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रसरंग में धुनों की यात्रा:सचिन देव बर्मन : शास्त्रीय संगीत में माधुर्य का मेल

पंकज राग19 दिन पहले
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लता मंगेशकर के साथ सचिन देव बर्मन। (साभार : सोशल मीडिया) - Dainik Bhaskar
लता मंगेशकर के साथ सचिन देव बर्मन। (साभार : सोशल मीडिया)

यह सचिन दा की विविधता थी कि नवकेतन के बैनर से हटकर फ़िल्मिस्तान के परचम तले जब देव आनंद के लिए वे 'मुनीमजी' (1955) के संगीतकार के रूप में आए तो उन्होंने अपने खास रिद्म, प्रवाह और लोक धुन पर आधारित 'जीवन के सफ़र में राही', 'नैना खोए खोए', 'ओ शिवजी ब्याहने चले पालकी सजाए के' जैसे गीतों के साथ-साथ संगीत का एक बिल्कुल अलग शास्त्रीय रंग भी प्रस्तुत किया और वे लता के स्वर में विशुद्ध शास्त्रीय प्रधान रचनाएं भी लेकर आए। दादरा ताल में राग केदार पर आधारित 'साजन बिन नींद न आए' में बांसुरी का बिल्कुल अलग इस्तेमाल इस सुंदर रचना को अविस्मरणीय बना गया है। सुबह-सवेरे घूमने जाने वाले सचिन दा ने 'घायल हिरणिया मैं बन-बन डोलूं' में प्रातः प्रकृति में व्याप्त पक्षियों की चहचहाहट और अन्य ध्वनियों का समावेश किया और काफ़ी में सृजित यह रचना (शाहाना की भी हलकी-सी छाया) फ़िल्म-संगीत के शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों में आज भी अपना स्थान रखती है। फ़िल्म की अन्य अविस्मरणीय रचना थी राग बिहाग पर आधारित 'आंख खुलते ही तुम छुप गए हो कहां' जिसे तबले और जलतरंग पर एक अलग ही रिद्म देकर दादा ने बेहद मेलोडियस बना दिया।

शास्त्रीय संगीत पर बर्मन दा की पकड़ तो मजबूत थी ही, लेकिन उनका विशिष्ट पहलू यह था कि शास्त्रीय आधारित रचनाओं को भी उन्होंने मेलोडी और माधुर्य की संरचना के अंदर ही रखकर प्रस्तुत किया। इसलिए अपवादों को छोड़कर उन्हांेने कभी भी शास्त्रीय आधारित रचनाओं को जटिल नहीं होने दिया। अपने सहायक जयदेव से उनकी अकसर ये शिकायत रहती थी कि जयदेव धुनों को जटिल और मुश्किल बना देते थे, जबकि दादा की कोशिश रहती थी कि भले ही रचना का आधार शास्त्रीय हो, पर उसका रूप ऐसा बने कि राह चलता आदमी भी उसे आसानी गुनगुना सके। 'मन मोर हुआ मतवाला' (सुरैया-अफ़सर, 1950) जैसा मल्हार का सीधा-सादा गुनगुनाने वाला रूप कितने संगीतकार प्रस्तुत कर पाने में सफल रहे हैं? इसी प्रकार 'बुज़दिल' (1952) में फ़य्याज़ खां की मूल रचना का नट बिहाग में सरल और सुंदर रूपांतरण 'झन झन झन झन पायल' (लता) के रूप में दादा ने अद्वीतीय कौशल से किया था। 'सोसायटी' (1955) के 'मेरी उमर से लम्बी हो गई' (लता) का शास्त्रीय आधार भी बहुत कसा हुआ था, भले ही यह गीत अधिक लोकप्रिय न हुआ हो। आशा के गाए 'लहरों में झूलूं तारों को छू लूं' (आशा) भी शास्त्रीय बंदिश का ही बेजोड़ रूप है जिसमें सितार की युगलबंदी के साथ आशा की तानें और मुरकियां लाज़वाब ही हैं।

फ़िल्मों में बहुत कम इस्तेमाल किए जाने वाले राग मुलतानी का इस्तेमाल सचिन देव बर्मन ने 'जीवन ज्योति' (1953) के 'लग गई अंखियां तुमसे मोरी' (गीता, रफ़ी) में हारमोनियम के बेहतरीन टुकड़ों के साथ किया। यदि इसी फ़िल्म के 'छाई कारी बदरिया' (लता) के पीछे राग पीलू था तो बहार का इस्तेमाल उन्होंने डाॅ. विद्या (1962) के चर्चित गीत 'पवन दीवानी न माने' (लता) में उतनी ही खूबसूरती से किया। वैसे तो सचिन देव बर्मन की कई फ़िल्मों के कई गीत विभिन्न रागों पर आधारित थे, पर शास्त्रीय संगीत का सर्वाधिक व्यापक इस्तेमाल उन्होंने किया 'मेरी सूरत तेरी आंखें' (1963), 'कैसे कहूं' (1964) और 'गाइड' (1965) में। अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और आशा पारेख अभिनीत निहार रंजन गुप्त के उपन्यास 'उल्का' पर आधारित 'मेरी सूरत तेरी आंखें' आज भी फ़िल्म संगीत में अहीर भैरव की कालजयी कृति 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' (मन्ना डे) के लिए याद की जाती है। वहीं 'तेरे बिन सूने नैन हमारे' (लता, रफ़ी) की पीलू और काफ़ी के प्रभाव की धीमी लय, जौनपुरी आधारित 'तेरे ख्यालों में तेरे ही ख्वाबों में' (लता) और भैरवी में 'नाचे मन मोरा मगन धिकना धीकी धीकी' (रफ़ी) पर कुर्बान होने वाले तो आज भी हज़ारों हैं। 'नाचे मन मोरा' में स्थाई पंक्तियों के बाद तबले से उत्पन्न एक अजीब-सा हुंकार-भरा स्वर गीत की अनूठी विशेषता बन गया। बर्मन दा की अपनी लाक्षणिक सुबह की शीतल हवा की ताज़गी वाला सुंदर संगीत लेकर आया था सुमन और मुकेश के स्वर में गिटार के काॅड्स के साथ मिश्र कलावती की छाया लिए रूमानी गीत 'येे किसने गीत छेड़ा'।

