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रसरंग में आपस की बात:'किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम'

राजकुमार केसवानी16 दिन पहले
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फ़िल्म 'अलबेला' के सुपर हिट गीत 'किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम' के एक दृश्य में भगवान दादा। - Dainik Bhaskar
फ़िल्म 'अलबेला' के सुपर हिट गीत 'किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम' के एक दृश्य में भगवान दादा।

एक गीत तो आप सबको याद ही होगा - 'कभी काली रतियां, कभी दिन सुहाने / किस्मत की बातें तो किस्मत ही जानें।' नहीं, नहीं याद आ रहा? कोई बात नहीं। इसे और आसान किए देता हूं ... 'ओ बेटा जी, अरे ओ बाबू जी, किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम / कभी नरम-नरम, कभी गरम-गरम / कभी नरम-गरम नरम-गरम रे।'

अजब सी चीज़ है यह किस्मत भी। कभी मानने को मजबूर, तो कभी ख़ुद पे ग़ुरूर। तो हुज़ूर-पुर-नूर, आला हज़रात, आज पेश-ए-ख़िदमत है आपके हुज़ूर में एक अदना के आला बनने की दास्तान। इन हज़रत के मामले में तो यह भी नहीं कहा जा सकता कि भगवान की कृपा से वे क्या से क्या हो गए। वजह? वजह यह कि इनका ख़ुद का ही नाम भगवान था। बल्कि अपनी ज़िंदगी में इतनी इज़्ज़त और शोहरत हासिल की कि उनके साथ दादा भी लग गया। सो मास्टर भगवान से सफ़र शुरू करते हुए जब मक़ाम-ए-उरूज़ पर पहुंचे, तो हो गए भगवान दादा।

यूं तो भगवान दादा की फ़िल्मी कहानी का आग़ाज़ होता है 1930 की गूंगी फ़िल्म 'बेवफ़ा आशिक़' से लेकिन उनकी ख़ास पहचान है पूरे 70 बरस पुरानी फ़िल्म 'अलबेला।' यह जो एक गीत सुनाकर किस्मत वाली बात मैंने छेड़ी थी न, वो भी तो इस फ़िल्म के सुपर हिट गीतों में से एक गीत ही तो है। कुच्छ और गीतों की भी याद दिला दूं?.... लीजिए, 'महफ़िल में मेरी कौन यह दीवाना आ गया / जब शमा ने पुकारा तो परवाना आ गया' (लता-रफ़ी), 'मेरे दिल की घड़ी करे टिक-टिक-टिक, हो बजे रात के बारा, हाय तेरी याद ने मारा'(लता-चितलकर), 'बलमा बड़ा नादान रे / प्रीत की ना जाने पहचान रे'(लता), 'भोली सूरत दिल के ख़ोटे / नाम बड़े और दर्शन खोटे'(चितलकर), 'शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के / दर्द जवानी का सताए बढ़-बढ़ के' (लता-चितलकर), 'दिल धड़के नज़र शरमाए, तो समझो प्यार हो गया' (लता), 'शाम ढले, खिड़की तले, तुम सीटी बजाना छोड़ दो'(लता-चितलकर), और 'धीरे से आजा री अंखियन में / निंदिया आजा री आजा'(लता-चितलकर)।

यही वो गीत हैं जिन पर भगवान दादा ने ठुमक-ठुमक कर अनोखी अदा से एक ऐसा नाच ईजाद किया, जिसे अमिताभ बच्चन, गोविंदा और मिठुन चक्रवर्ती जैसे सितारों ने पूरी इज़्ज़त देकर अपनाया और वाह-वाही लूटी। इस बात को लोग कल भी मानते थे और आज भी मानते हैं।

एक दिलचस्प बात। जिस वक़्त भगवान दादा की अदाओं पर सारे मुलुक की पब्लिक जान देने को उतावली हुई जा रही थी, उस वक़्त उनकी उम्र थी पूरे थर्टी एट यीअर्स। बोले तो पूरे 38 साल। 1 अगस्त 1913 को जन्मे भगवान अम्बाजी पालव की यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 1951 में। यह वो उम्र है जब हमारे सितारों की चमक उतरना शुरू हो जाती है। और उस पर कमाल यह कि बंदा शक्ल-ओ-सूरत और कद-काठी से भी हीरो लगने वाली शर्तों के दायरे से मीलों दूर था। यह बात मैं नहीं ख़ुद दादा भी कहते थे।

