का एक नया मुहावरा लेकर आए थे।

'अपराध' के संगीत में कल्याणजी-आनंदजी आधुनिकता की एक नई बयार लेकर आए। आॅर्केस्टेशन में इलेक्ट्रोनिक वाद्ययंत्र तो थे ही, मेलोडी भी एक नए रंग में आई जो फ़िरोज़ खान की आधुनिक रूमानी छवि के अनुरूप थी। 'तुम मिले प्यार से मुझे जीना गवारा हुआ' (आशा, किशोर) की मेलोडी के पीछे एक लहराती आकर्षक रवानगी थी। यह भी रोचक तथ्य है कि यह गीत फ़िरोज़ खान और मुमताज़ पर फ़िल्माया गया था और सालों बाद फ़िरोज़ खान के बेटे फ़रदीन की शादी मुमताज़ की बेटी नताशा से ही हुई। 'अपराध' फ़िल्मांकन की दृष्टि से भी अलग हटकर थी। फ़िल्म के मोटर रेसिंग दृश्य का फ़िल्मांकन जर्मनी में हुआ था।

'अपराध' का दूसरा बहुत मशहूर गीत 'हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने हैं' (लता, किशोर) भी बेलौस रवानगी भरा गीत था जिसमें राग पीलू को एक नए ढंग से पेश किया गया था। 'तुम हो हसीन वफ़ा तुमको आते आते आएगी' (किशोर कुमार) एक लोकप्रिय सुंदर रूमानी सा गीत था। 'ऐ नौजवां है सब कुछ यहां'(आशा भोंसले) एक नशीला सा गीत था जिसमें आधुनिक आॅर्केस्ट्रेशन के साथ सितार और गिटार का इंटरल्यूड्स में बहुत प्रभावी उपयोग कल्याणजी-आनंदजी ने किया। फ़िरोज़ खान का अरबी शैली के गीतों के प्रति आग्रह हमें गीत 'अस्सलाम अलाएकुम' (महेन्द्र कपूर, आशा) में मिलता है।

फ़िरोज़ खान निर्मित 'धर्मात्मा' (1975) संगीत की दृष्टि से एक कदम आगे ही थी। फ़िरोज़ खान ख़ुद भी अफ़गान पश्तून परिवार से आते थे और 'धर्मात्मा' पहली बाॅलीवुड फ़िल्म थी जिसकी शूटिंग अफ़गानिस्तान में हुई थी और फ़िल्म के सिनेमेटोग्राफ़र कमल बोस को इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला था। कुछ हद तक अंग्रेजी फ़िल्म 'द गॉडफ़ादर' से प्रेरित यह फ़िल्म प्रेमनाथ के अभिनय के लिए भी याद की जाती है और कल्याणजी-आनंदजी के दिलकश संगीत के लिए भी। इस बार फ़िरोज़ खान के पार्श्वगायन के लिए मुकेश थे और नई गायिका कंचन के साथ इंदीवर लिखित 'क्या खूब लगती हो बड़ी संुदर दिखती हो' और वर्मा मलिक लिखित 'तुमने किसी से कभी प्यार किया है' अपनी दिलकश धुनों और गतिशील आॅर्केस्ट्रेशन के कारण सदाबहार बने हुए हैं। यह आश्चर्य है कि 1975 की वार्षिक गीतमाला के प्रथम 32 पायदानों में ये गीत नहीं आए जबकि गुणवत्ता की दृष्टि से इनसे कमतर 'तेरे चेहरे में वो जादू है बिन डोर खिंचा जाता हूं' (किशोर कुमार) 31वां स्थान प्राप्त कर गया। इसी फ़िल्म में महेंद्र कपूर, लता के स्वर में एक बार पुनः अरबी आॅर्केस्ट्रेशन और शैली का गीत था 'मेरी गलियों से लोगों की यारी'।