'कैसे कहूं' (1964) के संगीत की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, उतनी भले ही न हुई हो, पर यह निर्विवाद है कि दादा की संगीतबद्ध सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में इसे रखना होगा। शास्त्रीय संगीत का बेमिसाल प्रयोग एक तरफ़ राग अडाना में 'मनमोहन मन में हो तुम्हीं' (जिस पर बातिश को वर्ष के सुर सिंगार संसद के सर्वश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार भी मिला था) की बंदिश के रूप में था, तो दूसरी तरफ पीलू के मुलायम सुरों के साथ 'तुम हमें प्यार करो या न करो' (लता) की मीठी अभिव्यक्ति में, और तीसरी ओर अल्हैया बिलावल के सुरों के साथ अपने लाक्षणिक लोच भरे विरामों के साथ मिठास और कर्णप्रियता की बेमिसाल कृति 'हौले-हौले जिया डोले' (लता) के दोलन में। 'कैसे कहूं तोसे जिया की मैं बतियां' (लता) जैसे गीत यही सिद्ध करते हैं कि 'कैसे कहूं' में बर्मन ने शास्त्रीय संगीत का एक अत्यन्त सरस और लोकरंजित रूप प्रस्तुत किया, भले ही दूसरी शैली के फ़िल्म के गीत भी लोकप्रिय रहे हों। शकील बदायूंनी के गीतों का नौशाद से अलग यह अनूठा ही रंग था।

आर.के. नारायण की चर्चित रचना पर आधारित 'गाइड' (1965) में दादा अद्भुत थे तो शास्त्रीय भी थे। यहां शास्त्रीयता 'कैसे कहूं' की तरह सीधी और सहज तो नहीं थीं, पर सरसता भरपूर थी और जटिलता से तो दादा अपनी रचनाओं को बचाकर ही चलते थे। तिलंग में 'पिया तोसे नैना लागे रे' (लता) का जादू तो आज भी सर चढ़कर बोलता है। अपनी पुरानी धुन 'पग ठुमक चलत' की रेकाॅर्डिंग में हुई कमी दादा को अंदर ही अंदर सालती रही होगी, तभी इसी झिंझोटी आधारित धुन का परिष्कृत रूप लेकर वे 'गाइड' में आए और दादा के घर के टेरेस पर दोपहर से शाम तक व्हिस्की की बोतल के साथ अकेले बैठकर शैलेंद्र ने उन्हें अद्वितीय शाब्दिक अभिव्यक्ति दी-'मोसे छल किए जाए, हाय रे हाय सैंया बेईमान'। पूरी फ़िल्म में तार शहनाई का क्या सुंदर उपयोग था! 'गाइड' में रफ़ी से धीमी, नाजुक शैली में रूमानी गीत गवाकर उन्होंने एक नवीन पहलू प्रस्तुत किया पर उसके पीछे भी शास्त्रीय रागों का लचीला किन्तु संुदर प्रयोग था। 'तेरे-मेरे सपने अब एक रंग है' के पीछे राग गारा के सुर थे, तो 'दिन ढल जाए हाय शाम न जाए' का स्थायी बिलावल में और अंतरा यमन कल्याण में और 'क्या से क्या हो गया बेवफ़ा तेरे प्यार में' (रफ़ी) झिंझोटी में। 'गाता रहे मेरा दिल' (लता, किशोर) के लिए यदि पहाड़ी राग ही उपयुक्त था, तो अपने खास अंदाज़ में गाए बांग्ला लोकधुन के 'अल्लाह मेघ दे' के पीछे पीलू और 'वहां कौन है तेरा' के पीछे पहाड़ी के सुर सहज ही लग गए थे। 'गाइड' संगीत की दादा की कलात्मकता का उत्कर्ष था और यह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के पीछे की राजनीति ही थी कि उसे पुरस्कार से वंचित रहना पड़ा।

राग पीलू का इस्तेमाल दादा के कई गीतों में मिलता है, पर उसकी प्रकृति में ओ.पी. नैयर वाली पंजाबी शैली का अंश भी नहीं मिलता। दादा के साथ हमें पीलू का बहुत सौम्य और सुरुचिपूर्ण रंग ही दिखता है। इसका सबसे सशक्त उदाहरण 'अभिमान' में 'नदिया किनारे हेराए आई कंगना' में मिलता है। लता के ही स्वर में 'शर्मीली' का राग पटदीप आधारित 'मेघा छाई आधी रात' भी दादा बर्मन की शास्त्रीय संगीत की पकड़ का अनुपम उदाहरण है।

- पंकज राग, गीत-संगीत के अध्येता, शोध पुस्तक,'धुनों की यात्रा' के लेखक

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