रसरंग में धुनों की यात्रा:शिव-हरि ने फ़िल्मों में भी जमाई थीं धाक : 'देखा एक ख़्वाब तो ये सिलसिले हुए'

पंकज राग4 महीने पहले
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प्रख्यात संतूरवादक शिवकुमार शर्मा और प्रसिद्ध बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया। - Dainik Bhaskar
प्रख्यात संतूरवादक शिवकुमार शर्मा और प्रसिद्ध बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया।

प्रसिद्ध संतूरवादक शिवकुमार शर्मा और प्रसिद्ध बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया का नाम कौन नहीं जानता है। कई राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों और पुरस्कारों से नवाज़े गए दोनों कलाकारों ने फिल्मों में भी शिव-हरि के नाम से यादगार संगीत देकर अपनी धाक जमाई।

पहलवानों के परिवार में 1 जुलाई 1938 को इलाहाबाद में जन्मे हरिप्रसाद ने पं. भोलाराम, पं. राजाराम और अन्नपूर्णा देवी (उस्ताद अलाउद्दीन खान की पुत्री) से शिक्षा पाई थीं। वहीं 13 जनवरी, 1938 को कश्मीर में जन्मे शिवकुमार शर्मा ने बनारस घराने से संगीत शिक्षा पाई और उनका पहला सोलो एलबम 1960 में ही निकल गया।

संतूर को लोकसंगीत के वाद्य की छवि से निकालकर शास्त्रीय संगीत के वाद्य के रूप में स्थापित करने में शिवकुमार शर्मा का बड़ा योगदान है। नए तकनीकों से 'मींड' का प्रभाव तथा गायकी और लयकारी का चरित्र संतूर को उन्होंने ही दिया। बांसुरी जैसे तंतुविहीन वाद्य को भी नियंत्रित करने की कला में सिद्धहस्त चौरसिया और संतूर जैसे मुश्किल वाद्य को हर तरह से बजाने वाले शर्मा का बृजभूषण काबरा के गिटार के साथ 'कॉल आफ द वैली' एलबम काफी लोकप्रिय रहा है। चौरसिया ने 'हरिप्रिया' और 'मंगल ध्वनि' जैसे नए रागों को भी अपनी बांसुरी से स्थापित किया।

आकाशवाणी कटक में बतौर आर्टिस्ट कुछ दिनों तक कार्यरत रहने के बाद हरिप्रसाद चौरसिया ने भुवन के साथ भुवन-हरि के नाम से कुछ फिल्मों में संगीत दिया। अवतार कौल की '27 डाउन' (1973) जैसी कलात्मक फ़िल्म में उनका संगीत था। इसमें द्वंद्वात्मक मनोभावों को तबले के सहारे लाजवाब ढंग से उभारा गया है। उड़िया फ़िल्म 'समया' (1976) में उन्होंने मुकेश से 'रे प्रिया मोर' जैसा सुंदर प्रणय गीत और 'छुपा छुपी' (1981) में उन्होंने अनुराधा पौड़वाल से 'लो शुरू हो गया' जैसी एक बहुत आकर्षक मेलोडी गवाई थी। बतौर संगीतकार आने के पूर्व भी शिवकुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया को विभिन्न संगीतकारों द्वारा फ़िल्मी गीतों में संतूर या बांसुरी बजाने के लिए बुलाया जाता रहा था। मदन मोहन की प्रसिद्ध रचना 'फिर वही शाम वही ग़म वही तन्हाई है' में बांसुरी का सुंदर प्रयोग चौरसिया की ही देन है। शिवकुमार शर्मा का संतूर तो 'झनक झनक पायल बाजे', 'बरसात की रात', 'हम दोनों', 'कश्मीर की कली और 'ये रात फिर न आएगी' जैसी असंख्य फिल्मों के संगीत को झंकृत करता रहा है।

फ़िल्मों में शिव-हरि को लाने का श्रेय यश चोपड़ा को जाता है। अमिताभ, जया और रेखा को एक साथ अपनी चर्चित फ़िल्म 'सिलसिला' (1981) में लानेवाले यश चोपड़ा ने संगीत के लिए खय्याम को न चुनकर इस जोड़ी को लिया। यश चोपड़ा की फिल्मों में पंजाबी, पहाड़ी संगीत का प्रभुत्व रहता था और इस जोड़ी के साथ भी उन्होंने अपनी शैली को कायम रखा। 'सिलसिला' फ़िल्म के गीत काफी हिट रहे। दादरा ताल में राग भूपाली पर आधारित 'देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए' (किशोर, लता), पहाड़ी पर आधारित 'नीला आसमां सो गया' (लता, अमिताभ बच्चन), भैरवी में बेहतरीन कम्पोज़ीशन 'जो तुम तोड़ो पिया' (लता), रूमानी गुंजित स्वरलहरियों के साथ फूलों के उपवन में बेहतरीन तरीके से फिल्मांकित 'ये कहां आ गए हम' (लता, अमिताभ बच्चन), पंजाबी लोकशैली का 'सर से सरके चुनरिया' (लता, किशोर), गज़ल शैली में यश चोपड़ा की पत्नी पामेला (जिनका कम से कम एक गीत यश चोपड़ा अपनी फ़िल्मों में रखते ही थे) का गाया 'खुद से जो वादा किया था' तथा अमिताम, जया, रेखा के प्रेम-त्रिकोण को उद्भासित करता पारम्परिक शैली का होली गीत 'रंग बरसे भीगे चुनरवाली' जैसे गीतों के साथ शिव-हरि ने फ़िल्म संगीत का एक सुंदर विविध रूप प्रस्तुत किया।

