रसरंग में मायथोलॉजी:हम सभी को और अधिक समतावादी रास्ता दिखा सकता है सिख धर्म

देवदत्त पटनायक17 दिन पहले
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अमृतसर स्थित पवित्र स्वर्ण मंदिर। - Dainik Bhaskar
अमृतसर स्थित पवित्र स्वर्ण मंदिर।

लोग अमृतसर क्यों जाते हैं? विभाजन देखने या मिलन देखने? यहां विभाजन मीरी-पीरी का रूप लेता है। सांसारिक मीरी अतींद्रिय पीरी से अलग है। मीरी अकाल तख्त द्वारा सन्निहित है। पीरी हरमिंदर साहिब द्वारा सन्निहित है, जो स्वर्ण मंदिर का औपचारिक नाम है। यह मंदिर मानव निर्मित सरोवर के बीच स्थित है। माना जाता है कि ये सरोवर अमृत के रूप में अमरत्व प्रदान करता है। फिर मिलन आता है, तब जब हम सरोवर में डुबकी लगाकर गुरुद्वारा अर्थात गुरु की ओर जाने वाले द्वार में प्रवेश करते हैं; तब जब हम गुरु ग्रंथ साहिब के आगे अपना माथा टेकते हैं; तब जब हम गुरु ग्रंथ साहिब में भक्ति व सूफ़ी परंपराओं के गुरुओं, संतों व पीरों द्वारा लिखे गए शबद सुनते हैं। सार्वजनिक लंगर में हम एकसाथ खाना पकाकर उसे दूसरों को परोसते हैं और स्वयं भी खाते हैं। इसी के साथ जप और प्रार्थना (सिमरन) करते हुए हम गुरुद्वारे की साफ़-सफ़ाई भी करते हैं। सभी लोग इस प्रकार की सेवा अपने धर्म, जाति, वर्ग, राष्ट्रीयता, नस्ल, लिंग या लैंगिक रुझान की परवाह किए बिना पूरी विनम्रता और पवित्रता से करते हैं। ऐसी सेवा करके और दूसरों की सेवा देखकर हम मिलन महसूस करते हैं। यहां हम सब परमात्मा से जुड़ जाते हैं। इससे लोगों के बीच सीमाओं का क्षय हो जाता है और परिणामस्वरूप सामाजिक पदानुक्रम चले जाते हैं। वर्चस्व पाने और प्रतिस्पर्धी बनने की इच्छाएं भी चली जाती हैं, क्योंकि भय चला जाता है और क्षेत्रीय होने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। यह विचार सिख परंपरा के मूल-मंत्र द्वारा सन्निहित है। उसमें सार्वभौमिक एकता और सर्वोच्च अपरिवर्तनीय सत्य का वर्णन किया गया है और साथ-साथ निर्माता और संरक्षक का भी, जो भय, घृणा, मृत्यु और जन्म से परे हैं, जो स्वयं में पूर्ण हैं और जो गुरु की कृपा के रूप में प्रकट होते हैं। सिखों के पहले गुरु, गुरु नानक ने करीब 500 साल पहले इस मूल-मंत्र को रचा था। सिख धर्म को स्पष्ट रूप से ‘आदि ग्रंथ’ द्वारा अत्यधिक संगठित तौर पर परिभाषित किया गया है। इस पुस्तक के गीत एक निराकार और निर्गुण परमात्मा प्रस्तुत करते हैं और न्याययुक्त विश्व का वर्णन करते हैं। 300 साल पहले सिख धर्म को औपचारिक रूप देने वाले दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने आदि ग्रंथ को अंतिम गुरु ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ घोषित किया। सिख धर्म ने लगातार वैरागी जीवन के बजाय गृहस्थ जीवन को अधिक महत्व दिया है। विवाह और परिवार को समाज का आधार माना जाता है। सिख धर्म लैंगिक समानता की लगातार बात करता है। पांच सदियों पहले इस प्रकार की सोच अनोखी थी। सिख धर्म स्वीकार करने वाले पुरुष को शेर (सिंह) कहा जाता है, जबकि ऐसी महिला को शेरनी (कौर) कहा जाता है। इस प्रकार महिलाओं की अपनी पहचान थी, जो उनके पिता या पति पर निर्भर नहीं होती थी। महिलाओं की सिख धर्म में अहम भूमिका रही है। उदाहरणार्थ 18वीं सदी में माई भागो ने सेना के 40 भगोड़ों को फिर से लड़ने के लिए प्रेरित किया। माई भागो ने गुरु गोबिंद सिंह का पीछा कर रही मुग़ल सेना के विरुद्ध आत्मघाती लड़ाई में इन सैनिकों का नेतृत्व किया। बाद में ये 40 सैनिक ‘चालीस मुक्ते’ अर्थात मुक्त हुए व्यक्ति कहलाकर प्रसिद्ध हुए। सिख धर्म जो हमारे उपमहाद्वीप का सबसे नया धर्म है, जिसने हमेशा सीमाओं, विभाजनों और पूर्वाग्रहों को चुनौती दी है, हो सकता है कि 21वीं सदी में हम सभी को और भी अधिक समतावादी रास्ता दिखाए।

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