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प्रसंगवश:पटौदी के प्रैंक : अपने ही साथी खिलाड़ी का करवा दिया था 'अपहरण'

सुशील दोशी10 दिन पहले
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मंसूर अली खां पटौदी - Dainik Bhaskar
मंसूर अली खां पटौदी

दुर्भाग्य को मात देकर विश्व क्रिकेट को चौंकाने वाली शख्सियत का नाम है मंसूर अली खां पटौदी। 5 जनवरी 1941 को भोपाल में जन्मे मंसूर अली जब अपना 11वां जन्मदिन मना रहे थे, उसी दिन यानी 5 जनवरी 1952 को उनके पिता की मृत्यु का दुखद समाचार मिला। उसके बाद से मंसूर कभी भी अपना जन्मदिवस दिल से नहीं मना पाए।

स्कूली शिक्षा लेने के बाद वे पढ़ने के लिए इंग्लैंड चले गए, जहां फ्रैंक वूली ने उन्हें प्रशिक्षित किया। महज 16 साल की उम्र से ही काउंटी सक्सेस के लिए खेलने लगे।

1 जुलाई 1961 के दिन वे होव (ब्रिटेन) में अपने मित्र के साथ कार से कहीं जा रहे थे कि एक हादसा हो गया। दुर्भाग्य से उन्हें अपनी दायीं आंख गंवानी पड़ी। सभी ने सोचा कि अब पटौदी के क्रिकेट कॅरिअर का अंत हो गया है। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक आंख से खेलने का अभ्यास करते रहे। करीब 6 माह बाद दिसंबर 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ दिल्ली में अपने टेस्ट कॅरिअर की शुरुआत की। इसी शृंखला में उन्होंने तीसरे टेस्ट (मद्रास) में 103 रन बनाकर क्रिकेट दुनिया को चमत्कृत कर दिया। उन्हीं के अच्छे प्रदर्शन के कारण भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ पहली बार शृंखला जीती। एक आंख न होने के बावजूद पटौदी की फील्डिंग भी अद्भुत थी। इसी फील्डिंग के कारण उनका नाम ‘टाइगर’ पड़ा।

पटौदी भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे कम उम्र के कप्तान रहे। 1962 में वेस्टइंडीज के बारबाडोज में खेलते हुए चार्ली ग्रिफिथ की गेंद पर तत्कालीन कप्तान नरी कांट्रेक्टर सिर पर चोट लगने से घायल हो गए थे। तब पटौदी को कप्तान बनाया गया। उस समय उनकी उम्र केवल 21 वर्ष 77 दिन थी। उनकी कप्तानी में भारत ने पहली बार विदेशी जमीन पर शृंखला जीती जब 1968 में न्यूजीलैंड को उसके ही घर में मात दी।

पटौदी के प्रैंक के किस्से भी बड़े मशहूर रहे हैं। मुझे भारतीय क्रिकेट टीम के एक वरिष्ठ खिलाड़ी के सचिव ने एक किस्सा सुनाया था जो मैं साझा करना चाहता हूं। सालों पहले विजय मांजरेकर, चंद्रशेखर, गुंडप्पा विश्वनाथ, प्रसन्ना और राजसिंह ढूंगरपुर आदि भोपाल में एक इन्विटेशन मैच खेलने आए थे। मैच के बाद पटौदी उन्हें घुमाने के लिए अपने ही स्टेट के जंगलों में ले गए। उसी दौरान उन्हें कुछ डाकुओं ने घेर लिया। वहां डाकुओं ने विश्वनाथ को पेड़ से बांध दिया। उनसे कहा कि प्रसन्ना को तो हम गोली मार चुके हैं। यदि आपके बदले फिरौती नहीं मिली तो आपका भी वही हश्र होगा। दरअसल, वे डाकुओं के भेस में पटौदी के ही नौकर थे और प्रैंक करने के लिए पटौदी ने उन्हें एक्टिंग करने को कहा था। इस बारे में विश्वनाथ को छोड़कर अन्य सभी खिलाड़ियों को मालूम था, लेकिन वे प्रैंक में भागीदार बनकर खुद भी एक्टिंग करने लगे। विश्वनाथ तो इतना डर गए कि वे रोने लगे और बार-बार बोलते रहे कि मैं भारतीय टीम का वरिष्ठ खिलाड़ी हूं। देश को मेरी जरूरत है। बाद में उन्हें यह बोलकर छोड़ा गया कि ‘फिरौती’ मिल गई है। घर पहुंचने तक वे उस घटना को सच ही मानते रहे।

(सुशील दोशी पद्मश्री से सम्मानित जाने-माने क्रिकेट कमेंटेटर हैं।)

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