रसरंग में चिंतन:फिजूल की बातों को जो सहन न कर सके, वही असली युवा है

गुणवंत शाह2 महीने पहले
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प्रतीकात्मक तस्वीर - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक तस्वीर

पर्वत से जब कोई बेनाम झरना बहता है, तो वह कभी भी तयशुदा रास्तों से नहीं गुजरता। उसे तो बहना आता है। उसका बहना किसी नियम-कायदे से नहीं बंधा होता। एलन वॉट्स की किताब का नाम है- 'ताओ, द वाटरकोर्स वे'। इसमें ताओ का आशय है मार्ग। ताओ यानी जीवन का झरना। वह झरना जो बिना किसी प्रयास के, अपने आप सहजता से बहता रहता है। मानवीय योजना और नियमों के साथ जो बहे, उसे नहर कहा जाएगा।

प्रकृति से बहुत दूर निकलकर संस्कृति के मार्ग पर आगे निकलने वाला नियमवादी, अनुशासनवादी, शासनवादी और योजनावादी भद्र समाज सदैव प्रकृति के साथ टकराता ही रहता है। वह टेक्नोलॉजी और संस्कृति के विकास के साथ नई समस्याएं भी खड़ी करता है। इस पर वह नई पीढ़ी को दोष देता है तो क्या यह उचित है? थोड़ा ठहरकर विचार करें तो समझ में आ जाएगा कि बिना किसी नियम-कायदे के बहने वाले झरने और पूरी योजना के साथ बहने वाली नहर के बीच जो संघर्ष है, वह इक्कीसवीं सदी के यौवन में लगातार होने वाला संघर्ष है। गीता के अठारहवें अध्याय में कृष्ण कहते हैं- हे! अर्जुन, सहज कर्म दोषयुक्त होता है, तो उसे त्यागना नहीं। नई पीढ़ी कृष्ण को माने या धर्मगुरुओं को? इस तरह से झरने और नहर के बीच का संघर्ष, प्रकृति और संस्कृति के बीच का संघर्ष बनकर पूरे मानव जगत को परेशान करता रहता है।

आखिर नई पीढ़ी के संघर्ष को किस तरह से समझा जाए? यह संघर्ष तो लाओत्सु और कंफ्यूशियस की दो विचारधाराओं के बीच का संघर्ष है। लाओत्सु सहजता से बहने वाले झरने के पक्षधर हैं। दूसरी ओर कंफ्यूशियस औचित्य यानी 'लि' के पक्षधर हैं। चीनी भाषा में 'लि' का आशय होता है- जब आज का युवा अपनी प्रेयसी से पहली बार 'आई लव यू' कहता है, तब वह पूरी तरह से सच्चा होता है। उसके बाद उसके शब्दों से सत्य लगातार घटता जाता है, झूठ बढ़ता रहता है। क्या वह युवा बदमाश या दगाबाज है? ऐसी बात नहीं है।

ईस्वी पूर्व छठी सदी में पृथ्वी पर जितने महामानव पैदा हुए, उतने अन्य किसी सदी में नहीं हुए। उस सदी में भारत देश में बुद्ध और महावीर हुए। चीन में लाओत्सु और कंफ्यूशियस हुए। उस सदी में ग्रीस में पायथागोरस और हेरक्लिटस हुए। उसी दौरान ईरान में अशो जरथुष्ट्र हुए। ऐसी कोई सदी मानव इतिहास में नहीं मिलती। इस महामानवों ने जो महान पराक्रम किए हैं, वे सभी युवावस्था में ही किए हैं। भगवान बुद्ध ने महाभिनिष्क्रमण किया, तो उस समय वे बड़ी उम्र के नहीं थे। पायथागोरस ने पूरे ग्रीस में बहुत ही कम उम्र में शाकाहार का प्रचार किया था।

युवा किसे कहा जाए, इस पर मेरे विचार आपको विचित्र लगेंगे। फिजूल की बातों को जो व्यक्ति एक सीमा से आगे जाकर सहन न कर सके, उस व्यक्ति को युवा कहा जाएगा। कुछ उदाहरण लेते हैं। गांधीजी जब युवा थे, तब वे अस्पृश्यता जैसी कुप्रथा को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। राजा राममोहन राय युवा थे, इसीलिए वे सतीप्रथा जैसी परंपरा को सहन नहीं कर पाए। कौरव पुत्र और दुर्योधन का सगा भाई विकर्ण वास्तव में युवा कहा जाएगा, क्योंकि भरी सभा में द्रोपदी के चीरहरण जैसी घटना को सहन करने में असमर्थ था। भीष्म और द्रोणाचार्य की उपस्थिति में उसने जो गर्जना की, वह कृष्ण युग की सबसे तेज और पवित्र गर्जना थी।

जो वास्तव में युवा होते हैं, वे कभी दहेज प्रथा के खिलाफ गर्जना करने से चूक सकते हैं भला? कोई भी युवा सती प्रथा जैसी परंपरा को सहन कर सकता है? साम्प्रदायिक दंगों के समय निर्दोष लोगों की हत्या हो रही हो तो कौन-सा युवा शांत बैठ सकता है? लेकिन आज विकर्ण की गर्जना निरंतर अनुपस्थित है। ऐसे समाज में कायरता को 'अहिंसा' माना जाता है। दोयम दर्जे की सहिष्णुता को 'धीरज' माना जाता है। ऐसे सड़े समाज में यौवन का खिलना असंभव है। सच कहा जाए तो आज भारतीय समाज बूढ़ा और लाचार हो चला है। किसी पर अत्याचार हो रहा हो तो मौन रहना कायरता की निशानी है। मैंने आज तक किसी विकर्ण से मुलाकात नहीं की। युवा शिविरों में लम्बी-चौड़ी हांकने वालों में भी मुझे कहीं विकर्ण दिखाई नहीं देता।

- गुणवंत शाह, पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक

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