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रसरंग में धुनों की यात्रा:'जाने कहां गए वो दिन‘, राग शिवरंजनी आधारित इससे बेहतर कुछ नहीं

पंकज राग9 दिन पहले
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'जाने कहां गए वो दिन‘ गीत के एक दृश्य में राजकपूर। - Dainik Bhaskar
'जाने कहां गए वो दिन‘ गीत के एक दृश्य में राजकपूर।

शिव और रंजनी के युग्म से बने राग शिवरंजनी की उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि जब शिव अपना तांडव कर रहे थे, तो उन्हें शांत करने के लिए साधु-संतों ने यह राग गाया था। शास्त्रीय संगीत में यह राग शांत रस में दुख, विरह और गहरे प्रेम को प्रकट करता है तथा आत्मिक अनुभूति देने वाला माना जाता है। फ़िल्मों में शिवरंजनी का प्रयोग शंकर जयकिशन ने बहुत खूबसूरती से किया है। राज कपूर की फ़िल्म़ ‘आह‘ का तो पूरा पार्श्व साउंड ट्रैक ही शिवरंजनी में है तथा वर्षों बाद ‘मेरा नाम जोकर‘ में लिए गए गीत ‘जाने कहां गए वो दिन‘ की धुन हमें ‘आह‘ और ‘जिस देश में गंगा बहती है‘ दोनों के पार्श्व संगीत में मिलती है।

शिवरंजनी पर आधारित सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी गीत संभवतः ‘जाने कहां गए वो दिन‘ को ही माना जाएगा। मुकेश ने तो इस गीत में वायलिन के दर्दीले नोट्स के साथ मानों अपनी आत्मा ही उड़ेल दी है। अपने हर कंसर्ट में मुकेश इस गीत को अवश्य गाते थे। शिवरंजनी के प्रति शंकर जयकिशन का आग्रह तो उनकी पहली फ़िल्म ‘बरसात‘ (1949) के गीत ’प्रेम नगर में बसने वालों’ से ही शुरू हो गया था। राज कपूर की ही ‘संगम‘ (1964) का सिम्फ़नी शैली का युगल गीत ‘ओ मेरे सनम दो जिस्म मगर एक जान हैं हम‘ (लता, मुकेश), फिल्म ‘प्रोफ़ेसर‘ का ‘आवाज़ देकर हमें तुम बुलाओ‘ (लता, रफ़ी) में झप ताल के साथ और पियानो के खूबसूरत प्रयोग के साथ दादरा ताल में फ़िल्म ‘ब्रह्मचारी‘ का ‘दिल के झरोखे में तुझ को बिठाकर‘ राग शिवरंजनी में ही शंकर जयकिशन की अनमोल कृतियां हैं। ‘ब्रह्मचारी‘ के इस अनूठे सदाबहार गीत को बिना सांस रोके गाने की सलाह शम्मी कपूर ने दी थी और इस गीत के पियानो वादकों में स्वयं शंकर भी शामिल थे। इस गीत से बिल्कुल अलग थी फ़िल्म ‘सूरज‘ की 1966 के बिनाका गीतमाला में पहले पायदान पर आई लुभावनी शिवरंजनी ‘बहारो फूल बरसाओ‘।

भैरवी, यमन और पहाड़ी के मुकाबले हिन्दी फ़िल्म संगीत में शिवरंजनी आधारित कम ही गीत बने हैं। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने भी शिवरंजनी का इस्तेमाल अपने कुछ गीतों में किया। ‘संत ज्ञानेश्वर‘ का गीत ‘खबर मोरी ना लीनी रे बहुत दिन बीते‘ (लता), भावना प्रधान ‘अनजाना‘ (1969) का ‘रिमझिम के गीत सावन गाए हाय भीगी भीगी रातों में‘, कशिश भरा ‘प्यार झुकता नहीं‘ (1985) का लोकप्रिय गीत ‘तुमसे मिलकर न जाने क्यों और भी कुछ याद आता है‘ (शब्बीर कुमार) ऐसे उदाहरण हैं। शिवरंजनी जैसे संजीदा राग में भी ढोलक का अपना रिद्मिक प्रभाव लक्ष्मी-प्यारे ही दे सकते थे जैसा उन्होंने ‘वो दिन याद करो‘ के शीर्षक गीत ‘यार जिन्हें तुम भूल गए हो, वो दिन याद करो‘ (लता/रफ़ी) में बखूबी प्रदर्शित किया। शिवरंजनी में ऊंची पट्टी के गाने कम ही हैं, क्योंकि इस राग की मूल प्रवृत्ति से मध्यम नोट्स के गीत ही अधिक तादात्म्य स्थापित करते हैं परन्तु शिवरंजनी में ही लक्ष्मी-प्यारे ने ‘एक दूजे के लिए‘ (1981) फिल्म़ मंे इस परंपरा को तोड़ते हुए ‘तेरे मेरे बीच में कैसा है यह बंधन अनजाना‘ (लता, एम.पी. बालसुब्र्रमण्यम) जैसा अपेक्षाकृत ऊंची पट्टी का बेहद लोकप्रिय गीत सृजित किया।

