रसरंग में कवर स्टोरी:सोशल मीडिया के नए जोखिम

दिनेश पाठकएक महीने पहले
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तस्वीर प्रतीकात्मक है। - Dainik Bhaskar
तस्वीर प्रतीकात्मक है।
  • सोशल मीडिया की चर्चा अब फायदों से ज्यादा नुकसान के लिए होने लगी है। हाल ही में हुए कई अध्ययन बताते हैं कि शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टि से सोशल मीडिया एक आम व्यक्ति की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है। पूरे पहलू का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण :

हाल ही में 'जनरल ऑफ ग्लोबल इनफॉरमेशन मैनेजमेंट’ में प्रकाशित एक शोध से यह स्थापित हुआ है कि सोशल मीडिया न केवल मानसिक रूप से स्ट्रेस की वजह बन रहा है, बल्कि अब उसके शारीरिक दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। साल 2003 से लेकर 2018 के बीच सोशल मीडिया के संबंध में हुए 50 से अधिक शोध पत्रों का रिव्यू कर सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने के लगभग चार दर्जन नुकसान गिनाए हैं। इस शोध के अनुसार सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव को मुख्य रूप से 6 प्रकारों में बांटा जा सकता है। इनमें निजता की चिंता, सुरक्षा संबंधी खतरे, प्रदर्शन यानी परफॉर्मेंस में कमी, सामाजिक लेनदेन के नुकसान, परेशान करने वाला कंटेंट और साइबर बुलीइंग जैसे जोखिम शामिल हैं। इन दुष्प्रभावों में चिंता, अवसाद, उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाना भी शामिल है।

सोशल मीडिया : अवसाद का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म

प्यू रिसर्च की एक स्टडी के अनुसार सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल अवसाद की सबसे बड़ी वजह बन रहा है। कई मनोविशेषज्ञों की स्टडी के आधार पर तैयार रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार कई लोगों को सोशल मीडिया पर मौजूद अपने ही वर्ग के लोगों की तुलना करने मंे लगता है कि उनकी जिंदगी 'परफेक्ट' नहीं है। इससे ऐसे लोगों में एक खास किस्म की मानसिक बीमारी 'सोशल मीडिया एंग्जायटी डिसऑर्डर' पनपने लगती है जो जाने-अनजाने में उन्हें अवसाद की ओर ले जाती है।

मेटावर्स : और भी आभासी दुनिया की ओर कदम

हाल ही में फेसबुक ने अपना नाम बदलकर मेटाइंक कर दिया है। जकरबर्ग की योजना फेसबुक यूजर्स को मेटावर्स की उस आभासी दुनिया में ले जाने की है जहां होम, वर्क, प्ले एंड शॉप सभी कुछ आगे यानी नेक्स्ट जेनरेशन होगा। इस नई तकनीक में वर्चुअल रियलिटी और अन्य तकनीकों के मिश्रण से संवाद यानी एक दूसरे से बातचीत, एक अलग स्तर पर पहुंच जाएगी। आप यह मान सकते हैं कि इंटरनेट सजीव हो उठेगा और आप अपने आपको स्क्रीन के अंदर प्रवेश करता हुआ महसूस कर सकेंगे। मेटावर्स में आप वीडियो कॉल के जरिए घर, दफ्तर आदि में आभासी रूप से मौजूद रह सकेंगे। किसी नाटक, संगीत कंसर्ट या अन्य कार्यक्रम में सम्मिलित हो सकेंगे, किसी टूरिस्ट स्पॉट की ऑनलाइन सैर अपनी सुविधा अनुसार कर सकेंगे, कलाकृतियां देख सकेंगे और स्वयं बना भी सकेंगे। मॉल तथा शोरूम में आभासी तौर पर पहुंच कर कपड़े भी ट्राई करके खरीद पाएंगे। लेकिन इसका मतलब यह होगा कि हम जीवंत के बजाय और भी आभासी दुनिया में जीने लगेंगे। यानी आभासी दुनिया के और भी अधिक दुष्प्रभावों के साथ हमें जीना होगा।

कैसे हुई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की शुरुआत?

