रसरंग में धुनों की यात्रा:’आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें, कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं’

पंकज राग16 दिन पहले
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झप ताल का सबसे खूबसूरत मोहक प्रयोग मुकेश द्वारा गाए ’आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें ...’ को ही माना जाता है। - Dainik Bhaskar
झप ताल का सबसे खूबसूरत मोहक प्रयोग मुकेश द्वारा गाए ’आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें ...’ को ही माना जाता है।

हिंदी फ़िल्मों के अधिकांश गीत कहरवा या दादरा ताल पर ही बनाए गए हैं, पर कुछ बेहद खूबसूरत गीत झप ताल के हिस्से में भी आए हैं।

झप ताल 10 बीट ताल के रुप में परिभाषित है जिसमें 2,3,2 और 3 चार विभाग होते हैं। एक तरह से कह सकते हैं कि झप ताल बड़े आराम और सुकून से चलने वाला ताल है और हिंदी फ़िल्म संगीत में इसका उपयोग दर्दीले और भावुक गीतों के लिए ही किया गया है। झप ताल का शायद सबसे खूबसूरत और मोहक प्रयोग ’परवरिश’ (1958) के दत्ताराम द्वारा यमन में संगीतबद्ध और मुकेश द्वारा आत्मिक रूप से गाए ’आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें, कोई उनसे कह दे हमें भूल जाएं’ को ही माना जाएगा। रेकॉर्डिंग के समय साजिदों की हड़ताल थी, दत्ताराम के पास साजिंदे नहीं थे, पर मात्र तबले की झप ताल और ज़हूर अहमद की बजाई सारंगी के साथ राग यमन के इस गीत में उन्होंने दर्द के ऐसे सुर ढाले और मुकेश ने इसे ऐसी कशिश से गाया कि आज भी इस गीत को सुनकर पूरा अंतर्मन अभिभूत हो जाता है। मुकेश के एक से बढ़कर एक दर्दीले गीतों के बीच भी इस गीत का स्थान तो कोई अन्य गीत ले ही नहीं सकता। इस गीत की रेकॉर्डिंग जब राज कपूर ने सुनी तो वे इतने भावुक हो उठे कि सारी रात यह गीत सुनते रहे थे। मुकेश के एक अनजाने कंसर्ट की रेकॉर्डिंग मेरे पास है, उसमें यही गीत है जिस पर सबसे ज्यादा तालियां भी बजी हैं और ‘वादे भुला दे कसम तोड़ दे वो‘ अंतरे के उठाव पर मुकर्रर की आवाजें भी आई हैं जिस पर मुकेश ने इस अंतरे की दुहराया भी है।

झप ताल पर ही दत्ताराम का कम्पोज़ किया एक मार्मिक गीत ’अब दिल्ली दूर नही’ (1958) में सुधा मल्होत्रा का गाया खमाज आधारित ’माता ओ माता जो तू आज होती’ भी याद आता है। उससे भी बढ़कर दत्ताराम का ही संगीतबद्ध फ़िल्म ’काला आदमी’ (1960) का मुकेश का गाया दर्दीला गीत ’दिल ढूंढ़ता है सहारे सहारे’ आज तक संगीत प्रेमी गुनगुनाते हैं।

गौरतलब है कि झप ताल पर आधारित कुछ सबसे खूबसूरत गीत रोशन के संगीत निर्देशन में बने। रोशन के संगीत में अक्सर एक भावुकता और संवेदनशीलता झलकती थी और इसके लिए झप ताल उपयुक्त ठहरता था। फ़िल्म ’नूरजहां’ (1967) का राग गौड़ मल्हार पर आधारित ’शराबी शराबी ये सावन का मौसम, खुदा की कसम ख्ूबसूरत न होता’ को सुमन कल्याणपुर के गाए सर्वश्रेष्ठ गीतों में स्थान मिलता है। वहीं फ़िल्म ’देवर’ (1966) का मुकेश के स्वर में ’बहारों ने मेरा चमन लूट कर, खिजां को ये इल्ज़ाम क्यूं दे दिया’, मुकेश के ही स्वर में फ़िल्म ’मैंने जीना सीख लिया’ का ’तेरे प्यार को इस तरह से भुलाना न दिल चाहता है न हम चाहते हैं’, रफ़ी के स्वर में फ़िल्म ’चांदनी चौक’ (1954) का ’ज़मीं भी वही है वही आसमां’ और फ़िल्म ’सूरत और सीरत’ का बेहद कोमल, थपथपाते हुए बीट्स के साथ ’गीत मेरा सुलाए जगाए तुझे’ (लता) भी फ़िल्म संगीत में रोशन के संगीतबद्ध झप ताल के अनुपम उदाहरण हैं। गुलज़ार लिखित और कल्याण जी आनंदजी द्वारा राग दरबारी में कुछ अन्य रागों के मिश्रण के साथ ही मुकेश के स्वर में ’पूर्णिमा’ (1965) का ’तुम्हें जिं़दगी के उजाले मुबारक अंधेरे हमें आज रास आ गए हैं’, कल्याणजी आनंदजी का ही ’राजा साहब’ (1969) का रफ़ी के स्वर में ’किसी मेहरवां की नज़र ढूंढ़ते हैं’ और उन्हीं की अप्रदर्शित फ़िल्म ’निर्लज्ज’ का मुकेश के स्वर में ’मेरी आरजू़ है तुम्हें इतना चाहूं’ इस संगीतकार द्वय द्वारा झप ताल के सुंदर प्रयोग को दर्शाते हैं। इसी प्रकार शंकर जयकिशन फ़िल्म ’बूट पाॅलिश’ के लिए स्वरबद्ध ’तुम्हारे हैं तुमसे दया मागते हैं’, (रफ़ी, आशा), ’दिल तेरा दीवाना’ (1962) का भीमपलासी आधारित ’मासूम चेहरा’ (रफ़ी, लता), राग मेघ और मल्हार पर आधारित फ़िल्म ’बसंत बहार’ (1956) का ’भय भंजना वंदना सुन हमारी’ (मन्ना डे), राग देस की छाया को लेकर फ़िल्म ’सीमा’ (1955) का ’कहां जा रहा है तू ऐ जाने वाले’ (रफ़ी) और फ़िल्म ’प्रोफेसर’ (1962) का अपने ज़माने का सुपर हिट प्रणय गीत ’आवाज दे कर हमें तुम बुलाओ’ (रफ़ी, लता) जैसे कई गीतों में झप ताल को बड़ी खूबसूरती से लेकर आए। झप ताल का आहिस्ता और तल्लीन रूप हमें फ़िल्म ’मुनीम जी’ (1955) के राग काफ़ी आधारित सचिन देव बर्मन के संगीतबद्ध ’घायल हिरणिया मैं बन बन डोलूं’ में भी मिलता है। इस गीत की प्रेरणा सम्भवतः सुबह सवेरे टहलने जाने वाले दादा बर्मन को अपनी इन्हीं सैरों में मिली होगी और इसीलिए इस गीत में उन्होंने प्रातः प्रकृति में व्याप्त चिड़ियों की चहचहाहट और अन्य ध्वनियों का समावेश किया।