शिवरंजनी का दर्द समेटे संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी बेहद कोमल सुरों और पियानो के साथ ‘कुंआरी‘ (1961) में ‘प्यार के पल छिन बीते हुए दिन, हम तो न भूले तुम भूल गए‘ (लता/तलत) में और ’पिया मिलन की आस’ (1961) के शीर्षक गीत में आए। पर मिश्र शिवरंजनी आधारित जिस गीत ने एस.एन. त्रिपाठी को आम जनता के बीच लोकप्रिय बनाकर सालाना बिनाका का चोटी का गीत बनाया, वह था ’जनम जनम के फेरे’ (1957) का ’ज़रा सामने तो आओ छलिये’ (लता, रफ़ी)। यह इतना आश्चर्यजनक तथ्य था कि संगीतकारों ने इसे फ़्लूक हिट करार दे दिया, पर त्रिपाठी की घर-घर गंूजने वाली मेलोडी इन तमाम आलोचनाओं पर भारी पड़ी।

शिवरंजनी आधारित बेहतरीन गीतों में वाॅयलिन का दर्दीला प्रयोग अक्सर किया गया है। जैसे सोनिक ओमी द्वारा संगीतबद्ध ‘रफ़्तार‘ (1974 - मुकेश, आशा) का ‘संसार है इक नदिया, सुख दुख दो किनारे हैं।‘ कल्याणजी आनंदजी द्वारा शिवरंजनी का प्रयोग हमें ‘जं़जीर‘ (1973) के ’बना के क्यों बिगाड़ा रे, बिगाड़ा रे नसीबा’ (लता) और ’मुकद्दर के सिकंदर’ (1978) के ’ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना’ (किशोर/आशा) में मिलता है। ’ओ साथी रे’ को पुरुष और महिला दोनों श्रेणियों में फ़िल्म फेअर पुरुस्कार के लिए नामांकित किया गया था।

आम तौर पर फ़िल्मों में शिवरंजनी आधारित गीत कहरवा ताल पर ही सृजित किए गए हैं, पर अगर अपवादों पर जाएं तो दादरा ताल पर आधारित रवि द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म ’घूंघट’ (1960) का ’लागे ना मोरा जिया’ (लता) शिवरंजनी की एक यादगार अभिव्यक्ति है। शिवरंजनी के लोकप्रिय उदाहरणों में राहुल देव बर्मन द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म ’महबूबा’ (1976) के ’मेरे नैना सावन भादो फिर भी मेरा मन प्यासा’ (लता/किशोर) और ‘खुशबू‘ (1975) के बागेश्वरी के साथ शिवरंजनी का पुट लिए ‘दो नैनों में आंसू भरे हैं निंदिया कैसे समाए‘ भी शामिल हैं।

शत्रुघन सिन्हा पर फ़िल्माया शायद सबसे खूबसूरत गीत है राग शिवरंजनी पर ही आधारित बी.आर. इशारा की ‘मिलाप‘ (1972) का बृजभूषण द्वारा संगीतबद्ध और मुकेश का अपेक्षाकृत ऊंची पट्टी पर गाया ‘कई सदियों से कई जन्मों से तेरे प्यार को तरसे मेरा मन।‘ शिवरंजनी आधारित फ़िल्मी गीतों के अन्य उदाहरणों में वी. बलसारा द्वारा संगीतबद्ध ‘विद्यापति‘ (1964) के ‘मेरे नैना सावन भादो तोरी रह-रह याद सताए‘, सुधीर फड़के द्वारा संगीतबद्ध ‘भाभी की चूड़ियां‘ (1961) का ‘मेरी लाज रखो गिरधारी‘, ‘सम्बंध‘ (1969) में ओ.पी. नैयर द्वारा कम्पोज किया गया ‘अकेली हूं मैं पिया आ‘ (आशा) को याद किया जा सकता है। शिवरंजनी (साथ में सोहनी की छाया लिए) आधारित सबसे मशहूर गीतों में हेमंत कुमार द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म ‘बीस साल बाद‘ (1967) के रहस्यमय गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल‘ (लता) को हम कभी नहीं भुला सकते। दरअसल इस गीत में सम्बंधित एक रोचक तथ्य यह भी है कि इन दिनों लता काफी बीमार हो गई थीं और बीमारी से उठने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी आवाज पहले जैसी नही रहीं। पर हेमंत ने बिना बताए उनके एक रिहर्सल को ही रेकाॅर्ड कर लिया और उसी को रेकाॅर्डिंग मानकर लता को सुनाकर उन्हें विश्वास दिला दिया कि उनकी आवाज अब भी लता की आवाज है। यह भी कम ही लोग जानते हैं कि इस गीत को हेमंत पहले गीता दत्त से गवाना चाहते थे, पर उनके घर पर रिहर्सल में ‘ज़रा मिलना नज़र पहचान के‘ का वह आवश्यक ‘नाजु़क लहजा‘ जब गीता नहीं ला पाईं तो हेमंत ने उनसे माफ़ी मांग लता को बुलवा लिया।

हिन्दी फ़िल्म संगीत के बाद के दशकों में भी शिवरंजनी का प्रयोग यदा-कदा होता रहा है। पर ऐसे कई गीतों में जैसे ‘बेटा‘ (1991) का ‘धक धक करने लगा‘ में आॅर्केस्ट्रेशन इतना हावी रहा है कि शिवरंजनी का कोमल प्रभाव दब जाता है। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

- पंकज राग, गीत-संगीत के अध्येता, शोध पुस्तक, 'धुनों की यात्रा' के लेखक

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