पहला प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिक्स डिग्रीज (Sixdegrees) था, जिसे न्यूयॉर्क में सन 1997 में लॉन्च किया गया था। एक समय इसके 35 लाख यूजर्स और सौ से ज्यादा कर्मचारी थे। इसके फाउंडर एंड्र्यू विनरिच थे। यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूजर्स को अपने दोस्तों और परिवार के लोगों को अपने साथ जोड़ने का मौका देता था। सिक्स डिग्रीज के बाद 2002 में फ्रेंडस्टर लॉन्च किया गया। इसी साल लिंक्डइन भी लॉन्च हुआ। फिर 2003 में माइस्पेस (MySpace) और साल 2004 में हाइ5 (Hi5) नाम से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शुरू हुए। वर्ष 2004 में फेसबुक की लॉन्चिंग ने हमारे जीवन को बदल दिया। दुनिया में फिलहाल इसके दो अरब 85 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं।

व्हाट्सऐप भारत में सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म

आंकड़ों के अनुसार करीब 54 करोड़ यूजर्स के साथ व्हाट्सएप भारत में सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। यूजर्स के मामले में यूट्यूब भारत में दूसरे और फेसबुक तीसरे स्थान पर है। भारत में यूट्यूब चलाने वाले यूजर्स की संख्या करीब 45 करोड़ है जबकि देश में 41 करोड़ यूजर्स फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। पिछले कुछ सालों में इंस्टाग्राम भारत में काफी तेजी से पॉपुलर हुआ है। इसके इंडिया में करीब 21 करोड़ यूजर्स हैं और वह देश में चौथा सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। यूजर्स के मामले में ट्विटर व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम से काफी पीछे है।

कैसे पहचानें कि हम सोशल मीडिया के आदी हो गए हैं?

साइकोलॉजिस्ट डॉ. विनय मिश्र कहते हैं कि हर व्यक्ति के लिए जिंदगी में अलग-अलग चीजें महत्वपूर्ण हो सकती हैं। किसी के लिए लेख लिखना, किसी के लिए कोई कलाकृति बनाना, किसी के लिए लेक्चर देना आदि महत्वपूर्ण हो सकता है। और हर व्यक्ति को यह पता होता है कि उसके लिए महत्वपूर्ण क्या है। ऐसे में अगर वह जानते-बुझते हुए भी सोशल मीडिया पर रहने के लिए अपनी इन महत्वपूर्ण चीजों को दरकिनार करता है या चाहकर भी वह सोशल मीडिया के फेर में इन चीजों पर ध्यान नहीं दे पाता है तो यह इस बात का संकेत है वह सोशल मीडिया का आदी हो चुका है।

डीएसएम में शामिल हो सकता है डिजिटल एडिक्शन :

डायग्नोस्टिक एंड स्टेटिस्टिकल मैन्युअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर (जिसे संक्षेप में डीएसएम) कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सैकड़ों विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया दस्तावेज है। इसे मनोवैज्ञानिकों की बाइबिल भी कहा जाता है। इसमें उन लक्षणों का विवरण डाला जाता है, जो मनोवैज्ञानिक और मानसिक विकारों या बीमारियों की ओर इशारा करते हैं। जैसे एंग्जायटी वाली बीमारियां या फोबिया वाली बीमारियां इसमें डाली गई हैं। जुआ भी एक मानसिक एडिक्शन है, इसे सबसे पहले डीएसएम ने ही इंगित किया था। यह हर आठ से दस साल में अपडेट होता है। इसमें नई बीमारियां जुड़ती जाती हैं, कुछ हट भी जाती हैं। इस बात की काफी संभावना है कि इसके अगले एडिशन में डिजिटल एडिक्शन को शामिल किया जा सकता है। यानी फिर इसका मनोवैज्ञानिक बीमारी के तौर पर ट्रीट किया जाएगा।

(लेखक सामाजिक विमर्शकार और वरिष्ठ लेखक हैं)

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