'कुर्बानी' (1980) का संगीत तो धूम मचा गया। 'आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आए तो बात बन जाए' की बेहद नवीन और आधुनिक भंगिमा तो नाज़िया हसन के स्वर में गली-गली गूंजी और डिस्को को फ़िल्मों में स्थापित किया। दरअसल फ़िरोज़ खान नाज़िया हसन की गायिकी से लंदन की एक महफ़िल में प्रभावित हुए थे। रोचक तथ्य यह भी है कि इस गीत के संगीतकार के रूप में उन्होंने कई लोगों के विरोध के बावजूद अंतरराष्ट्रीय पहचान के संगीतकार बिद्दू को चुना। सालाना बिनाका गीतमाला के चौथे पायदान पर आए इस गीत पर नाज़िया हसन को सर्वश्रेष्ठ महिला गायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिला। इस गीत को छोड़कर शेष सभी गीत कल्याणजी-आनंदजी ने कम्पोज़ किए । बेहद लोकप्रिय रहा इंदीवर लिखित 'लैला ओ लैला' (कंचन, अमित कुमार) जिसमें फ़िरोज़ खान की पसंदीदा अरबी शैली को कल्याणजी-आनंदजी ने एक विशिष्ट अर्वाचीन से आॅर्केस्ट्रेशन में पिरोया था। कल्याणजी अपनी कई फ़िल्मों में मुकेश के गले और शैली का ध्यान रखकर एकाध गीत कम्पोज़ करते रहे थे और 'कुर्बानी' में भी उन्होंने अहीर भैरव व भैरवी की छाया लिए ऐसा ही एक बेहद दिलकश और लोकप्रिय गीत बनाया था - 'हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे, मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे'। पर अब मुकेश तो जीवित नहीं थे, इसलिए आनंद कुमार और कंचन के साथ गीत में मुकेश से मिलती आवाज़ वाले मनहर को लिया गया। फ़िल्मी कव्वाली की शक्ल में 'कुर्बानी कुर्बानी' (किशोर, अनवर, अजीज़, नाज़ां) और रूमानी शैली का दोगाना 'क्या देखते हो सूरत तुम्हारी' (आशा, रफ़ी) फ़िल्म के अन्य लोकप्रिय गीत थे। 'कुर्बानी' के रेकाॅर्डों की बिक्री ने उस ज़माने के सभी कीर्तिमान तोड़ दिए थे।

'जांबाज़' (1986) के आते-आते हिंदी फ़िल्म संगीत का परिदृश्य बदल गया था। राॅक, डिस्को और पंक राॅक का ज़माना था, आॅर्केस्ट्रेशन भारी-भरकम होता जा रहा था और मेलोडी कमतर होती जा रहा थी। कल्याणजी-आनंदजी को भी ज़माने के साथ संगीत देना था, पर फिर भी वे गीतों में मेलोडी का काफ़ी अंश कायम रखने में सफल रहे। सपना मुखर्जी तथा महेश गधवी के गाए पंजाबी लोकरंग की मेलोडी 'जब जब तेरी सूरत देखूं प्यार सा दिल में जागे' और 'प्यार दो प्यार लो' (सपना मुखर्जी) की अरबी शैली की धुन और आॅर्केस्टेªशन का आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुतीकरण लोकप्रिय रहे। फ़िल्म का सबसे हिट और खूबसूरत गीत रहा था श्रीदेवी और फ़िरोज़ खान पर फ़िल्माया 'हर किसी को नहीं मिलता यहां प्यार ज़िंदगी में' (मनहर/साधना सरगम)। हालांकि आॅर्केस्टेªशन में हेवी मेटल था पर गाने की धुन विशुद्ध मेलोडी है और लगता है कि यह गीत भी मुकेश के गले को ध्यान में रखकर कम्पोज़ किया गया था। मिरियम स्टाॅकली का गाया 'गिव मी लव' तो पूर्णतः अंग्रेजी गीत था तो 'तेरा साथ है कितना प्यारा' (किशोर कुमार, सपना मुखर्जी) तो पुनः कल्याणजी-आनंदजी की चिरपरिचित मेलोडी को वापस लेकर आती थी और 'अल्लाह हो अकबर' (महेश गधवी) सूफ़ियाना इबादती गीत था।

कल्याणजी आनंदजी के साथ फ़िरोज़ खान का वास्ता 'जांबाज़' तक ही रहा। यह जरूर है कि कल्याणजी-आनंदजी (जो नए गायक गायिकाओं को मौका देने में हमेशा से अग्रणी रहे थे) ने फ़िरोज़ खान द्वारा निर्मित फ़िल्मों में भी कंचन, साधना सरगम, महेश गधवी, नीतू, आनंद कुमार सी. जैसे नए और मनहर जैसे उपेक्षित कलाकारों को भी भरपूर मौका दिया।

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