झप ताल पर आधारित कुछ बहुत सुंदर गीत ओ.पी. नैयर के भी संगीतबद्ध किए हुए हैं। हालांकि ओ.पी. नैयर का लाक्षणिक संगीत तो रवानी भरा ही रहता था और अधिकांशत: उनका ताल कहरवा ही होता था। फ़िल्म ’बाज़’ (1953) का तलत का गाया कामोद आधारित ’मुझे देखो हसरत की तस्वीर हूं मैं’ और फ़िल्म ’फिर वही दिल लाया हूं’ का आशा का गाया ’मुझे प्यार में तुम न इल्ज़ाम देते’ यदि झप ताल के सुंदर उदाहरण हैं, तो अनुपम और उत्कृष्ट उदाहरण है फ़िल्म ’एक बार मुस्कुरा दो’ (1972) का किशोर के स्वर में कल्याण आधारित ’सवेरे का सूरज तुम्हारे लिए है’। रफ़ी और महेंद्र कपूर से गवाने वाले ओ.पी. नैयर किशोर के साथ इतना जमेंगे, यह इस गीत से पहले किसी ने सोचा भी न था।

फ़िल्म ’सारंगा’ (1960) का सरदार मलिक द्वारा संगीतबद्ध ’चली रे चली रे मैं तो देस पराए’, राग वृंदावनी सारंग पर आधारित ’संसार’ (1951) का ’प्यारा हमारा मुन्ना’ (लता), फ़िल्म ’संगीत सम्राट तानसेन’ (1962) का रफ़ी और मन्ना डे की राग हेमंत की अद्भुत अभिव्यक्ति ’सुध बिसर गई आज़’, और मन्ना डे के स्वर में ’राग भैरव प्रथम शांत रस’, फ़िल्म ’लाजवाब’ (1950) का अनिल विश्वास द्वारा कल्याण में कम्पोज़ किया गया ’ज़माने का दस्तूर है ये पुराना’ (मुकेश, लता मंगेशकर), सपन जगमोहन की अपनी पहली फ़िल्म ’बेगाना’ (1963) में पहाड़ी राग में स्वरबद्ध ’न जाने कहां खो गया ये ज़माना’ (मुकेश), फ़िल्म ’जादू नगरी’ (1961) का एस.एन. त्रिपाठी का संगीतबद्ध बेहद स्निग्ध गीत ’निगाहों में हो तुम’ (लता), ’राहगीर’ (1969) के हेमंत कुमार के गाए गुलज़ार लिखित ’कभी रुक गए हैं’, ’गोदान’ (1963) का पं. रविशंकर का पूरबी रंग लिए खमाज़ आधारित ’चली आज गोरी’ (लता) झप ताल पर स्वरबद्ध गीतों के अन्य सुने अनसुने उदाहरण हैं।

पंकज मल्लिक के कुछ बेहद चर्चित गीत झप ताल पर ही रचित हैं। फ़िल्म ’यांत्रिक’ (1952) के कालिदास की रचना ’अस्त्युत्तरास्याम दिशि देवात्मा’, गैर फ़िल्मी गीत ’ये रातें ये मौसम ये हंसना हंसाना’, फिल्म ’नर्तकी’ का ’ये कौन आज आया सवेरे सवेरे’ जैसे गीतों में पंकज मल्लिक की हार्मनी पैदा करती आवाज़ और झप ताल के साथ उसका सामंजस्य कुछ लाज़वाब रचनाओं की सृष्टि करता है। बाद के दशकों में ’पलकों की छांव में’ (1977) में लक्ष्मी-प्यारे के संगीत से सजा लता का गाया मकबूल गीत ’कोई मेरे माथे की बिंदिया सजा दे’, चर्चित फ़िल्म ’सारांश’ (1984) का अजीत वर्मन द्वारा बेहद कुशलता से स्वरबद्ध ’अंधियारा गहराया’ (भूपेंद्र), फ़िल्म ’गजगामिनी’ (2000) का भूपेन हज़ारिका के संगीत निर्देशन में शंकर महादेवन द्वारा गाया ’दीपक कथन करत’ भी झप ताल पर आधारित गीत हैं।

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