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पाकिस्तान डायरी:'दिलों के काबे घरों में ही बना करते हैं'

ज़ाहिदा हिना8 दिन पहले
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पाकिस्तान की प्रसिद्ध महिला कथा लेखिका अलताफ़ फ़ातिमा​​​​​​​ - Dainik Bhaskar
पाकिस्तान की प्रसिद्ध महिला कथा लेखिका अलताफ़ फ़ातिमा​​​​​​​

अभी कुछ महीनों पहले की बात है। मैं उनके घर कुंज गली में बैठी थी और उनके उस घड़े का पानी पिया था जिसकी ऊपरी सतह पर सब्ज़ रंग की काई जमी हुई थी। उन्होंने हमारे पहंुचने से पहले ही मिठाई और नमकीन-बिस्किट्स मंगवाकर रखे हुए थे और बहुत गर्मजोशी से मेज़बानी कर रही थीं।

ये अलताफ़ फ़ातिमा थीं- उर्दू की एक जानी-मानी अदीब। मैं जब भी लाहौर जाती, उन्हें फोन करती और जब भी वो आने की इजाज़त देतीं तो उनकी कुंज गली में हाज़िर हो जाती। मैंने उनका वो ज़माना भी देखा है, जब मोतियाबिंद ने उन्हें देखने से महरूम कर दिया था। हम उनके घर पर पहुंचे तो वो बावर्चीख़ाने में मौजूद थीं और एक नवउम्र पठान मुलाज़िम को हिदायतें दे रही थीं। चूल्हे पर एक देग़ची चढ़ी हुई थी जिसमें से प्याज़ के तलने की भीनी-भीनी ख़ुशबू आ रही थी। वाे मुलाज़िम को हिदायतें देती हुईं और हमारे साथ चलती हुईं उस कमरे में आ गईं जो उनकी बैठक थी। वो हमसे बातें करती रहीं, अपनी नई किताब की बातें, दूसरे अदीबाें की बातें जिन्हें वो इन दिनों अपनी आंखों के मोतियाबिंद की परेशानी की वजह से पढ़ नहीं पा रही थीं। ऑपरेशन हो जाएगा तो फिर सब ठीक हो जाएगा, वो हमें तसल्ली दे रही थीं। उधर, हमारा यह हाल था कि उन्हें इस हाल में देखकर दिल भर आता था और मैं यह नहीं चाहती थी कि वो मेरी रुंधी हुई आवाज़ सुनें, इसलिए मैं ख़ामोश रही।

उनसे कई बार फोन पर बातचीत हुई तो लगा कि वो तो बिल्कुल अकेली हो गई हैं। महफिलों में आना-जाना छोड़ दिया है, दुनिया ने उनकी वह क़द्र नहीं की, जिसकी वो हक़दार थीं। तो उन्होंने भी सबसे मुंह मोड़ लिया। लिखना उनके लिए सांस लेने जितना ज़रूरी था, लिहाज़ा आख़िरी सांस तक लिखती ही रहीं।

मैंने उनकी सबसे पहली कहानी 'बैचलर्स हाेम' पढ़ी थी और फिर 'निशाने महफिल इश्क़' का एक उदास कर देने वाला क़िस्सा, जिसमें एक हिंदुस्तानी दानिश्वर और उस्ताद है, जो इंग्लिस्तान से एक हसीन अंग्रेज़ लड़की को ब्याह कर ले आता है और फिर अपने शागिर्द के हाथों शिकस्त पाता है। पेंच-दर-पेंच क़िस्सा जो अांखों को नमनाक कर जाता है। अपने इस नॉवेल से वे अपने पाठकों के दिलों में घर कर गईं।

उनकी कहानियों के कई संकलन छापे गए। वो जिसे चाहा गया, जब दीवारें गिरती गईं और तार अनकबूत उनका आख़िरी मजमुआ या संकलन दीद वा दीद के उनवान से छपा। आख़िरी मुलाक़ात में उन्होंने दस्तख़त करके अपना यह मजमुआ मुझे इनायत किया।

उनके नॉवेलों में आल्हाउदल हैं और भूले-बिसरे गीत हैं। उन्हें सीता का हरण याद रहता है और रावण के क़दमों में अनगिनत सीताओं का सम्मान मिटता हुआ दिखाई देता है। वो बंटवारे के दर्द से गुज़री और एक बसे-बसाए घर को छोड़कर या कहिए उखड़कर लाहौर जा बसीं। शायद यही वजह है कि उनकी तहरीरों में जाबजा घरों के बारे में पढ़ने को मिलता है। वे लिखती हैं कि घर तो सबसे बड़ा तीरथ है, दिलों के काबे घरों में ही बना करते हैं।

(ज़ाहिदा हिना पाकिस्तान की जानी-मानी वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका और स्तंभकार हैं।)

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