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आपस की बात:‘आवाज़ दो हम एक हैं’ गीत ने चीन हमले से भौंचक देश में भर दिया था जोश

राजकुमार केसवानी6 दिन पहले
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महबूब ख़ान द्वारा रिकार्ड करवाए गए गीत 'आवाज़ दो हम एक हैं' का एक दृश्य।

डायरेक्टर महबूब ख़ान का सफ़र 1935 में ‘अल हिलाल उर्फ़ जजमेंट ऑफ़ अल्लाह’ से 1962 में रिलीज़ हुई उनकी फ़िल्म ‘सन ऑफ़ इंडिया’ पर जाकर पूरा होता है। इन 27 सालों में उन्होंने ‘डेक्कन क़्वीन’ और ‘मनमोहन’(36), ‘जागीरदार’(37), ‘हम, तुम और वो’ और ‘वतन’(38), ‘एक ही रास्ता’(39), ‘औरत’(40), ‘बहिन’(41), ‘रोटी’(42), ‘नजमा’ और ‘तक़दीर’ (43), ‘हुमायूं’(45), ‘अनमोल घड़ी’(46), ‘एलान’(47), ‘अनोखी अदा’(48), ‘अंदाज़’(49), ‘आन’(52), ‘अमर’(54), ‘मदर इंडिया’(57) और ‘सन ऑफ़ इंडिया’ (62) डायरेक्ट कीं।

इन फ़िल्मों के अलावा महबूब ख़ान ने कुछ काबिले-दाद कारनामे और भी किए। 1962 में चीन के हमले से भौंचक देश के गुम होते हवास वाले इस दौर में गीतकार जां निसार अख़्तर, संगीतकार ख़य्याम और मुहम्मद रफ़ी की मदद से एक गीत रिकार्ड करवाया- ‘आवाज़ दो हम एक हैं।’ फिर इसे फ़िल्माया अपने चार हीरोज़ पर। ‘मदर इंडिया’ के तीन हीरो राजकुमार, राजेंद्र कुमार और सुनील दत्त के साथ ‘सन ऑफ़ इंडिया’ के हीरो कमलजीत। इस शार्ट फ़िल्म को देश भर के सिनेमा घरों में दिखाया जाता था। महबूब की इस कोशिश ने देश की जनता को अपने हवास में लौटने और जोश-ओ-ख़रोश के साथ एकजुट होने में बड़ी अहम भूमिका निभाई।

‘एक है अपनी ज़मीं, एक है अपना गगन

एक है अपना जहां, एक है अपना वतन

अपने सभी सुख एक है, अपने सभी ग़म एक हैं

आवाज़ दो हम एक हैं, आवाज़ दो हम एक हैं’

इसी के साथ ही साथ एक और गीत भी आया। इस बार पर्दे पर दिलीप कुमार, राजकुमार, राजेंद्र कुमार और कमलजीत तिरंगा हाथ में थामे साहिर लुधियानवी, ख़य्याम और मुहम्मद रफ़ी की टीम के रचे गीत को गाते हुए दिखाई देते हैं। इन गीतों में जज़्बात की सच्चाई है। सुन देखें। अगर लहू की हलचल तेज़ न हो तो हकीम लुक़मान को नब्ज़ ज़रूर दिखाना चाहिए। चलिए, पहले सुन तो लें।

‘वतन की आबरू ख़तरे में है, हुशियार हो जाओ

हमारे इम्तिहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ’

इन दो गीतों ने देश को क़ुरबानी और एकजुटता के जिस जज़्बे से भर डाला था, वह किसी बड़े से बड़े नेता की किसी तक़रीर से कभी न हुआ होगा।

ख़ैर जी, छोड़िए। वापस चलते हैं महबूब ख़ान के फ़िल्मी सफ़र की तरफ़। तो साहिबान, महबूब ख़ान अपने फ़िल्म बनाने के सफ़र पर निकले ‘अल हिलाल उर्फ़ जजमेंट ऑफ़ अल्लाह’ के साथ और पहली ही फ़िल्म हिट हो गई। बम्बई के इम्पीरियल सिनेमा में फ़िल्म के पहले शो के बाद फ़िल्म के निर्माता चिमनलाल देसाई और डाक्टर अम्बालाल पटेल की धड़कनें तेज़ हो चली थीं। यह सवाल परेशान कर रहा था कि नए आदमी पर इतना पैसा लगा दिया, अब फ़िल्म चलेगी भी कि नहीं? पैसा डूबेगा कि बरसेगा?

