रसरंग में चिंतन:नफ़रत नामक ज़हर को जन्म देती है विचार शून्यता

गुणवंत शाह14 दिन पहले
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तस्वीर प्रतीकात्मक। - Dainik Bhaskar
तस्वीर प्रतीकात्मक।

महान विचारक रेने देकार्ते ने दुनिया को एक ऐसा सूत्रवाक्य दिया, जिसे उपनिषद की ऊंचाई का मंत्र माना जा सकता है। लैटिन भाषा में वह सूत्रवाक्य है -'कॉजिटो अर्गोसम'। इसका अर्थ होता है- विचारशून्य मानव को ऐसे मानव की संज्ञा दी जा सकती है, जिसकी अंत्येष्टि न हुई हो, फिर भी वह चलने-फिरने वाला निर्जीव मानव है। समाज में ऐसे मनुष्यों की भरमार है।

आज अगर बड़े विश्वव्यापी चैनल चाहें तो तीसरा विश्वयुद्ध करा सकते हैं। एक विचारक ने मज़ाक में कहा है- आप अपने जूते के बंध बांधो, तब तक असत्य आधे विश्व तक पहुंच जाता है। मार्शल मेकलुहान इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया के स्वप्नदृष्टा थे। उन्होंने विश्व को एक सूत्रवाक्य दिया था- मीडियम इज मैसेज। लोगों को आज विभिन्न माध्यमों से जो भी सूचना मिलती है, उसे सच मान लेते हैं। कोई कोल्ड ड्रिंक आप पिएं या ना पिएं, यह आप तय नहीं करते, कोई फिल्मी अभिनेता तय करता है।

हमारी विचारशक्ति अब टीवी की शरण में पहुंच गई है। इधर टीवी का स्वीच ऑन हुआ, उधर मस्तिष्क का स्वीच ऑफ। ड्रग की एक टेबलेट का नाम है एक्स्टसी। विश्व के कोने-कोने की खबर जानने के बाद इंसान को खुद से पूछना चाहिए- मेरा विवेक क्या कहता है? गुजरात में बिलकिस बानो पर जो कुछ भी गुजरा, उससे मैं आहत हूं। उसके बारे में सोचते हुए मुझे कभी यह नहीं लगा कि वे एक धर्म विशेष से बाबस्ता है। मुझे तो यही लगा कि वह मेरी बेटी है। हर विचारशील व्यक्ति को यही लगेगा, चाहे वह किसी भी धर्म या संपद्राय से ताल्लुक रखता हो।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन को रौंदने की जो योजना बनाई, उससे हम सबकी सहानुभूति जेलेंस्की की तरफ होनी चाहिए। ऐसी विचारशक्ति यदि इंसान के पास नहीं है, तो उसे अपनी समझ को ही दोष देना होगा। हाल ही में सलमान रुश्दी पर भी हमला हुआ। मैंने अपनी यात्रा के दौरान उनका घर देखा है। मेरी ट्रेन शिमला से निकलकर आखिरी स्टेशन समरहिल पर पहुंचती है। इस रेलवे मार्ग पर एक स्टेशन का नाम है सोलन। सोलन स्टेशन से आगे जाने पर प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों को देखकर मैं हतप्रभ था। इतने में मेरे प्रवासी साथी ने पहाड़ी पर एक घर को दिखाते हुए बताया कि उस घर में सलमान रुश्दी का जन्म हुआ था। मैंने सलमान रुश्दी की किताब 'सेटेर्निक वर्सेस' पूरी नहीं पढ़ी है। स्पेन के मेड्रिड शहर में चार दिनों तक रहना हुआ, तब मोरक्को से मेड्रिड आए एक युवक ने मुझे 'सेटेर्निक वर्सेस' दी थी। मुझे वह किताब अच्छी नहीं लगी। उसमें मां-बहन के अपशब्दों का समावेश था। यह सब अलग बात है। एक लेखक के रूप में वे भले ही मुझे अच्छे न लगते हों, पर उन पर जिस तरह से हमला हुआ, उससे मैं आहत हूं। उनकी किताब के बारे में मेरे विचार भले ही सकारात्मक न हों, पर ऐसे महान लेखक बाल-बाल बच गए, इससे मैं आश्वस्त हूं।

आखिर में एक महत्वपूर्ण बात। विचारशून्यता नफरत नामक ज़हर को जन्म दे रही है। साल 1948 में नफरत के जिस भाव ने महात्मा गांधी को अपना शिकार बनाया, वही भाव आज फिर से उभर रहा है। ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हो रहा है कि दो अलग-अलग कंपनियों के टूथपेस्ट का इस्तेमाल करने वाले दो वर्गों के बीच भी नफरत पैदा कर कोई भी नेता वातावरण को बिगाड़ सकता है। नफरत की यही भावना लोगों को आपस में लड़ा रही है। कई बार यही बात मारा-मारी और फिर मार-काट तक पहुंच जाती है।

ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में हुए धर्मयुद्ध के दौरान छोटे बच्चों को उबलते पानी में फेंक कर मार दिया गया था। धर्मयुद्ध के दौरान जो क्रूरता दिखाई गई, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप इस्लामी क्रूरता पूरे यूरोप में फैल गई। ऑटोमन साम्राज्य नफरत से पैदा हुई हिंसक प्रतिक्रिया का परिणाम था। घृणा का कुंड न केवल बदबू देता है, बल्कि प्रतिक्रिया की घातक लहरें भी पैदा करता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति को निरंतर जागरूकता पैदा करके घृणा के उत्पीड़न से बचना चाहिए। इसके बारे में सोचना मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं।

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