चिंतन:एक झटके में समर्पित कर दी थी पूरी रियासत

गुणवंत शाह9 महीने पहले
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सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ भावनगर के तत्कालीन महाराजा कृष्णकुमार सिंह जो मद्रास के पहले भारतीय गवर्नर भी रहे। - Dainik Bhaskar
सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ भावनगर के तत्कालीन महाराजा कृष्णकुमार सिंह जो मद्रास के पहले भारतीय गवर्नर भी रहे।

अंग्रेजों ने जब हमारे देश से विदाई ली, तब देशी रजवाड़े स्वतंत्र थे। अंग्रेजों ने इन्हें इस बात की भी स्वतंत्रता दे दी थी कि वे भारत या पाकिस्तान के साथ रहें या फिर स्वतंत्र रहें। उधर भावनगर के महाराजा कृष्णकुमार सिंह अलग माटी के बने थे। 17 दिसम्बर 1947 की रात 11 बजे वे बिड़ला हाउस में गांधीजी से मिले। उनके आने के पहले ही गांधीजी ने मनु बहन को यह ताकीद कर दी थी कि महाराजा के आने के 5 मिनट पहले दरवाजे पर खड़ी हो जाना। दो महानुभाव कार से उतरे और मनु बहन के साथ अंदर पहुंचे। आगंतुक को देखकर शहद के साथ गरम पानी पीते हुए बापू अपने स्थान से उठ खड़े होते हैं। अतिथियों के लिए कुर्सी की व्यवस्था की गई है, किंतु अतिथि बापू के सामने जमीन पर ही बैठ जाते हैं। इन अतिथियों में एक भावनगर के महाराजा कृष्णकुमार सिंह और दूसरे दीवान अनंतराय पट्‌टणी थे। दीवान को दूसरे कमरे में भेज दिया गया। फिर बापू और महाराजा ने एकांत में वार्तालाप किया। कुछ ही देर में महाराजा अपना पूरा राजपाट बापू के चरणों में समर्पित कर बाहर आ जाते हैं। इस घटना का वर्णन गुजरात के महान साहित्यकार गंभीर सिंह गोहिल ने अपनी किताब 'प्रजावत्सल राजा' में किया है।

राजाओं से उनके राजपाट लेने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इस काम में जिस सूझबूझ का परिचय दिया, वह सराहनीय है। उन्होंने सभी राजाओं का विश्वास प्राप्त किया। यह आसान काम नहीं था। उस समय यदि सरदार पटेल का जादू न चला होता तो आज भारत का नक्शा कैसा होता? सरदार पटेल ने भगवत गीता के इस वाक्य को अपने जीवन में अच्छी तरह से उतारा। 'योग कर्मसु कौशलम'। यह सूत्रवाक्य आज के आधुनिक प्रबंधन का आधार है।

परिशुद्ध कर्मनिष्ठा को सरदार पटेल ने 1928 से ही अपने जीवन में उतार लिया था। निष्काम कर्मनिष्ठा के शिखर पर कर्मयोग का गौरवशाली स्थान होता है। सरदार साधु नहीं थे, परंतु निष्काम कर्म करने की आदत के कारण उनका कर्मयोग ही उन्हें साधु बना देता है। सीधी-सी बात है कि कोई हमारा घर ले ले और हम उसे पिता का दर्जा दें, क्या यह संभव है? लेकिन भावनगर के महाराजा कृष्णकुमार सिंह ने कहा था- मैं जब सरदार पटेल से मिलता हूं तो ऐसा लगता है जैसे अपने पिता से मिल रहा हूं।

सौराष्ट्र की माटी की सुगंध ही ऐसी है कि यहां चमत्कार करने वाले पैदा होते ही रहते हैं। विद्धान साहित्यकार डॉ. मुनिकुमार पंड्या ने मुझे जो पत्र लिखा, उसमें ऐसी ही सुगंध है। उनके पत्र का सार कुछ इस तरह से है- सर लाखाजी राज के शासन के दौरान राजकोट क्षेत्र में जब प्लेग फैला तो एक रात वे वेश बदलकर जनता का हाल-चाल जानने के लिए निकले। उन्होंने देखा कि एक घर में दीया जल रहा है। राजा उस घर के पास पहुंचे तो वहां उन्हें एक बूढ़ी महिला दिखाई दी। राजा ने उससे पूछा- क्यों मां, नींद नहीं आ रही है? तो बुढ़िया ने जवाब दिया- यहां मच्छरों का आतंक है। हम मच्छरदानी कहां से लाएं? तब राजा ने अपने साथ आए व्यक्ति से कहा- इस मां के लिए तुम तुरंत बाजार जाओ और इनके लिए मच्छरदानी लेकर आओ। तब उस व्यक्ति ने कहा कि इस समय मच्छरदानी की व्यवस्था कहां से की जाए? तब राजा ने उससे कहा कि जाओ, महल से मेरे बिस्तर पर लगी मच्छरदानी ले आओ और इस मांजी की खाट से बांध दो। राजा के आदेश का तुरंत पालन हुआ। फिर राजा ने बुढ़िया से पूछा- अब तो मच्छर परेशान नहीं करेंगे ना? तब बुढ़िया ने कहा- जहां तुम्हारे जैसा इंसान है, वहां मच्छर का भय कैसे रह सकता है?

- गुणवंत शाह पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखक, साहित्यकार और विचारक हैं।

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