उस दौर में एक फ़िल्म पत्रकार बाबूराव पटेल का बड़ा दबदबा था। उसकी राय की बड़ी अहमियत होती थी। अंग्रेज़ी पर कमाल की पकड़ थी और ज़बान में तंज़। आदतन फ़िल्मों और फ़िल्म बनाने वालों की खाल खेंचने का शौक़ रखते थे। लेकिन उस दिन पटेल साहब बहुत ख़ुश थे। देसाई और पटॆल ने राय पूछी तो जवाब मिला, ‘मुबारक हो। तुम लोगों ने एक ऐसे डायरेक्टर को जन्म दिया है जो बहुत आगे जाएगा।’

महबूब ख़ान कामयाब हुए तो उन्होंने भी दिल खोलकर नए लोगों के लिए कामयाबी की राहें रोशन कीं। इस गिनती में पहला नाम आता है गायक-नायक सुरेंद्र नाथ - बी.ए., एल.एल.बी. का। जिन साहिबान को इस नाम को पहचानने में दिक़्क़त हो वो फ़ौरन फ़िल्म ‘अनमोल घड़ी’(46) का अमर गीत ‘आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है’ याद कर लें। इस गीत में नूरजहां के साथ दूसरी आवाज़ सुरेंद्र नाथ बी.ए., एल.एल.बी. की ही है।

इन सुरेंद्र साहब को भी 1936 में पहला मौका मिला महबूब ख़ान की दूसरी फ़िल्म ‘डेक्कन क़्वीन’(36) में। सुरेंद्रनाथ की कहानी भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। बटाला, गुरदासपुर के रहने वाले रलिया राम शर्मा के बेटे थे। बाप का ख़्वाब था उन्हें वकील बनाने का। उस पर बेटा पढ़ने-लिखने में था भी होशियार। सो शानदार तरीके से इम्तिहान पास करते हुए अपने पिता के ख़्वाब के नज़दीक जा पहुंचा। लेकिन-लेकिन-लेकिन। इस ख़्वाब की बीच में आ खड़ी हुई बेटे की गायकी।

सुरेंद्रनाथ बचपन से ही गाने के शौकीन थे। स्कूल से लेकर कालेज में, शादी-ब्याह के मौकों पर उनके गाने की फ़रमाइश होती थी। इसी दर्मियान कुंदन लाल सहगल की गायकी ने पूरे मुल्क को एक ज़िंदा जादू की तरह अपनी ज़द में ले लिया था। सुरेंद्र भी मुतासिर हुए बिना न रह सके। उन्होंने सहगलनुमा गायकी को ख़ासा साध लिया था। महफ़िलों में अक्सर सहगल के गीत ही गाते थे। इसी बात ने इन होने वाले वकील साहब के अदालत तक पहुंचने का रास्ता रोक दिया।

सहगल, न्यू थियेटर्स, कलकत्ता के तनख़्वाहदार मुलाज़िम थे और न्यू थियेटर्स में बंटने वाली तनख़्वाहों की रकम में सबसे बड़ा योगदान सहगल की फ़िल्मों का ही होता था। उनकी कमोबेश हर फ़िल्म और उनका गाया हर गीत सिनेमा और संगीत के आशिकों के दिल में घर कर लेता था। लिहाज़ा सफ़लता ही सफ़लता।

बम्बई के तमाम प्रोड्यूसर्स इस बात को लेकर बड़े हैरान-परेशान रहते थे कि उनके पास सहगल जैसी आवाज़ वाला कोई नायक-गायक नहीं है। एक बार पंजाब टेरैटिरी के डिस्ट्रीब्यूटर लाला अलोपी प्रसाद ने सुरेंद्र नाथ को किसी पार्टी में सहगल का कोई गीत गाते हुए सुन लिया। वह उनके पीछे पड़ गया कि वो वकालत का इरादा छोड़ फ़िल्मों में काम करे। उस वक़्त सुरेंद्र अपनी एल.एल.बी. से महज़ एक कदम दूर खड़े थे। सो मां-बाप ने सख़्ती से रोक दिया।

साल भर बाद वकालत की डिग्री भी मिल गई। अब लाला अलोपी प्रसाद ने जमकर कसरत की और सुरेंद्र के पिताश्री को इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह बेटे को फ़िल्मों में काम करने का एक मौका ज़रूर दें। बापू रलिया राम जी पिघल तो गए लेकिन एक शर्त सख़्ती से रख दी कि फ़िल्म में हो कि पब्लिसिटी में, हर जगह नाम के साथ डिग्रियां भी लिखी जाएंगी।

उस दौर का चलन भी यही था। मामला रोज़गार का हो कि प्यार का, मैट्रिक और बी.ए. पास उम्मीदवार ही अक्सर पास होते थे। वो गीत तो शायद आपको भी याद होगा, ‘हमसे नैन मिलाना बी.ए. पास करके’ (शमशाद बेगम-मुकेश-आंखें-50)। फ़िल्मों में भी अपने नाम के साथ बी.ए. और एम.ए. लगाने वाले तो पहले से मौजूद थे लेकिन यह तो थे सुरेंद्र नाथ बी.ए., एल.एल.बी.।

‘डेक्कन क़्वीन’ 1936 में रिलीज़ हुई और कामयाब भी। दर्शकों ने सुरेंद्र का स्वागत ख़ुश आमदीद के नारे के साथ कर दिया। इस फ़िल्म में सुरेंद्र का गाया ‘बिरहा की आह लगी मोरे मन में’ बेहद पसंद किया गया। यह उनका रिकार्ड होने वाला एकदम पहला गीत था। इस गीत को सुनते ही यक-ब-यक सहगल का गाया ‘बालम आय बसो मोरे मन में’(देवदास-35) याद आने लगता है।

