रसरंग में क़िस्सागोई:कभी अवध के बावर्ची बनाते थे ओस में भीगे अंकुरित गेहूं का हलवा

पुष्पेश पंत17 दिन पहले
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जब भी जाड़े का मौसम आता है, हमें अनायास हलवे के गुण और उसकी तासीर याद आने लगती है। कभी गाज़र का हलवा तो कभी मूंग या चने की दाल का हलवा पौष्टिक नाश्ते के रूप में या खाने के बाद मिष्ठान्न के रूप में सुलभ होते हैं। कुछ वर्ष पहले तक ये सब घर पर ही तैयार होते थे। आजकल हममें से अधिकांश लोग इन्हें हलवाई की दुकान से खरीदकर ही खाते हैं।

हलवे के साथ एक नहीं, बल्कि अनेक किस्से जुड़े हुए हैं। कुछ लोगों का मानना है कि हलवा अरबों के साथ भारत पहुंचा। बहुत दूर की कौड़ी लाने वाले लालबुझक्कड़ सुझाते हैं कि चीनी की चाशनी में जब किसी अनाज़, सब्जी-फली को घोल दिया जाता है तो यह गणित के सवाल को 'हल' करने जैसा होता है। इसी से हलवा शब्द उपजा है। इस्लाम के अाविर्भाव के पहले ही अरब जगत से हमारा संपर्क हो चुका था। दक्षिण में जो हलवे लोकप्रिय हैं, उनमें खजूर का हलवा और हब्शी हलवा प्रमुख हैं। हब्शी यानी अबिसीनिया से आया व्यंजन।

एक कहानी कहती है कि जब एक वयोवृद्ध ऋषि ने एक नवयुवती राजकुमारी से विवाह के बाद अपना यौवन और पौरूष पुनः जागृत करने के लिए च्यवनप्राश का आविष्कार किया तो वह भी एक हलवा ही था। हलवा शब्द की उपज 'अवलेह' से हुई मानना अधिक सार्थक सहज लगता है।

भारत में हलवों की जैसी विविधता है, वैसी अरब दुनिया में या तुर्की में नहीं, जहां से हलवे के आयात वाला मत प्रतिपादित किया गया है। अविभाजित भारत में सिंध में अंकुरित गेहूं से दांतों में चिपकने वाला कराची हलवा बनाया जाता रहा है जो विभाजन के बाद बंबई हलवे के नाम से मशहूर हुआ। दक्षिण भारत में इसे ही गोधुम हलवा कहा जाता है। पंजाब में आटे, घी और शक्कर के मिश्रण से 'कड़ा' हलवा तैयार होता है जो स्वर्ण मंदिर में प्रसाद के रूप में शिरोधार्य किया जाता है।

अवध के बावर्ची तरह-तरह के आविष्कार करते रहते थे। वहां अंकुरित गेहूं को रातभर ओस में भिगोकर जो हलवा बनाया जाता था, उसे जॉर्जी सोहन हलवा कहा जाता था। वह दिल्ली में बनाए जाने वाले उस सोहन हलवे से बिल्कुल अलग था जो गोलाकार बड़ी-सी टिकिया के रूप में बिकता था और जिसको दांत से तोड़कर खाना कठिन था। इसका छोटा सा टुकड़ा जुबान पर रखते ही शुद्ध घी का ज्वार मुंह में उफनने लगता था। कभी दिल्ली से घर लौटने वाला हर पर्यटक यह सौगात अपने साथ ले जाता था, क्योंकि यह मीठी टिकिया बहुत टिकाऊ होती थी यानी काफी दिनों तक खराब नहीं होती थी।

हलवे के किस्सों में उन हलवों को जोड़ना परमावश्यक है जो श्रेष्ठी वर्ग और वंचित समुदाय की जरूरतें पूरा करते थे। उत्तर से लेकर दक्षिण तक सूजी का हलवा लोकप्रिय है, जिसे दक्षिण में केसरी भात कहा जाता है। जो साधन संपन्न हैं, वे इसमें किशमिश-चिरौंजी आदि डालते हैं। और अधिक समृद्धि का प्रदर्शन करना हो तो शुद्ध बादाम का हलवा बनाने की कोशिश कर सकते हैं, अन्यथा गांव-देहात में मोटे अनाज रागी, मडुवा, बाजरे अथवा आटे का गुड़ से मीठा किया गया हलवा बनाया जाता है।

असाधारण हलवों में गोश्त का हलवा, मिर्च का हलवा और अण्डे का हलवा गिनाए जा सकते हैं। यदि इन्हें कुशल कारीग़र ने बनाया हो तो खाने वाला भाप नहीं सकता कि इन्हें किस पदार्थ से बनाया गया है। कुछ और असाधारण हलवे हैं जैसे पोस्ते का हलवा (जिसे खसखस के दानों को पीसकर बनाया जाता है)। काश्मीर में कुछ कुशल हलवाई सेब का हलवा भी बनाते हैं और सूरत में एकबार हमने अखरोट का हलवा भी चखा है।

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