रसरंग में टॉकिंग पॉइंट:भारतीय सिनेमा में विविधता का ऐसा अनूठा जश्न

भावना सोमायाएक महीने पहले
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फिअरलेस नाडिया जिन्हें हिंदी फिल्मों की पहली स्टंट हीरोइन माना जाता है। - Dainik Bhaskar
फिअरलेस नाडिया जिन्हें हिंदी फिल्मों की पहली स्टंट हीरोइन माना जाता है।

संयुक्त राष्ट्र हर साल 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाता है। हमारे सिनेमा में भी ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जहां महिलाओं ने मतभेदों की सीमाओं को धुंधला कर विविधता का जश्न मनाया।

साल 1935 में रिलीज़ हुई 'हंटरवाली' में फिअरलेस नाडिया को याद कीजिए। एक नकाबपोश नायिका। इस फिल्म को एक अहम शुरुआती महिला प्रधान फिल्म माना जाता है। नाडिया का असली नाम मैरी एन इवांस था। वे ऑस्ट्रेलिया से अपने पिता के साथ भारत आई थीं और पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में रहने के दौरान उन्होंने घुड़सवारी, शिकार करना, मछली पकड़ना और शूटिंग करना सीखा। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने एक सेल्सगर्ल और फिर स्टेनोग्राफर के रूप में नौकरी करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुईं। उन्होंने कार्टव्हील और स्प्लिट्स की कला में महारत हासिल की, जो 1930 में जर्को सर्कस में काम आई। फिर वाडिया मूवीटोन के संस्थापक जेबीएच वाडिया ने उन्हें पहले 'देश दीपक' में एक गुलाम लड़की और फिर 'नूर-ए-यमन' में राजकुमारी परिजाद के रूप में प्रस्तुत किया। वे हिट साबित हुईं। वे हिंदी फिल्मों की पहली स्टंट हीरोइन मानी जाती हैं।

देविका रानी चौधरी को भारतीय सिनेमा की 'प्रथम महिला' के रूप में मान्यता हासिल है। वे जब फिल्म-निर्माता हिमांशु राय से मिलीं तो उन्होंने उन्हें 1928 में अपने प्रोडक्शन क्रू में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। देविका ने राय की फिल्म 'ए थ्रो ऑफ डाइस' (1929) के लिए वेशभूषा डिजाइन और कला निर्देशन में उनकी सहायता की। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद राय ने देविका को यूएफए स्टूडियो में फिल्म निर्माण सीखने के लिए जर्मनी भेजा। उनके वापस आने के बाद उन्होंने देविका को लेकर 1933 में 'कर्मा' बनाई। इसके बाद राय ने एक प्रोडक्शन स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज की स्थापना की और देविका रानी के साथ कई सफल फिल्मों का निर्माण किया। अधिकांश में देविका ने ही मुख्य भूमिकाएं निभाईं। 1940 में हिमांशु राय की मृत्यु के बाद देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज की कमान संभाली और अशोक कुमार व शशधर मुखर्जी के साथ साझेदारी में कई फिल्मों का निर्माण किया। ये फिल्में सफल साबित नहीं हुईं और अंतत: 1945 में देविका ने फिल्म उद्योग छोड़ दिया। देविका रानी हिंदी सिनेमा में पहली महिला स्टूडियो मालिक थीं।

जद्दन बाई और सरस्वती देवी के बाद उषा खन्ना तीसरी महिला संगीत निर्देशक हैं। ओपी नैय्यर ने उषा खन्ना को शशधर मुखर्जी से मिलवाया, जिन्होंने उन्हें रोजाना दो गाने कम्पोज करने को कहा। उनकी बहुमुखी प्रतिभा से संतुष्ट होने पर उन्होंने उषा को 'दिल देके देखो' (1959) और उसके बाद 'हम हिंदुस्तानी' (1961) के लिए साइन किया। उनके श्रेष्ठ गीत आशा भोंसले और मोहम्मद रफी के संयोजन में ही रहे। उषा खन्ना ने 1960 से 1980 के दशक तक फिल्म उद्योग पर राज किया और बाद में टेली-सीरियल्स के लिए भी संगीत तैयार किया।

साई परांजपे की गिनती भले ही प्रमुख महिला निर्देशकों में न होती हो, लेकिन उन्होंने हमें स्पर्श, कथा, चश्मे बद्दूर और दिशा जैसी फिल्में दी हैं। उन्होंने जसवंडी, सक्खे शेजरी, अल्बेल जैसे कई मराठी नाटक लिखे और निर्देशित भी किए। साई ने कई टीवी धारावाहिक जैसे अड़ोस-पड़ोस, छोटे-बड़े, हम पक्षी एक चाल के बनाए। कई वृत्तचित्र और बच्चों की फिल्म जैसे 'भागो भूत' भी बनाई।

सरोज खान ने अपने करियर की शुरुआत 'नजराना' में बतौर बाल कलाकार की थी। उन्होंने कोरियोग्राफर बी. सोहनलाल की सहायिका के रूप में डांस सीखा था। साधना ने उन्हें 'गीता मेरा नाम' में एक स्वतंत्र कोरियोग्राफर के रूप में ब्रेक दिया, लेकिन ख्याति अर्जित करने के लिए कई साल तक इंतजार करना पड़ा। उन्हंे सबसे पहले प्रसिद्धि श्रीदेवी अभिनीत फिल्म 'मिस्टर इंडिया' के गीत 'हवा हवाई ... ' से मिली। फिर मैं तेरी दुश्मन... एक दो तीन... तम्मा तम्मा लोगे... और धक धक करने लगा... से वे लोकप्रियता के सोपान चढ़ती चली गईं।

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