'न चेहरा, न कद-काठी, कुच्छ भी तो नहीं था मेरे पास। लेकिन उस ज़माने में मर्दानगी की निशानी हुआ करता था सजीला शरीर, गठीला बदन। सो दंड पेलते-पेलते ही मैं कलाकार बन गया।' (भगवान दादा – धर्मयुग – 11 दिसम्बर 1988)

कलाकार? ना जी ना। भगवान दादा ने शोहरत की उन सारी हद्दों को पार कर लिया था जिन तक पहुंचने के लिए लोग उम्र भर संघर्ष करते रहते हैं। इस बात को अगर हिंदी सिनेमा के महान कलाकार बलराज साहनी कहें तो इसका वज़न कुच्छ और बढ़ जाएगा।

'... उस समय उनकी फ़िल्म 'अलबेला' बड़ी ज़ोरदार हिट हुई थी। भगवान दादा का सवालिया अदा से ठुमक-ठुमक कर नाचना लोगों को बहुत पसंद आया था। मज़दूर वर्ग तो सदा ही भगवान दादा पर जान न्योछावर करता रहा है। एक बार टैक्सी-ड्राइवर के मुंह से मैंने सुना था, ‘अरे एक बार वह कह दे मुझे तुम्हारी गाड़ी चाहिये। ख़ुदा की कसम, उसी वक़्त चाबी हवाले करके नीचे उतर जाऊं।’

राज कपूर और दिलीप कुमार निस्संदेह कई गुना अधिक लोकप्रिय हैं, पर ग़रीब वर्ग मार-धाड़ की फ़िल्में ज़्यादा देखता है। इसलिए भगवान दादा का उनके दिलों में विशेष स्थान है। वे पर्दे पर अनपढ़ों की तरह हू-ब-हू अनपढ़ और गंवारों की तरह गंवार ही दिखाई देते हैं। लोगों को ऐसा लगता है जैसे उनका अपना कोई सगा-सम्बंधी उठकर इतनी ऊंची जगह पहुंच गया हो और गीता बाली जैसी हसीना से रोमांस लड़ा रहा हो। भगवान दादा इससे पहले सामाजिक फ़िल्मों में कम ही आए थे।'

सच है। भगवान दादा ‘अलबेला’ से पहले दर्जनों फिल्में कर चुके थे लेकिन सब की सब मार-धाड़ से भरपूर स्टंट फ़िल्में। और हां, महज़ फ़िल्मी पर्दे पर हीरो नहीं, पर्दे के पीछे भी हीरो थे। फ़िल्म की कहानी लिखने से लेकर फ़िल्में प्रोड्यूस भी करते थे औए डायरेक्ट भी करते थे। और हर काम में उनकी अपनी एक अदा थी। सबसे अनोखी, सबसे निराली। राज कपूर जैसे शो मैन से लेकर वी. शांताराम जैसे महान फ़िल्मकार भगवान दादा की फ़िल्म बनाने की शैली के कद्रदानों में शामिल थे। बल्कि राज कपूर की प्रशंसा से प्रेरित होकर ही ‘अलबेला’ बनाई थी।

ख़ैर ‘अलबेला’ के बनने की कहानी सुनाने की बारी आएगी तो उस वक़्त यह सब आ ही जाएगा। अभी तो ज़रा पीछे जाकर बात शुरू करनी है भगवान दादा की इस दुनिया में आमद वाले दिन से।

दादर के एक चॉल में रहने वाले एक मिल मज़दूर अम्बाजी पालव के घर में 1 अगस्त 1913 को जन्मे भगवान। हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास में बम्बई और बम्बई में दादर इलाके का अद्भुत योगदान रहा है। न जाने कितने अदाकार, संगीतकार, गायक-वादक इसी इलाके से आए। रंजीत, रूपतारा और श्री साऊंड जैसे कोई आधा दर्जन स्टूडियो भी दादर में ही थे। सो कुल जमा यूं कि माहौल में फिल्मों की ख़ुश्बू थी। भगवान दादा भी इस ख़ुश्बू की ज़द्द में यूं आए कि दीवाने हो गए। इस दीवानगी को परवान चढ़ाया उस दौर के सुपर एक्शन हीरो मास्टर विट्ठल ने, जिन्हें हिंदुस्तानी फ़िल्मों में हॉलीवुड के एक्शन हीरो डगलस फ़ेयरर्बैंक्स वाला मकाम हासिल था। मास्टर विट्ठल की शोहरत का ही कमाल था कि उन्हें हिंदुस्तान की पहली बोलती फ़िल्म 'आलमआरा'(1931) में ज़ुबैदा के साथ हीरो बनाया गया। वह भी तब जब वो उर्दू न जानने की वजह से डायलाग ही नहीं बोल पाते थे।

