रसरंग में धुनों की यात्रा:शंकर-जयकिशन : एक दो तीन आ जा मौसम है रंगीन

पंकज राग2 महीने पहले
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संगीत की दुनिया की प्रसिद्ध जोड़ी शंकर-जयकिशन। - Dainik Bhaskar
संगीत की दुनिया की प्रसिद्ध जोड़ी शंकर-जयकिशन।

शंकर-जयकिशन अपने संगीत में एक नए तरह की उन्मुक्तता, आक्रामकता और ऑर्केस्ट्रेशन की तीव्रता लेकर आए और शीघ्र ही धूमकेतु की तरह फ़िल्म संगीत संसार में छा गए। जिन दो फ़िल्मों के संगीत ने उनके संगीत को न सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी घर-घर तक पहुंचाया, वे थीं 'आवारा' (1951) और 'श्री 420' (1955)।

मुकेश के स्वर में 'आवारा हूंं' स्वाधीन भारत के रोजगार की तलाश में भटकते नौजवानों का प्रतिनिधि गीत तो बना ही, साथ ही अपनी समाजवादी अपील के कारण सोवियत रूस और मध्य एशिया में भी बेहद लोकप्रिय हुआ। राज कपूर को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान देने में जितनी भूमिका भैरवी में सृजित और शैलेंद्र द्वारा लिखित इस गीत की थी, उतनी और किसी की नहीं। बाॅलीवुड के 100 श्रेष्ठतम गीतों के बीबीसी द्वारा किए गए सर्वे में यह गीत दूसरे पायदान पर आया था। सोवियत रूस में पियानो और एकाॅर्डियन के अद्भुत प्रयोग वाले इस गीत को राज ने स्वयं भी दर्शकों की भीड़ के सामने अकसर गाया। एक ट्रिप में वे मुकेश को साथ लेकर गए और वहांं के दर्शकों के सामने रहस्योद्घाटन किया कि वस्तुतः आवाज़ मुकेश की थी, उनकी नहीं। इस गीत की उत्पत्ति भी फ़िल्म के 'स्टोरी सेशन' के दौरान हुई जब ख्वाजा अहमद अब्बास ने राज कपूर और शैलेंद्र को एक उपेक्षित व शोषित युवक की कहानी सुनाई। और फिर राज कपूर ने कुछ हास्य के साथ शैलेंद्र की ओर मुड़कर पूछा - 'कुछ समझे कविराज?' आर.के. कैम्प में नए-नए आए शैलेंद्र ने बड़ी सादगी से उत्तर दिया - 'गर्दिश में था, आसमान का तारा था, आवारा था' (गीत लेखन के समय यह 'था' बाद में 'हूंं' में बदल दिया गया) और राज कपूर को एक झटके में ही अपनी प्रतिभा और सम्प्रेषण से कायल कर दिया।

राज कपूर की अपनी आरम्भिक हल्की समाजवादी पुट लिए फ़िल्मों की लोकप्रियता के पीछे शंकर-जयकिशन का सहज ही आम आदमी के होंठों पर चढ़ जाने वाली धुनों का बड़ा हाथ रहा। 'दम भर जो इधर मुंह फेरे ओ चंदा' ने पर्दे पर नरगिस-राज की जोड़ी के साथ नवीन और बेबाक फ़िल्मांकन के जरिये प्रेम को एक नई उन्मुक्त परिभाषा दी और यह गाना देश के युवावर्ग का पसंदीदा प्रेमगीत बन गया। आधे बने आर.के. स्टूडियो की दीवारों के बीच फ़िल्माए 'आवारा' के मशहूर स्वप्न दृश्य के गीत 'तेरे बिना आग ये चांदनी, तू आ जा' (मन्ना डे, लता, साथी) की स्वप्निल तरंगों जैसी धुन और उसके तुरंत बाद भैरवी में 'घर आया मेरा परदेसी' (लता, साथी) की मैंडोलिन आधारित थिरकन अपनी विराटता में शंकर-जयकिशन को अपने समकालीनों से बहुत आगे ले गई। इस प्रकार के स्वप्न दृश्य का अभूतपूर्व फ़िल्मांकन और अद्वितीय संगीत इस तथ्य को रेखांकित कर गया कि राज कपूर की रचनात्मक नवीन दृष्टि के लिए उस समय शंकर-जयकिशन से अधिक उपयुक्त संगीतकार और कोई नहीं था। वैसे 'घर आया मेरा परदेसी' की प्रेरणा मिस्र की गायिका कुलसुम की गाई एक प्रसिद्ध रचना से ली गई थी पर उसका विस्तार, संयोजन और सपनीला फ़िल्मांकन बेहद मौलिक और प्रभावशाली था। सुबह से शुरू हुई इस रेकाॅर्डिंग में राज कपूर इतनी सिद्धि चाहते थे कि अंतिम रेकाॅर्डिंग होने तक रात के तीन बज गए। 'आ जाओ तड़पते हैं अरमां' में भी गायन शैली ने रात का वातावरण सृजित करने में सफलता पाई तो शंकर-जयकिशन ने 'एक दो तीन आ जा मौसम है रंगीन' (शमशाद) में महफ़िल के शोर-गुल के उतार-चढ़ाव की पार्श्व ध्वनि के प्रभावी उपयोग से गाने में नाइट क्लब के वातावरण को बेहद सजीव बना दिया। पर इस फ़िल्म का सर्वाधिक सशक्त गीत था दरबारी कानड़ पर आधारित मुकेश का 'हम तुमसे मुहब्बत करके सनम रोते भी रहे हंसते भी रहे'। यह गाना आज भी अपने जीवंत चित्रांकन और दिलकश अदायगी के कारण मुकेश के यादगार गीतों में गिना जाता है। 'जब से बलम घर आए जियरा मचल मचल जाए' (लता) को छोड़कर 'आवारा' के सभी गानों के संदर्भ और अभिव्यक्ति के पहलू आधुनिक थे जिसने फ़िल्म-संगीत में एक तरह की क्रांति ही ला दी।

