रसरंग में पाकिस्तान डायरी:संचार क्रांति से कई अनजाने सच उजागर!

ज़ाहिदा हिना17 दिन पहले
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संचार क्रांति से पाकिस्तान के भी गांव-गांव में मोबाइल पहुंच गए हैं। (फोटो साभार : यूनिसेफ पाकिस्तान) - Dainik Bhaskar
संचार क्रांति से पाकिस्तान के भी गांव-गांव में मोबाइल पहुंच गए हैं। (फोटो साभार : यूनिसेफ पाकिस्तान)

ज़बान से लोगों को ज़ख़्म पहले भी पहुंचाए जाते थे, गालियां तो वुजूद में ही इसलिए आईं कि अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को ज़लील किया जा सकें। पिछले 30 सालों में तकनीक ने दूरसंचार के माध्यमों में बहुत बदलाव पैदा कर दिया है। देखा जाए तो एक तरह का इंक़लाब बरपा कर दिया है। अब से कुछ सालों पहले तक तार वाला टेलीफोन भी घर पर लगवाना बहुत मुश्किल काम हुआ करता था। आला अफसरों तक जिनकी पहुंच हुआ करती थी, उनके घरों तक टेलीफोन आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। बाक़ी लोग इस नेमत से महरुम रहा करते थे। टेलीफोन लग भी जाते थे तो एक शहर से दूसरे शहर या एक मुल्क से दूसरे मुल्क बात करना भी बहुत मुश्किल काम था। ट्रंक कॉल बुक करने के बाद भी घंटों इंतज़ार करना पड़ता था, तब कहीं जाकर कुछ मिनट बात करना मुमकिन हो पाता था।

पत्रों के आदान-प्रदान का मामला भी ऐसा ही था। ख़त भेजने और जवाब आने में सप्ताह या महीने भर का वक़्त लग जाया करता था। तार आना अक्सर ख़तरे का प्रतीक माना जाता था, क्योंकि इसका उपयोग अमूमन किसी बड़े हादसे की सूचना भेजने के लिए किया जाता था। जब तक यह मामला था, तब तक बड़े पैमाने पर अपमान या उपहास के लिए भाषा का उपयोग करना व्यावहारिक रूप से थोड़ा मुश्किल था। लेकिन अब मामला पूरी तरह से बदल गया है। लगभग हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल फोन आ गया है। अब जब भी चाहें, किसी से बात कर सकते हैं।

कोई भी दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाला हो, किसी को भी संदेश भेज सकता है। तस्वीरें और वीडियोज़ भी हज़ारों लोगों तक एकसाथ साझा किए जा सकते हैं। 21वीं सदी में लोगों को यह एक असाधारण सुविधा मिल गई है, लेकिन इसमें जिस भाषा का प्रयोग किया जा रहा है और उसके द्वारा जिस तरह का चरित्र दिखाया जा रहा है, वो बेहद अफसोसनाक है। यह अस्थाई भी हो सकता है और हो सकता है कि समय के साथ यह संतुलित हो जाए या फिर इसे सामान्य बात मानकर स्वीकार कर लिया जाए। एक और बात यह भी है कि संचार क्रांति के माध्यम से वो सच भी सामने आ रहे हैं, जो कि पहले बहुत कम ही लोग जानते थे।

प्राचीन अतीत से लेकर 21वीं सदी के वर्तमान दशक तक शब्द या भाषा हर ज़ुल्म के ख़िलाफ एक असरदार हथियार के तौर पर काम करती रही है। इसकी एक बिल्कुल सामने की मिसाल सुकरात हैं। उनके विचाराें और उपदेशों से छुटकारा पाने के लिए एथेंस की शहरी रियासत ने उन्हें ज़हर का प्याला पिलाकर यह मान लिया कि उन लोगों ने उनकी ज़बान काे ख़ामोश कर दिया है, लेकिन आज ढाई हज़ार साल बाद भी उनके विचार तमाम छोटी और बड़ी भाषाओं में मौजूद हैं। उनके सच्चे अलफाज़ों की फसलें हर देश और हर युग में लहलहाती रही हैं और इस बात को साबित करती रही हैं कि दुनिया में दिमाग़ों को क़ाबू करने के लिए भाषा से बड़ा असरदार कोई हथियार नहीं है। क़रीब लाख साल पहले जब हम जंगलों में समूहों में रहते थे, हमने बोलना शुरू किया था तो शायद पहले हम भी दूसरे जानवरों की तरह अजब सी आवाज़ें निकाला करते होंगे, लेकिन जैसे-जैसे हमारी ज़रूरतें बढ़ती चली गईं, तो हमने इन आवाज़ों को एक क्रम दिया होगा जिसके नतीजे में आज दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हज़ारों भाषाएं बोली जाती हैं।

हज़ारों सालों से क़ुदरत हमारे अस्तित्व में आते ही हमारे मन के हमारे दिमाग के अंदर हमारे कानों के ज़रिये भाषा का बीज बो देती है। यह बीज दो से तीन साल की उम्र तक आते-आते अपना पहला फूल खिला देता है और फिर उम्र, अनुभव और शिक्षा के साथ हमारी भाषा फलती-फूलती जाती है। युवावस्था के बाद जब हम समाज के वातावरण और उनसे बनने वाली परिस्थितियों में अपने विचार व्यक्त करते हैं तो भाषा केवल संचार का या अपने विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि यह एक हथियार का रूप ले चुकी होती है।

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