सच तो यह है कि बीसवीं सदी का वह दौर अखाड़ों और पहलवानों की धूम का दौर था। गामा पहलवान ने दुनिया भर के पहलवानों को हरा-हरा कर हर हिंदुस्तानी के दिल में कुश्ती और अखाड़ों के लिए अद्भुत इज़्ज़त पैदा कर दी थी। फ़िल्मों में भी पहलवानों की कद्र-ओ-कीमत बढ़ती ही जा रही थी। वसंतराव पहलवान और बाबूराव पहलवान हीरो/विलन बनकर पर्दे पर छा रहे थे। कुंदनलाल सहगल जैसे महान गायक भी इस क्रांति से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने अपने मित्र और न्यू थियेटर्स के अपने साथी पृथ्वीराज कपूर को सितार बजाते देखा तो कहा था कि मैं तो हालात देखकर तुम्हारी तरह बॉडी बनाने की कोशिश कर रहा हूं और तुम सितार पकड़े बैठे हो।

भगवान दादा को भी बचपन से ही पहलवानी का शौक था। अखाड़े में जाकर ख़ूब डंड पेलते और ख़ूब पसीना बहाते थे। उसी अखाड़े में वसंतराव पहलवान भी आते थे। भगवान दादा और उनके दोस्त उनकी चिरोरियां करते रहते कि उन्हें भी फ़िल्मों में काम दिलाएं लेकिन वसंतराव बात हंसी में उड़ा देते थे। मजबूरन भगवान और उनके एक दोस्त राजाराम, स्टूडियोज़ के दरवाज़े तक और एक बार पठान की नज़र बचाकर स्टूडियो के अंदर तक हो आए। लेकिन सब बेकार। बकौल दादा वक़्त आया तो ‘किस्मत’ ख़ुद उनकी उंगली पकड़कर उन्हें स्टूडियो ले गई। उस वक़्त ‘किस्मत’ इंसानी भेस में आई थी और उसका नाम था नूर मुहम्मद चार्ली। याद आया? हिंदुस्तानी सिनेमा का सुपर कामेडियन हीरो।

चलो याद आया तो ठीक और जो नहीं आया तो भी ठीक। अगली बार जो इस बात को लेकर बैठेंगे तो सब कुछ बताना ही है। सो यही तय रहा।

और ...

1968 में लच्छीराम चौधरी ने भगवान दादा के बारे में लिखे अपने एक आलेख में उनकी ज़िंदगी के एक दौर को चंद लफ़्ज़ों में बयान किया था। मेरी नज़र में यह दरिया को क़ूज़े में भर लेने जैसा काम है। आप भी देख लें।

'कच्ची उम्र में पिता के क्रोध और सौतेली मां की यातनाओं के कारण घर छोड़ दिया। दर-दर की ठोकरें खाईं। जो मिल गया खा लिया वरना दो चुल्लू पानी पीकर फ़ुटपाथ पर रात गुज़ार दी। कभी होटल में नौकरी की तो कभी सिनेमा के टिकटों का काला बाज़ार किया। कभी साईकलों की दुकान सजाई तो कभी वेश्याओं के मुहल्ले में पान की दुकान सजाई। और जब फ़िल्मों में एक्स्ट्रा के रूप में घुसे तो उसे ही अपना शेष जीवन अर्पित कर दिया।'

अब यह तो रहा एक लम्बे दौर का महज़ एक हिस्सा। भगवान दादा की कहानी बहुत बड़ी और बहुत लम्बी है। इसमे आने वाले किरदारों की तादाद तो हैरान करती ही है लेकिन जब इन किरदारों के नाम आएंग़े तो हो सकता है मेरी तरह आप भी इन हाज़िर और ग़ैर-हाज़िर लोगों के एजाज़ में खड़े होकर अपना सम्मान प्रकट करने पर मजबूर हो जाएं।

फ़िलहाल तो मैं ही उठकर जा रिया हूं। बीवी बुला रही है। सीटी बजा रही है। मतलब खाण-पीण दा टेम हो गया है जी।

जय-जय।

- राजकुमार केसवानी वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और फिल्म इतिहासकार हैं।

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