संगीत का पंजाबी, पहाड़ी रूप 'फ़ासले' (1985) के संगीत में भी स्पष्ट था। 'चांदनी तू है कहां' (लता, किशोर), ‘इन आंखों के ज़ीने से' (लता, किशोर), 'फ़ासले हैं बहुत' (आशा), 'हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं' (लता, किशोर), 'सुन ले ये सारा ज़माना' (लता) और 'मेरा बन्ना दुलहन' (पामेला, चोपड़ा, शोभा गुर्टू, साथी) जैसे गीतों में कमोबेश यह रंग मुखर था। 'फ़ासले' का सबसे सुंदर गीत था बेहद आधुनिक धुन और ऑर्केस्ट्रेशन से सजा 'जनम-जनम मेरे सनम' (लता, किशोर)। यश चोपड़ा की असफल फ़िल्म 'विजय' (1988) के गीतों की अपेक्षाकृत असफलता के बाद शिव-हरि की यश चोपड़ा के साथ दो सबसे लोकप्रिय फि़ल्में आई-'चांदनी' (1989) और 'लम्हे' (1991)। 'चांदनी' में यश चोपड़ा की फ़िल्मों का पंजाबी पहाड़ीपन कुछ कम था, पर इन रंगों से सराबोर 'मैं ससुराल नहीं जाऊंगी' (पामेला चोपड़ा) खूब हिट रहा था। मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां हैं' (लता), 'पर्वत पे काली घटा' (आशा, सुरेश वाडेकर), 'मितवा' (लता, बाबला), नट भैरवी आधारित 'महबूबा' (लता, विनोद राठौड़), भैरवी आधारित 'तू मुझे सुना' (नितिन मुकेश, सुरेश वाडेकर), 'चांदनी मेरी चांदनी' (जॉली मुखर्जी) और 'ओ मेरी जान' (लता) जैसे नृत्यात्महक और रूमानी गीत भी खूब लोकप्रिय रहे। फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना गया 'लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है' (सुरेश वाडेकर, अनुपमा देशपांडे)। नट भैरवी के हलके क्लासिकी आधार पर यह कर्णप्रिय धुन आज भी शिव-हरि की सदाबहार रचना के रूप में याद की जाती है। कथानक की पृष्ठभूमि के अनुरूप 'लम्हे' के संगीत में शिव-हरि ने राजस्थानी लोकसंगीत के रंग भी 'मेघा रे मेघा' (लता, इला अरुण), 'म्हारे राजस्थान मां' (मोइउद्दीन) और 'चूड़ियां खनक गईं, (लता, इला अरुण, साथी) जैसे गीतों में डाले, पर यश चोपड़ा की फिल्मों की ख़ास रूमानी पहाड़ी शैली की छाया 'मेघा रे मेघा' और 'चूड़ियां खनक गईं' में भी झलकती है। पहाड़ी आधारित 'याद नहीं भूल गया' (लता, सुरेश वाडेकर), और 'ये लम्हे ये पल' (हरिहरन), नट भैरवी की छाया लिए 'कभी मैं कहूं' (लता, हरिहरन), झिंझोटी का स्पर्श लिए 'गुड़िया रानी' (लता) या पहाड़ी की याद दिलाता 'मेरी बिंदिया' (लता) जैसे गीत भी लोकप्रिय रहे। 'लम्हे' का सबसे विशिष्ट गीत था भैरवी आधारित 'मोहे छेड़ो न नंद के लाल' (लता) जिसे शिव-हरि ने परम्परागत ठुमरी अंग के बेहद कर्णप्रिय रूपांतर के रूप में प्रस्तुत किया था।

यश चोपड़ा की 'डर' (1993) में भी यश चोपड़ा की फ़िल्मों के संगीत मुहावरे छाए रहे, चाहे 'सोलह बटन' का पंजाबी लोकरंग हो या 'अंग से अंग' का पूरवी लोकरंग, 'तू मेरे सामने' (लता, उदित नारायण) की रिद्म आधारित नृत्यात्मकता हो (जिसका 'टूट गई टूट के मैं चूर हो गई' का अंतरा तो नृत्यात्मदक मेलोडी की पराकाष्ठा ही थी) या 'जादू तेरी नज़र' (उदित नारायण) और 'लिखा है ये' (लता, हरिहरन) की रूमानियत हो।

'डर' यश चोपड़ा के साथ शिव-हरि की अंतिम पेशकश रही। फ़िरोज नाडियाडवाला की 'परम्परा' (1995) का शिव-हरि का संगीत कुछ विशेष नहीं रहा। रमेश तलवार की 'साहिबां' (1993) के 'कैसे जिऊंगा मैं अगर तू न बनी मेरी साहिबां' (अनुराधा, जॉली मुखर्जी) की पहाड़ी आधारित धुन में भी शिव-हरि की आम पहाड़ी वाली बात न आ पाई। अफरोज़ बानू के स्वर में 'पिहरवा हो प्रेम है दीपक राग' अवश्य एक उल्लेखनीय अर्द्धशास्त्रीय बंदिश थी।

कुल मिलाकर शिव-हरि का फ़िल्मी सफ़र उनकी विराट संगीत काबिलियत के सामने कमतर ही रहा। यह मानना ही पड़ेगा कि उनका संगीत यश चोपड़ा की फ़िल्मों की ख़ास पंजाबी पहाड़ी पारिवारिक या सांस्कृतिक शैली के दायरों में बंधकर ही रह गया और चूंकि यश चोपड़ा से अलग उन्होंने बहुत कम फ़िल्में कीं, अतः उनके संगीत का एकरंगी प्रकार ही सामने आ पाया।

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