न्यू थियेटर्स, कलकत्ता की इस फ़िल्म ‘देवदास’ की धुआंधार कामयाबी ने बम्बई के सारे स्टूडियोज़ को परेशान कर रखा था। वह भी ऐसी ही कोई फ़िल्म बनाकर अपनी भरी हुई तिजोरियों की तादाद में इज़ाफ़ा करना चाहते थे। सुरेंद्र की आमद से उत्साहित सागर मूवीटोन के मालिकान ने भी देवदासनुमा फ़िल्म की कहानी लिखने की ज़िम्मेदारी सौंपी एक्टर-डायरेक्टर ज़िया सरहदी पर और डायरेक्टर एक बार फिर महबूब ख़ान। फ़िल्म का नाम तय हुआ ‘मनमोहन’ और सुरेंद्र के साथ हीरोइन चुनी गई मिस बिब्बो। साथ में याक़ूब और भुडो अडवाणी। फ़िल्म रिलीज़ हुई। बाक्स ऑफ़िस के इम्तिहान में भी शानदार तरीके से पास हो गई। एक साल में दो हिट फ़िल्में।

इस फ़िल्म के गीत ख़ूब चले। दस में से पांच गीतों में सुरेंद्र की आवाज़, तीन में बिब्बो की। इन दोनों का गाया एक डुएट ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया, सोए हुए हृदय को जगाया’ ख़ासकर बहुत मक़बूल हुआ और 85 बरस बाद 2021 में भी सुना जा रहा है।

महबूब ख़ान की कामयाबी का सफ़र उनकी अगली फ़िल्मों, ‘जागीरदार’, ‘हम तुम और वो’, ‘वतन’, ‘एक ही रास्ता’ जैसी फ़िल्मों के साथ जारी रहा। इनके बाद 1940 में बारी आई फ़िल्म ‘अलीबाबा’ की। इस फ़िल्म ने महबूब ख़ान को 1927 की अपनी पहली फ़िल्म ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ की याद दिला दी। भावनाओं के बहाव में ही याद आए इम्पीरियल फ़िल्म कम्पनी वाले सेठ आर्देशिर ईरानी जिन्होंने पहला मौका दिया था।

‘इस फ़िल्म ने मुझे फ़िल्मों में अपने पहले दिन की याद दिला दी। यह वो दिन था जिस दिन मैं बहुत ख़ुश-ख़ुश सा चालीस चोरों में से एक चोर बनकर एक ड्रम के अंदर घुसकर बैठा था। मैंने इस नई फ़िल्म का मुहूर्त शाट इम्पीरियल स्टूडियो में ठीक उसी जगह लिया जहां से मेरा केरियर शुरू हुआ था। आर्देशिर सेठ मेरी कामयाबी से बेहद खुश थे। बतौर एक कामयाब डायरेक्टर मेरी घर वापसी ने उन्हें बहुत भावुक कर दिया था। उन्होंने मुझे गले लगा लिया और इसरार किया कि पूरी फ़िल्म की शूटिंग उन्हीं के स्टूडियो में करूं।’ (महबूब ख़ान)

और महबूब ख़ान ने पूरी फ़िल्म वहीं शूट भी की। याद रहे फ़िल्म थी सागर मूवीटोन की और अपना स्टूडियो छोड़ शूट हुई दूसरे स्टूडियो में। इसी के साथ इस फ़िल्म के साथ कुछ और दिलचस्प बातें भी जुड़ी हैं। पहली तो यह कि इस फ़िल्म में सुरेंद्र का डबल रोल था। दो हीरोइनों में से एक थीं अभिनेत्री निम्मी की मां वहीदन बाई और दूसरी थीं सरदार अख़्तर, जो बाद में महबूब ख़ान की असल ज़िंदगी की हीरोइन भी बनीं।

और...

बड़ी देर से इस बात को कहने को जी मचल रहा है। सो जाते-जाते कह देता हूं वरना पेट बहुत दुखेगा। जिस वक़्त मैं ‘वतन की आबरू ख़तरे में है, हुशियार हो जाओ’ वाले गीत की बात कर रहा था, उस वक़्त मुझे एक अजब सी बात याद आ रही थी। कहीं देखा-सुना या पढ़ा था। वह बात यह थी कि देश भक्ति के इस गीत को बम्बई के अवैध शराब अड्डे वालों ने भी अवैध रूप से ख़ूब इस्तेमाल किया था। पुलिस के छापे की भनक लगते ही नशेलों का नशा हिरन करने और भागने को प्रेरित करने के लिए रिकार्ड बज जाता था - ‘वतन की आबरू ख़तरे में है, हुशियार हो जाओ।’

सही चीज़ों का ग़लत इस्तेमाल तो हमेशा इसी तरह होता रहा है। अब भी हो रहा है। क्या करें? अभी तो फ़िलहाल यूं करें कि अगले हफ़्ते मिलने का वादा करें और ज़ोर से बोलें... जय-जय।

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