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रसरंग में चिंतन:ऋषि वाल्मीकि : मानवजाति के पहले सत्याग्रही जो कवि भी थे और वीर भी

गुणवंत शाह19 दिन पहले
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अमृतसर स्थित भगवान वाल्मीकि तीर्थस्थल पर विराजमान ऋषि वाल्मीकि की प्रतिमा। - Dainik Bhaskar
अमृतसर स्थित भगवान वाल्मीकि तीर्थस्थल पर विराजमान ऋषि वाल्मीकि की प्रतिमा।

जो मनुष्य कवि हो, वह क्या वीर भी हो सकता है? या जो वीर हो, वह कवि हो सकता है? ऋषि वाल्मीकि कवि भी थे और वीर भी। एक प्रचलित श्लोक में वाल्मीकि की महिमा का जिक्र है, जिसमें कहा गया है -

वाल्मीकि तो मुनियों में सिंह जैसे हैं। उन्होंने कवितारूपी वन में विहार करते हुए रामकथा का महानाद किया। उनकी गर्जना सुनकर ऐसा कौन होगा, जिसे परमगति यानी मोक्ष प्राप्त न हुआ हो। अत्यंत मधुर शब्द ध्वनि में रामनाम का गुंजन हो रहा है। ऐसी कोकिल सभा में वाल्मीकि का वंदन किया गया।

दुनिया के किसी कवि को एक साथ सिंह ओर कोयल की उपमा शायद ही मिली होगी। एक ओर सिंह अप्रतिम प्राणशक्ति का प्रतीक है तो दूसरी ओर प्रेम मधुर सर्गशक्ति की प्रतीक कोकिल है। इस तरह से दो महान शक्तियां एक ही व्यक्ति में समाहित होती हैं, तब संसार को वाल्मीकि जैसा कवि प्राप्त होता है।

मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियां रामायण के उद्भव का रहस्य हमारे कान में चुपके से कह देती हैं-

राम तुम्हारा वृत्त ही स्वयं काव्य है

कोई कवि बन जाए, स्वयं संभाव्य है

इसके बाद यह कहा जाए कि वाल्मीकि मानवजाति के पहले सत्याग्रही थे, तो अनुचित नहीं होगा। इसका प्रमाण देने के लिए मुझे सौ विद्वानों और संतों को नैमिषारण्य ले जाना होगा। नैमिषारण्य की पुण्यभूमि पर जब सूरज की पहली किरण वृक्षों के पत्तों-पत्तों पर फैल रही है, सभी आनंद के सरोवर में डुबकी लगा रहे हैं, काव्य पंक्तियों का मधुर गान हो रहा है, सैकड़ों लोग उपस्थित हैं। ऐसे भक्तिमय वातावरण को देखकर ऋषि वाल्मीकि अभिभूत हैं। वे यहां सीता माता के साथ उपस्थित हुए हैं। उनके आनंद की सीमा ही नहीं रही। मर्यादा पुरुषोत्तम राम स्वयं अपने जीवन की रामायण सुन रहे हैं। यज्ञ मंडप में उपस्थित हर कोई स्वयं को धन्य महसूस कर रहा है। रामायण की कथा सुनाने वाले दो दिव्य बालकों के चेहरे से लोगों की दृष्टि ही नहीं हट रही है। ये दोनों बालक राम की तरह ही दिख रहे हैं। उनके माथे पर जटा नहीं होती और उन्होंने शरीर पर वत्कल न पहना होता, तो दोनों रामचंद्र जैसे ही दिखते। बिंब के कारण लोग प्रतिबिंब देख रहे हैं। बड़ा ही अलौकिक दृश्य था।

ऋषि वाल्मीकि जब यज्ञ मंडप में प्रवेश करते हैं, तब सीता संकोचपूर्वक उनके पीछे-पीछे चलती हैं। इस समय ऐसा लग रहा था मानों वे ब्रह्मा जी का अनुशरण कर रही हैं। तब वाल्मीकि ने जो गर्जना की, उसे सभी ने सुना-

हे! महाभाग, हे! रघुनंदन, मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूं। मैंने हजारों वर्षों तक तपश्चर्या की है। मेरे मुख से कभी असत्य वचन निकला हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है।

ऋषि वाल्मीकि सत्य का पक्ष लेते हुए अपने जीवनभर की तपश्चर्या को दांव पर लगाकर स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देते हैं। ऋषि की वाणी किसी सत्याग्रही के मुख पर शोभा देती है। ज़रा उसे सुनें... 'मैंने मिथिलाकुमारी सीता को मेरे आश्रम में शरण दी, तभी उनकी पवित्रता की परीक्षा ले ली थी। यदि सीता में कोई दोष होता, तो मुझे मेरी तपश्चर्या का फल नहीं मिलता।'

ऋषि वाल्मीकि यदि सत्याग्रही न होते, तो क्या ऐसी वाणी का प्रयोग करते, वह भी भरी सभा में मर्यादा पुरुषोत्तम राजा राम के सामने?

मेरे प्रिय वाल्मीकि के लिए ऋषिकवि जैसे शब्द का प्रयोग कवि उमाशंकर जोशी ने किया था। जब मुझे वाल्मीकि से सम्बद्ध अवार्ड प्राप्त हुआ, तब मुझे प्रसन्नता न हो, मैं ऐसा स्थितप्रज्ञ नहीं हूं। ऋषि वाल्मीकि सत्यवचन, सत्यप्रियता और सत्याग्रही महाकवि थे। आदरणीय लोकशिक्षक मोरारी बापू की तरफ से मुझे यह सम्मान प्राप्त हुआ। यह उपहार मैं पूरी नम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। यह मेरे जीवन की अनमोल उपलब्धि है।

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

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