अपनी फ़िल्म के हर गाने को हिट कराने की कला शंकर-जयकिशन में भरपूर थी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण 'श्री 420' (1955) बना। भैरवी में ही 'मेरा जूता है जापानी' (मुकेश) न सिर्फ़ सालाना बिनाका गीतमाला की पहली पायदान पर आया, बल्कि देश-विदेश में सालों तक गुनगुनाया जानेवाला गीत बन गया। 'सर पे लाल टोपी रूसी' के साथ राज कपूर रूसी नागरिकों के चहेते बन गए तो 'फिर भी दिल है हिंदुस्तानी' के साथ हिंदुस्तानी युवावर्ग के उस समुदाय के प्रतिनिधि भी बने जिसका तमाम दुख-दर्द के बावजूद अभी अपनी आशाओं से पूर्णतः मोहभंग नहीं हुआ था। चूंकि मुकेश उन दिनों अपने स्वयं के फ़िल्म-निर्माण से वक्त निकालकर अधिक गानों की रिहर्सल के लिए तैयार नहीं थे, अतः इस वर्ग ने मन्ना डे के सुर में सुर मिलाकर 'दिल का हाल सुने दिलवाला' भी झूम-झूमकर गाया।

'रमय्या वस्तावैया' (रफ़ी, लता, मुकेश) की भैरवी में शंकर दक्षिण भारतीय संगीत का रंग लेकर आए तो 'ईचक दाना बीचक दाना' (लता, मुकेश) में जयकिशन उत्तर भारतीय ग्रामीण रस का यमनी बिलावल रंग। 'रमय्या वस्तावैया' की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। खंडाला से लौटते हुए शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, शंकर और जयकिशन अपने एक जाने-पहचाने ढाबे पर रुके जहां एक तेलगु लड़का रमय्या काम करता था। तेलगु जानने वाले शंकर ने उसे चाय-नाश्ते का आर्डर तेलगु में ही दिया। पर उस दिन रमय्या दूसरे ग्राहकों में अधिक व्यस्त था और उसने उन्हें थोड़ा इंतज़ार करने को कहा। जब इंतज़ार लंबा हो गया तो शंकर थोड़े अधीर हो चले और उन्होंने उसे बुलाने के लिए जोर-जोर से 'रमय्या वस्तावैया, रमय्या वस्तावैया' (एक पुराने तेलगु लोकगीत के शब्द) गुनगुनाना शुरू कर दिया। जयकिशन मेज पर थाप देने लगे। हसरत ने पूछा, 'बस इतना ही, और कुछ नहीं?' तो शैलेंद्र ने तत्काल इसमें जोड़ा, 'मैंने दिल तुझको दिया'। बाद में इस मुखड़े और धुन को राज कपूर को सुनाया गया और फिर पूरा गीत लिखकर फ़िल्म में शामिल किया गया।

'प्यार हुआ इकरार हुआ, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल' (लता, मन्ना डे) नरगिस-राज के रोमांस की नई तस्वीर लेकर आया और अपनी शानदार धुन और आॅर्केस्ट्रेशन से युवाओं के दिलों की धड़कन बन गया। राज कपूर इस गीत से इतने प्रभावित थे कि गीत की रेकाॅर्डिंग के दौरान ही एक छतरी मंगवाकर नरगिस के साथ उसके फिल्मांकन की कल्पना को साकार करने लगे थे। 'आवारा' की तर्ज़ पर क्लब संगीत के रूप में 'मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के' की संगीत रचना भी बेहद लोकप्रिय हुई (जयकिशन स्वयं भी इस गीत में पर्दे पर नज़र आते हैं) और 'श्री 420' के साथ शंकर-जयकिशन संगीतकारों में शीर्ष की पदवी पा गए।

- पंकज राग, गीत-संगीत के अध्येता, शोध पुस्तक,'धुनों की यात्रा' के लेखक

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