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रसरंग में मायथोलॉजी:पशु-वृत्ति को वश में करने की याद दिलाते हैं जानवरों पर सवार देवता

देवदत्त पटनायक9 दिन पहले
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मयूर पर बैठे हुए मुरुगन। इनके हर मंदिर में ऐसी ही प्रतिमा देखने को मिलती है। - Dainik Bhaskar
मयूर पर बैठे हुए मुरुगन। इनके हर मंदिर में ऐसी ही प्रतिमा देखने को मिलती है।

संस्कृत स्कंद पुराण के तमिल संस्करण 'कंद पुराणम' में शिव के पुत्र मुरुगन (जिन्हें उत्तर भारत में कार्तिकेय के नाम से जाना जाता है) द्वारा राक्षस तारक और उसके भाइयों सिंहमुखन व सुरपद्मन को पराजित करने की कहानी बताई गई है। क्षमा मांगने पर मुरुगन सिंहमुखन को शेर बनकर दुर्गा का वाहन बनने का निर्देश देते हैं।

मुरुगन से लड़ते समय सुरपद्मन पर्वत का रूप धारण करता है। मुरुगन अपने भाले से पर्वत को दो भागों में तोड़ देते हैं। पहाड़ का एक हिस्सा मोर में बदलकर मुरुगन का वाहन बन जाता है, जबकि दूसरा हिस्सा मुर्गा बनकर उनके ध्वज पर उनका प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार इस कहानी के अनुसार वास्तव में दुर्गा और उनके पुत्र मुरुगन के वाहन राक्षस हैं, जिन्हें वश में करके बदल दिया गया है ताकि वे परमात्मा से जुड़ने के योग्य बन जाएं।

हिंदू पुराणशास्त्र में सभी देवी-देवता किसी न किसी जानवर से जुड़े होते हैं। सृजनकर्ता ब्रह्मा राजहंस से, संरक्षक विष्णु गरुड़ से, विनाशक शिव बैल से, धन की देवी लक्ष्मी हाथी से, ज्ञान की देवी सरस्वती कलहंस से और शक्ति की देवी दुर्गा शेर और बाघों से जुड़ी हुई हैं। नदी की देवियां गंगा और यमुना क्रमशः डॉल्फ़िन (या मगरमच्छ) और कछुए पर सवार होती हैं। ये जानवर वाहन कहलाते हैं और वे देवताओं को जगह-जगह ले जाते हैं। कभी-कभार वो जानवर देवता के ध्वज पर उनके चिह्न का रूप लेता है, तो कभी-कभार अलग-अलग जानवर वाहन और ध्वज पर प्रतीक होते हैं। उदाहरणार्थ शिव, जो एक बैल पर सवार होते हैं, के ध्वज को वृषभ-ध्वज कहा जाता है, अर्थात वह ध्वज जिस पर बैल का प्रतीक है। मुरुगन मोर पर सवार होते हैं लेकिन उनके ध्वज पर चिह्न मुर्गे का होता है।

यहां जानवरों के माध्यम से एक विचार व्यक्त किया जाता है। अधिकांश भारतीय कविताओं में प्रेम और इच्छा के विचार तोतों, मधुमक्खियों, तितलियों और मकर नक्षत्र के माध्यम से व्यक्त किए गए हैं, जो नक्षत्र वसंत के आगमन का प्रतीक है। और इसलिए, इच्छा के देवता 'काम' को तोते पर सवार वर्णित किया गया है। उनके धनुष की प्रत्यंचा मधुमक्खियों और तितलियों से बनी है, उसका डंडा गन्ने से बना है और उनके ध्वज पर मकर का चिह्न है। कहते हैं कि कलहंस में दूध को पानी से अलग करने की क्षमता होती है। इस प्रकार कलहंस विवेक का प्रतीक बन जाता है और इसलिए ज्ञान की देवी सरस्वती से जुड़ा हुआ है।

हानिकारक जीव होने के कारण चूहा समस्याओं का प्रतीक है। विघ्नों को दूर करने वाले देवता गणेश का वाहन चूहा है। चूहे पर सवार होकर और उसे अपने वाहन के रूप में पालतू बनाकर वे हमारे जीवन में आने वाली समस्याओं को रोकते हैं। शिव का बैल शिव की स्वतंत्रता का प्रतीक है, विष्णु का गरुड़ उनकी गतिशीलता और व्यापक दृष्टि का प्रतीक है।

तत्वमीमांसा में जानवर जीव-आत्मा हैं, अर्थात शरीर में लिपटी आत्मा। गतिशील होने के कारण उनका शरीर पौधों से श्रेष्ठ है। लेकिन जानवर मनुष्यों से कमतर हैं क्योंकि उनके पास वो अत्यधिक विकसित मन नहीं है जो मनुष्यों को कल्पना करने, प्यार करने, रचना करने और दूसरों की देखभाल करने में सक्षम बनाता है। मनुष्य जानवर से इसलिए भी बेहतर है क्योंकि मनुष्यों में सहानुभूति की असीम क्षमता होती है। यह क्षमता जानवरों में बहुत सीमित होती है। जानवरों पर सवार होकर देवता शायद हमें याद दिला रहे हैं कि हममें आत्म-रक्षा और आत्म-प्रचार की पशु प्रवृत्ति को वश में करने की क्षमता है। इससे हम आत्मबोध (जो एक अद्वितीय मानवीय क्षमता है) की ओर बढ़ सकते हैं। लेकिन यह केवल तभी हो सकता है, जब हम दूसरों के प्रति संवेदनशील बनें। दुर्भाग्यवश, हम ज़्यादातर समय जानवरों जैसा ही व्यवहार करते हैं और केवल जीवित रहने के बारे में सोचते हैं।

जानवर केवल अपने शरीर को जीवित रखने के बारे में सोचते हैं, क्योंकि उसके आगे की सोचने की क्षमता उनमें नहीं है। दूसरी ओर हम सारा जीवन अपनी कल्पित आत्म-छवि को पोषित करने में बिताते हैं। इस प्रकार, हम जानवरों से भी बदतर हैं। जब तक हम केवल अपने और अपनी संपत्ति के बारे में सोचते रहेंगे, दूसरों को नज़रअंदाज़ करते रहेंगे, हम मानव शरीर में जन्म लेने से मिला मौक़ा गंवा देंगे।

- देवदत्त पटनायक, प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों के आख्यानकर्ता और लेखक

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